सोमवार, 31 दिसंबर 2018
अधूरा कौन है
पायल...जब भी छनकती है दिलों को बेजार-बेकरार कर डालती है। छन..छन...छन...छन, घूंघट में मुखड़ा छिपा हो तो मन होता है कि एक बार तो उठे...मेहंदी लगे गोरे हाथों में जब लाल चूडिय़ां खनके तो... काले घनेरे बालों में गजरा महके तो...और अगर घूंघट उठे तो कजरारे नैनों का वार...होठों पर सुर्ख लाली...नींद चुराती बिंदिया मानों तो एक साथ हजारों हाथों से किसी से प्राण घातक आक्रमण कर डाला हो और ये सभी सोलह श्रृंगार अस्त्र-शस्त्र हो जाते हों। पर आदमी चौंकता तब है जब असलियत पता चलती है। पर कभी-कभी असलियत दुनियावी हकीकत को झुठला देती है।
उपनगर से शहर में आए तो आबिद को कुल जमा तीन ही दिन हुए पर ऐसा लगता है कि शहर से उसका पुराना नाता हो। उसके चचा के लड़के ने उसे कह दिया था कि शहर में जरा सम्हलकर चलना यहां का चलन तो अनोखा है। सच!....मुच उसने कह डाला।
चचा का लोहा-लंगड़ का काम था जिसमें न तो आबिद को दिलचस्पी थी और न ही चचा के लड़के...क्या नाम है उसका इकबाल की। अब आएं किस्सा-ए-खास पर आज जुमे का दिन था और वो नमाज अदा करके बाहर ही आए थे कि एक लालजोड़े में सजी दुल्हन से वो आमने-सामने हो गए। वो घूंघट डाले चली जा रही थी। पायल छनक रही थी और पूरे सोलह श्रृंगार उन पर हमला कर रहे थे। चेहरा तो ढंका था पर आंखें नजर आ ही थीं घूंघट में से। हाय ये काफिर हुस्न, इकबाल बोला। ये बला है कौन? आबिद का सवाल था। चल जाने दे काफिरा है...काफिर है तो क्या हुआ, हमारे यहां तो ये ज्यादा आशिकी पसंद मानी जाती हैं। हें..हां। एक मिनट...इकबाल यहां से वहां हुआ और आबिद उस हुस्नजाना के पीछे हो लिया। वो इठलाती-बलखाती एक शादी के मंडप में जा घुसी। आबिद ने देखा वो यहां-वहां होती उससे पहले ही वो वहां से निकली और जाने लगी। रास्ते में वो एक इमारत में घुसी जहां एक संकरी सी गली थी। आबिद ने वहां उसे पकड़ दिया। मोहतरमा...आप कौन है? कहां जा रही हैं? आबिद का ख्याल था कि वहां कोई है नहीं जो सही ही था कि बुरे हालत हों तो वो वहां से भाग निकले पकड़कर पीटने वाला हो ही नहीं। वो औरत रुकी और बोली- क्या चाहते हैं? आपसे पहली नजर में मुहोब्बत हो गई है। लगा कि आप काफिर हैं पर दिल न माना और मैं आपके पीछे यहां तक चला आया। उसने घूंघट खोला। उफ....ये हुस्न तो हूर को भी नसीब न हो। उसमें और आबिद में कुछ देर बातचीत हुई। फिर वो चली गई।
आबिद वापस लौटा तो इकबाल ने पूछ ही लिया- अरे जनाब, कहां थे? कहीं निकाह तो नहीं पढ़ डाला उसके साथ। अरे नहीं भाई.. वो मुस्कुराया। अब आबिद अचानक गायब हो जाता। कहां जाता किसी को भी पता नहीं था। आबिद के चचा ने पूछा तो वो टाल गया। इकबाल को भी पता न था कि वो जाता कहां था?
आखिर एक दिन उसने ठान लिया कि आज तो पता लगाकर ही रहेगा कि माजरा आखिर है क्या? जब से वो हुस्नजाना मिली है, आबिद आखिर गायब कहां हो जाता है? एक दिन आबिद चुपचाप घर से बाहर निकला और चंदन गली में चला गया। आबिद का पीछा करते हुए इकबाल भी चंदन गली में पहुंचा। इकबाल ने देखा वो एक कमरे में गया फिर करीब घंटे भर के बाद वो बाहर निकला। इकबाल ने पूरा मामला चचा को बताया।
दूसरे दिन चचा ने पूछ लिया कि भाई कहां जाते हो इतनी देर के लिए। कहीं नहीं जाता..चचा उसका जवाब था। चंदन गली में नहीं जाते..अब आबिद को काटो तो खून नहीं। क्यों भाई ऐसा क्या है उस गली में, दूसरा सवाल रूबरू था।
अब आपको बता दिया जाए कि चंदन गली में ऐसा क्या था कि वहां जाने को लेकर लोगों में कुछ शुबहा था। चंदन गली असल में हिजड़ों का निवास स्थान था, जब भी शहर में कहीं शादी होती लोग वहीं जाते और हिजड़ों को नाचने के लिए नेवता देते। आबिद खामोश रहा। बताओ बरखुरदार...वर्ना अब्बा जान को खबर हो जाएगी। अब आबिद बोल पड़ा- उस दिन एक हूर से इत्तेफाक से सामना हुआ। उससे अकेले में इमारत में मिला जहां उसने उसे बताया कि वो एक औरत नहीं बल्कि एक हिजड़ा है जो शादी में नाचने गया था। पर शक्लोसूरत से उसे कोई भी औरत ही जानेगा उसकी आवाज इतनी मीठी...किस का दिल उस पर फिदा न होगा। आबिद उसकी मुहोब्बत में दीवाना हो गया। वो उसीे से मिलने वहां जाता है। उसका नाम चमेली है कुछ लोग उसे गुलाबी तो कुछ पायल के नाम से भी जानते हैं। बहुतेरे लोग उसे देखकर कामुक भी हो जाते हैं। उसने उसका फोटो भी दिखाया जो उसकी पाकेट में था। चचा ने देखा- अरे ये तो बिलकुल औरत है और किसी औरत से भी ज्यादा खूबसूरत..अल्ला ने हुस्न तो बख्शा पर जिस्म में अधूरा बना दिया। अधूरा...क्यों? क्या उसमें जज्बात नहीं हैं। वो प्यार नहीं कर सकती या सकता। उसमें क्या किसी के साथ एक जिस्म होने की तमन्ना नहीं हो सकती? उसमें दिल में क्या बच्चा जनने का ख्याल नहीं हो सकता? आबिद ने कह डाला। मियां, क्या खामोख्वाह बाप के नाम को खाक में मिला रहे हो। लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे...अब सारी मुहोब्बत काफूर हो गई। दूसरे दिन आबिद सामान लेकर वापस घर लौट गया।
बात को बीस साल गुजर गए। आबिद ने निकाह किया और कुल जोड़ चार बच्चों को पैदा किया। सनम, जावेद, इकरा और सद्दाम। शहर के नखलिस्तान हॉल में सनम की सगाई थी। सभी लोग शामियाने में थे। तभी जाहिदा (आबिद की पत्नी) बोली- ये लो...और दुआएं दो। आबिद ने देखा तो वहां चमेली खड़ी थी। उसने आबिद को देखा फिर बोली- आज जीभरकर ढोल बजाओ खूब नाचूंगी मैं। पर इसके पैसे न दूंगी....जाहिदा ने कह डाला। यूं मानों मेरी बेटी की शादी हो...चमेली बोली। उस दिन चमेली खूब नाची। आबिद उससे नजरे न मिला सका। सगाई निपटी तो सभी ने एक बात कही चमेली का ऐसा नाच तो आज तक नहीं देखा और न कभी शायद देखने को भी न मिलेगा। कुछ लोगों ने इसका वीडियो तक बना डाला। सगाई में दूल्हा-दुल्हन तो एकतरफ कम रहे पर चमेली की खूब बढ़ाई हुई। इकबाल काइयां ढंग से मुस्कुराता रहा। दूसरे दिन आबिद चंदन गली गया। देखा तो एक जनाजा जा रहा था। पता चला कि चमेली विदा हो गई। उसको हाई ब्लड प्रेशर था। वो इतना बढ़ गया कि वो चल बसी। आबिद ने देखा तो बिंदिया वहां खड़ी सब देख रही थी। वो भी चमेली की जमात की थी। बिंदिया उसे कोने में ले गई। आबिद तुम उसे छोड़कर चले गए पर उसके लबों पर सिर्फ और सिर्फ एक ही दुआ रही कि आबिद हमेशा खुश रहे। उसे तुम्हारे घर से न जाने कौन शादी में आने का नेवता दे गया। वो बिना जाने वहां जा पहुंची। तुमको देखा तो वो हसीन लम्हात उसे बरबस याद हो आए। वो तुम्हे कभी न भूल पाई थी और कल रात बोल रही थी कि मेरा आबिद खुश है मैं खुश हुई। उसकी बेटी मेरी ही बेटी है। भले ही मेरी कोख न हो तो क्या हुआ? मैं पूरी हो गई..बिंदिया मैं पूरी हो गई। उसके प्राण निकल गए। ये बैंक की पास बुक तुमको देने को कहा है। करीब 15 लाख रुपए हैं इसमें तुम्हारे नाम दे गई है। चमेली को देखकर मेरा बेईमानी करने का मन न हुआ। वो मुस्लिम चमेली थी या हिंदू पायल..पर वो अधूरी नहीं थी। आबिद समझ गया कि नेवता इकबाल ने ही दिया होगा कि चमेली वहां आकर हंगामा खड़ा कर देगी पर उसने तो...
बदहवास आबिद जनाजे के पीछे दौड़ा और चिल्लाया- कोई उसकी कब्र पर जूते मत मारना वो तो पूरी थी हम ही अधूरे निकले।
30-31 दिसम्बर 18
रविवार, 16 दिसंबर 2018
तुम्हारे साथ की ही हूं न....
दो हाई क्लास वेश्याएं सुबह उठीं। दोनों के बदन में तेज दर्द था। एक गई और चाय बनाकर लाई और दूसरी को दे दी।
पहली- अच्छा किया तूने चाय बना लाई। लगता है आज नहीं जा पाऊंगी। बदन दर्द कर रहा है।
दूसरी- आंटी को बोल देना। मैं भी शायद नहीं जा पाऊंगी। मेरा शरीर भी दर्द कर रहा है। पर अपन तो यहां हैं तीसरी कहां गई? रात को भी नहीं आई। इतना कितना बड़ा ग्राहक मिल गया उसको।
पहली- बातें तो वो बड़ी-बड़ी करती थी। पर नहीं जानती थी कि हमारा काम तो सिर्फ जी बहलाना भर है। ग्राहक का मन भरा और हम वापस।
दूसरी- पर फिर भी मुझे चिंता हो रही है। मैं कॉल करती हूं। (दूसरी ने कॉल किया पर वहां से किसी ने फोन नहीं उठाया।)
दूसरी- अब आंटी को फोन लगाती हूं। (उसने आंटी को फोन लगाया। दूसरी तरफ से फोन उठाया गया।)
हलो आंटी, कल रात से तीसरी वाली गायब है। पता नहीं कहां चली गई? आप देखो और खान भाई को बताओ वो पूरा मामला देखेेंगे। (दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई।)
आंटी...आंटी...
आगे बोल...
आंटी आज हमारी तबीयत ठीक नहीं है। हम काम पर नहीं जा पाएंगी। एक मिनट आंटी आपकी आवाज को क्या हो गया बदली-बदली सी लग रही है।
चुप रह....बदन दुखे या ...फट जाए धंधे पर तो तुम दोनों जाओगी ही, नाचोगी और रात भी रंगीन करोगी। और ये क्या आंटी-आंटी लगा रखा है? मैं तीसरी बोल रही हूं। आंटी का सफाया हो गया। अब से मैं तुम्हारी बॉस हूं। तैयार हो जाओ। आज का ग्राहक खुद पोलिस की सिक्यूरिटी में आएगा। मंत्री है।
दूसरी (आश्चर्य से बोली)- आंटी तो दर्द नहीं जानती थी पर तुम तो हमारे साथ की ही हो न!
फोन पर आवाज आई- तुम्हारे साथ ही ही हूं ऊमम्म्म (वो भरी आवाज में मुंह बंद कर हंसी)। मैं यहां आंटी को ठिकाने लगाकर बैठी हूं। ये मैं नहीं ये कुर्सी बोल रही है। मैं आज रात खुद डीएसपी के साथ बीजी हूं। दर्द सहा है इसीलिए कह रही हूं आज रात के लिये तैयार हो जाओ दवाई खाओ और मेकअप और ड्रेसअप कर लो। तुम्हारे साथ की न होती तो शायद कह देती आज रात रेस्ट कर लो पर तुम्हारे साथ की ही हूं न इसलिये कह रही हूं, काम पर लगो। दर्द में भी एक मजा है, ये हमारी मजबूरी है या क्या पता नहीं पर गंदा है पर धंधा है ये। (फोन कट गया।)
दूसरी ने पहली का मुंह देखा- वो हमारे साथ की ही है न...शायद दूसरी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
मंगलवार, 11 दिसंबर 2018
ये दोस्ती नहीं थी तो और क्या था?
अजय श्रीवास्तव
यह काम कॉपरेशन कम कंपलशन ज्यादा था। तीनों बेरोजगारों के स्वार्थ जुड़ गए थे। अक्सर दीक्षा को अकेला पाकर दानी कम तनख्वाह का रोना रोती और दीक्षा की दोस्ती का हवाला देती यद्यपि ये काम पूर्व वाले काम से बेहतर था। दीक्षा भी उसे बताती कि उसे कम पैसे मिलते हैं। प्रॉफिट हो न हो पर शायद सब उशी दबा जाती है। उशी, बुटिक में दीक्षा को अकेला पाकर दानी की अनुभवहीनता और दीक्षा से दोस्ती का हवाला देती पर उशी जानती थी कि दानी सस्ते में काम तो रही है। दीक्षा दोनों को झेलती, क्योंकि उसे भी नौकरी नहीं मिली थी। दानी दादी को कोसती जिसने पढऩा छुड़ाया शादी लगाई। दानी कहती पढ़ती-लिखती तो अच्छी नौकरी मिलती तो मिलती, टेलरिंग में मात्था न खबता।
उशी घर के बाहर निकली। दुपट्टा कंधे से करम तक कसकर बांधा। हेलमेट लगाया, गॉगल से आंखें ढांकी स्कूटी निकाली, गेट बंद किया और स्कूटी पर तेजी से उड़ चली। दानी ने आइनें में मुंह देखा फिर बाहर आई, दादी केे पाव छुए जो मुड्ढे पर बैठी थीं। जीती रे। दानी ने बस स्टाप की राह पकड़ी। दीक्षा ने बैग उठाया, कमरे के बाहर आई। भाभी मैं चलती हूं, जल्दी पहुंचना है। रुक मैं छोड़़ दूंगा, भाई ने कहा जो डाइनिंग कुर्सी पर बैठा बे्रड खा रहा था। आज नहीं कल छोड़ देना, वैसे भी रोज छोड़ते हो। आज उशी मुझे कलैक्ट कर लेगी। दीक्षा तुरत-फुरत निकल पड़ी।
दानी बस से उतर कर कॉलेज में आई ही थी कि पीछे से आवाज आई- दानी। वो मुड़ी पीछे कुछ कदमों की दूरी पर उशी की स्कूटी रुकी हुई थी और दीक्षा उतर कर उसके पास आ रही थी। सॉरी वो तुम, दानी कुछ अनमने ढंग से मुंह बनाकर पलटकर चल पड़ी। उशी स्कूटी स्टैंड की ओर ले गई। उशी और दानी एक दूसरे से उदासीन से थे। दीक्षा उनमें मध्यस्थता करती रहती थी।
दानी बीए फइनल की छात्रा थी। दीक्षा एमबीए मार्केटिंग की और उशी ड्रेस डिजाइनिंग की छात्रा थी। तीनों के जीवन स्तर में, समुदायों में और सपनों में बहुत फर्र्क था। दानी सिंधी मध्यमवर्ग की निम्र श्रेणी से संबंध रखती थी। दीक्षा शर्मा मध्यम वर्ग की मध्यश्रेणी से संबंध रखती थी। उशी अग्रवाल उच्च मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखती थी। दानी बस सोचती थी अच्छा पति मिल जाए तो जिंदगी चैन से कट जाए। दीक्षा तो बस किसी तरह अमेरिका पहुंचना चाहती थी। उशी खुद की फैशन बुटीक बनाना चाहती थी। उशी कुछ अकड़ू थी। दीक्षा सामंजस्यवादी और व्यवहारिक स्वभाव की थी। दानी उदास रहने वाली लड़की थी। वैसे, दानी शादी के प्रति भी उदासीन थी। बस दो-तीन चीजें उनमें समान थीं जैसे लड़कों की ओर उदासीनता, कामचोरी, पढ़ाई की ओर उहु...ठीक है का रवैया। रिजर्ट आने के बाद दानी की शादी हो गई, उशी मुंबई और दीक्षा बेंगलुरु चली गई। समय बीतता गया बीतता गया।
सात साल बाद उशी मुंबई से लौट आई। उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा के चलते कुछ गुंडों से उसकी झड़प हो गई। उन्होंने उसकी गाड़ी के कांच फोड़े और धमकी दी। चोरी भी की। वैसे भी उशी को यही बेहतरीन कमाई के अवसर दिख रहे थे। सात साल बाद उसने शहर देखा कितना बदला है शहर।
उशी को दीक्षा की याद आई। कुछ समय से उनका संपर्क टूट गया था। उशी दीक्षा के घर गई पता चला कि वो भी उशी की तरह वापस आ गई है परंतु वो घर पर थी नहीं। उशी ने उसे मोबाइल लगाया। दीक्षा ने उसे इंडियन कॉफी हाउस बुलाया। दोनों इंडियन कॉफी हाउस में मिले। दीक्षा ने उशी को बताया कि वो शहर में नौकरी ढूंढ रही है। साथ ही दानी भी यहीं है, उसका पता अभी कुछ ही दिन पहले चला। हुआ यूं कि दीक्षा महीनाभर पहले ही शहर आई। शहर घूम ही रही थी कि उसने देखा एक जानी पहचानी दुबली काया अपने पति के साथ एक सफेद पोटला सायकल पर लाकर जा रही है। देखा तो पता चला वो दानी थी। शादी हुई पति कपड़े की कतरन का छोटा-मोटा व्यवसाय करता था। एक बार अगजनी में दुकान मानों तो टप्पर का बड़ा खोखा राख हुआ। घरवालों ने साथ छोड़ा वैसे भी दानी की नौ ननदें ही हैं। वॉओ दमदार सास ससुर, क्या करें लड़के की चाहत। दानी का पति टेकमल चुहड़मल। बस..बस इतना इंट्रोडक् शन काफी है। यही रेडीमेड कपड़े लाता है, दानी सिलती है। वो सबसे छोटी सास-ससुर हैं नहीं बस दो बच्चे हैं। बिल्लो बड़ी आदिश छोटा।
उशी को एक आइडिया आया जो उसने दीक्षा को बताया। सप्ताहांत तक हार्ट टॉवर में एक बुटीक खुली नाम था उदीनी। हेड बनी उशी, मार्के टिंग सम्हाली दीक्षा ने, टेलरिंग सम्हाली दानी ने।
यह काम कॉपरेशन कम कंपलशन ज्यादा था। तीनों बेरोजगारों के स्वार्थ जुड़ गए थे। अक्सर दीक्षा को अकेला पाकर दानी कम तनख्वाह का रोना रोती और दीक्षा की दोस्ती का हवाला देती यद्यपि ये काम पूर्व वाले काम से बेहतर था। दीक्षा भी उसे बताती कि उसे कम पैसे मिलते हैं। प्रॉफिट हो न हो पर शायद सब उशी दबा जाती है। उशी, बुटिक में दीक्षा को अकेला पाकर दानी की अनुभवहीनता और दीक्षा से दोस्ती का हवाला देती पर उशी जानती थी कि दानी सस्ते में काम तो रही है। दीक्षा दोनों को झेलती, क्योंकि उसे भी नौकरी नहीं मिली थी। दानी दादी को कोसती जिसने पढऩा छुड़ाया शादी लगाई। दानी कहती पढ़ती-लिखती तो अच्छी नौकरी मिलती तो मिलती, टेलरिंग में मात्था न खबता। शहर में बेस्ट बुटिक कॉम्पीटिशन के इन दिनों खूब चर्चे थे। कुछ बुटिक वाले या वालियां उशी का मजाक उड़ाती। भड़ककर उशी ने भी फर्म भर दिया। दीक्षा ने समझाया पर उशी समझने वाली ही कहां थी?
सप्ताह भर बाद परिणाम आया। बेस्ट प्राइज उदीनी को मिला था। तीनों ने स्टेज पर साथ में जाकर प्राइज लिया। तीनों अनपेक्षित परिणाम पाकर खुश थी और एक दूसरे को देखकर कुछ-कुछ शर्मिंदा भी। इसे क्या कहें? सहयोग का फल, समझौते का फल या मजबूरी और निर्भर स्वार्थों का परिणाम?
5 से 8 मई सन् 2008
रविवार, 9 दिसंबर 2018
आई ...हेट टीयर्स
कभी नहीं कहूंगा आई हेट टीयर्स रे, क्यों कहूं?
भावनाएं छिपाकर क्योंकर रहूं।
आप दिल में समाए हो इस तरह से
निकले मनभाव में क्योंकर न बहूं।
यादें कितनी आपने नींवों में चुनी है...
अपने आप से ये कहानी क्योंकर न कहूं।
कुछ न कहकर एक मुस्कान, एक आशीष एक दुआ, होंठों पर आपके रही...
मैं इस बात पर चुप क्योंकर रहूं।
आंखों में आंसू कुछ आ जाते हैं जाने क्यूं?
आपकी जगह दिल में हैं हम न मानें क्यूूं?
एक आंसू...कहता है बहुत कुछ...सुनती हैं आंखें...यादें बुनती हैं आंखें...
झूठ तो नहीं है पर सच भी नहीं, मैं समझने में क्योंकर उलझा रहूं।
क्यों कहूं आई हेट टीयर्स रे....
13-7-2017
शुक्रवार, 28 सितंबर 2018
भीड़ में गुमा न्याय
एक वरिष्ठ वकील अपने ट्रेनी स्टूडेंट्स को बता रहे थे कि किस तरह से लोग उनके पास आते हैं और सोचते हैं कि उनका मामला निपट जाएगा पर कभी-कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है कि वो खुद नहीं कह पाते कि क्या कहें। उन्होंने एक किस्सा सुनाया। एक बार वो अपने केबिन में बैठे पुराने केसों की धूल झाड़ रहे थे और नए केसों की तैयारी कर रहे थे, तभी एक निम्न मध्यमवर्गीय महिला अंदर आई। साब... हां..साब मेेरा केस देख दो न.. वकील ने सोचा ये खुद खराब हालत में दिख रही है ये भला क्या फीस देगी और उनके पास बहुत से केस पहले से हैं। साब..आप मेरे वकील को बता दो कि क्या करना है? आप समझा दो न! वो बिना बोले ही कुर्सी पर बैठ गई।
अच्छा बताओ मामला क्या है? साब मेरा आदमी नशेड़ी है और मेरे झोपड़े पर किराएदार ने कब्जा जमा लिया। मैं अपने सास-ससुर के पास रहती। घर-घर काम करती बाबूजी..घर खर्च उठाती। पति मेरे को प्यार करता-रात को मेरे बगैर सोता नहीं।
वकील सोचने लगे ये तो केस की बात कर रही थी यहां तो सेक्स आ रहा है। बाबूजी... मैं अपने मरद से बोली, किराएदार को भगा दे। वो भाड़ा भी नहीं देता था। मेरा मरद गया तो उन्होंने उसको पीटा और बोले कि जोरू साथ सो जाये तो भी झोपड़ा न छोड़ूंगा। बोलो बाबूजी ऐसा कभी होता है क्या? मैं क्यों उसके साथ सोती..झोपड़ा मेरा...हक मेरा..मैं सोची कि अब तो बहुत हो गया..मैं केस करूंगी। मैंने बाबूजी केस लगाया। कोरट में जाकर सबसे महंगा वकील किया। वकील बाबू बोले चल रहा है...पहली पेशी हुई..दूसरी हुई बाबूजी मैंने अपनी कमाई लगा डाली। वकील बाबू बोले चल रहा है..चल रहा है। बाबू जी उसने पूरी मेहनत की, पूरी-पूरी पर वो केस छोड़ बैठे..अब बाबूजी पैसा कम था सो मैं बोली कि अब कम पैसे वाला वकील करती हूं। मैंने उससे कम पैसे वाला वकील किया। वो भी पूरे दमखम से लड़े बाबूजी..मुझको कोरट में दिन-दिन भर बिठाते सिर्फ नाश्ते और चाय के दम पर वो पूरे दिन मेरा केस लड़ते...वो बोले जीत जाओगी। तो मैं बोली आपको खुश कर दूंगी वकील बाबू। वो मुझे देखकर मुस्काए बोले- छप्पनभोग या नानवेज से कम नहीं लूंगा। मैं बोली सबकुछ आपका है...जब बोलोगे परोस दूंगी। पर बाबूजी वो नियत दिन केस हार गए। अब मेरे पास पैसा कम था। वकील बाबू बोले दूसरी कोरट में जाओ...मैंने उनके पाव पकड़े बाबूजी आपसे शिकायत नहीं है...वो बोले तेरी हर तरह से मदद करूंगा। अब बाबूजी किराएदार ने मुझसे कहा कि तेरे को उठाकर ले जाऊंगा और कहीं मुंह दिखाने की नहीं छोड़ूंगा। मैं सोची बाबूजी अब तो इज्जत पर बन आई है। मैंने कुछ घरों का काम छोड़ दिया। अब बखत बचाकर मैं अगरबत्ती बनाती। मैं डरी बाबूजी अगर मुझे उठाकर ले गया। कुछ खिलापिला दिया। अगर ऑपरेसन फेल हो गया और मैं पेट से हो गई तो, मेरा मरद मेरे वास्ते अगर घर का सौदा कर बैठा तो? वकील सोचने लगे इसका पति इसके लिए क्या वाकई किराएदार से समझौता कर सकता है? ये बहुत सुंदर तो नहीं है।
महिला बदस्तूर जारी थी-अब मामला निपटाने को मैं दूसरी कोरट पहुंची और अबकी बार पैसा कम था सो सस्ते वकील बाबू किये। बाबूजी उनका ऑफिस एक कमरे का था। मैंने पूरा पैसा लगाने की ठानी पर बाबूजी वो बोले कोरट में पूरा पैसा मत लगा। मैं देखी कि वो दिन-दिन भर मेरे ही केस की बात करते रहते। मैं सोची कि बाबूजी वो मेरे लिए इतना कर रहे हैं तो मैं बखत निकालकर उनके घर जाकर उनके घर का काम कर देती। फीस कम दे रही थी न उनको। उनकी पत्नी देर रात काम से लौटती थीं। मैं उनके घर जाकर खाना बना दिया कर देती। झाड़ू कर देती। अपनी अगरबत्ती बनाने के काम से थोड़ा बखत निकाल लेती। अब बाबूजी वो घर पर रहते और दिनभर मेरे केस की पढ़ाई करते। जब वो अंदर आते मुझसे कहते ऐ शांता तू कैसी है? तेरा मरद तुझ पे ध्यान नहीं देता पर तू उसका कितना ख्याल करती। मैं बोलती मेरा मरद है बाबूजी...प्यार भी तो करता है। वो कहते तेरी मेरी हालत एक सी है। मेरी औरत रात को सो जाती है और....बाबूजी मेरा केस देख लो न, अब वो कुछ न बोली। वकील साहब इतना तो समझ गए कि इस औरत का नाम शांता है और मकान के केस से ये परेशान है। उसकी लगातार बोलने की आदत ने उनको चुप्पा कर दिया था। वकील साहब बोले-अपने वकील को मेरे पास भेज दे। जी बाबूजी वो मानों मनमांगी मुराद पा गई हो। उसके बाद क्या हुआ सर? युवा ने पूछा। उसका वकील कभी मेरे पास नहीं आया। आपने जानने की कोशिश की कि उसका क्या हुआ? एक लड़की ने पूछा। नहीं वो उसके बाद कभी आई नहीं और दिखी भी नहीं। सर वो अपनी कहानी सुनाते-सुनाते रुकी क्यों? एक लड़के की उत्सुकता जागी। वकील की फीस चुकाने के लिए शांता ने उस वकील को अपना सबकुछ सौंप दिया। शांता का फायदा उसने खूब उठाया और शांता ये समझती रही कि वो वकील केवल और केवल उसके केस की ही तैयारी कर रहा है। शांता ये बोलने में हिचक रही थी कि वो उस वकील के साथ एक जिस्म और एक जान के साथ एक रूह भी हो रही थी। न्याय की देवी अंधी है और उसके हाथ में तराजू है कि कौन कितना माल दे सकता है तोला जा सके और जो पैसा नहीं दे सकता उससे और क्या निचोड़ा जा सकता है। न्याय ताकत वालों का है सच हो तो सच झूठ हो तो झूठ।
सर फिर कभी आपने ये जानने की कोशिश नहीं की कि उसका क्या हुआ? एक ट्रेनी ने पूछा। एक बार चपरासी से पूछा तो उसने बताया कि नये वकील बाबू ने उससे कहा कि वो ये केस नहीं देख सकेंगे तो वो उनके पांव में पड़ गई थी। फिर उसने और समझौते भी किये। वो उनकी ही हो गई। सब कुछ हुआ पर कोर्ट से उसके मकान का मामला न सुलझा या सुलझने नहीं दिया गया। तारीखें और तारीखें लगती गईं। आखिर वकील ने उसे समझाया और उसके मकान का समझौता हुआ और उस झोपड़े के उसे कुछ पैसे मिले, कुछ वकील और कोर्ट की कार्यवाही में खर्च हो गए। वकील की पत्नी को बिस्तर पर निशानियां मिलीं तो उसके घर में भी हंगामा हुआ। तमाशा हुआ। वकील ने शांता को ही बुरा बना दिया पर जानने वाले जानते थे। शांता भी बदनाम हुई। जंगल के कानून की मारी शांता भीड़ में कहीं खो गई। मेरे चपरासी की एक बात बस याद है- अरे बाबूजी समझौता किराएदार के साथ कर लेती तो शायद इतना तो न लुटती..चलो एक बात अच्छी रही साब उसने बच्चे का ऑपरेशन करवा रखा था वर्ना...पर एक बात जरूर थी आखिर तक शांता यही कहती रही- वकील बाबू ने तो पूरी-पूरी मेहनत की। उसने पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं की...एक लड़की ने पूछा। पुलिस क्या करती है? उन्होंने पूछा। सर महिलाओं के लिए कानून हैं, एनजीओ हैं। लड़की ने दलील दी। बहुत अच्छी बात है.... सिर्फ एक अच्छी बात...हलाला तो कानून ही है न? वकील ने पूछा। देखो सिस्टम में हर स्तर पर भ्रष्टाचार है। पुलिस उसका वैधानिक रूप से बलात्कार कर लेती- ऐसे सवाल पूछे जाते कि वो इससे तो बंद कमरे में समझौता करना मंजूर कर लेती। एनजीओ कहां हैं? वहां तक पहुंचने का रास्ता आम नहीं है यहां बोर्ड लगा है कुत्ते से सावधान। गंभीर माहौल में हंसी खनकी। एनजीओ सिर्फ पैसा कमाने का जरिया है। अब वो चुप हो गए।
सर आपकी कानून के बारे में क्या राय है? एक ट्रेनी ने बीच में पूछा। कानून है जरूर है पर वो जंगल का कानून है। कानून बनते रहेंगे और टूटते रहेंगे पर जंगल का कानून हमेशा रहेगा। वकील चुप हो गए।
26 September, 2018
बुधवार, 18 जुलाई 2018
एक गेट की कहानी
अनाज मंडी बंद हो चुकी थी। अभी-अभी मंडी प्रबंधक केशव प्रसाद जी के सामने वहां का गेट बंद कर दिया गया था। ये गेट मंडी की शान था और प्रसाद जी का गर्व। नेता जी से कहकर प्रसाद जी ने इस गेट को लगवाया था। इस गेट की कीमत 17 लाख रुपए थी। गेट को लगे अभी तीन-चार दिन ही हुए थे। इसका लोकार्पण भी खुद प्रभारी मंत्री कौशल कुमार जी ने अपने हाथों से किया था। किसान आते-जाते गेट को निहारते और मंडी प्रबंधक के गुनगाते... ये विकास का आरंभ है। इसी धार में वो मंडी के अंदर के गड्ढों और अव्यवस्था को भूल जाते थे।
मंडी के अंदर पिछले महीने शौचालय भी बना था पर इसका ताला आज तक तो नहीं खुला था। किसान -मजदूर उसे देखते वाह क्या इमारत है? पर ताला देखकर वो मन मसोस जाते और यहां-वहां निपटते रहते। प्रबंधक को फिक्र थी कि ये गांवड़े वाले अंदर जाकर कहीं गंदगी न कर दें या नए नल-टोंटी चुरा न लें। इससे पहले जो शौचालय था उसमें तो पाखाने और गुसरखाने से टोंटियां तो क्या लोग टाइल्स तक उखाड़ ले गए थे। प्रबंधक का डर जायज था। इसलिए उन्होंने टंकी और पाइप तक अंदर तालाबंदी में कर रखे थे। हालांकि चोर ताला तोड़ सकते थे पर ऐसा होना जरूरी नहीं था क्योंकि प्रबंधक का ऐसा मानना था।
इसका भी लोकार्पण करवाना था। इसके लिए जरूरी था कि यहां से आते-जाते मंत्री को लघुशंका लग जाए और वो इसका लोकार्पण कर डालें। प्रभारी मंत्री से इसका भी लोकार्पण करवाना था पर ऐन मौके पर मंत्री जी को फोन आ गया और वो निकल गए। कुछ करके मंत्री जी के पेट में देव घुस जाएं और उनको इक्की लग जाए।
बात मंडी के गेट की चल रही है इसलिए वापस आ जाते हैं मुद्दे पर- प्रबंधक गेट बंद कर चले गए। अब से तीन दिन की छुट्टी थी। चौकीदार था सखाराम, कुछ गांव छोड़कर पत्नी और बच्चे रहते थे पर रात को तलब लगे तो, सखाराम का मंडी की ही जमादारिन से संबंध चल रहा था। ये जमादारिन तो क्या थी कचरा बीनने वाली थी झाड़ू लगाकर कुछ पैसा कमा लेती थी। सखाराम की पत्नी गर्भवती थी इसलिए जमादारिन ही सहारा थी पर वो भी मंडी में नहींं रहती थी। कुछ दूर एक बाड़ी में रहती थी। पति मजदूर था और अक्सर यहां-वहां मारा-मारा फिरता था। बच्चे छोटे थे सो जाते थे। वो चुपके से वहां पहुंच जाता था इसके बाद रात फूलों की...। शाम को चार बजे प्रबंधक चले गए तो सखाराम ने चिलम फूंकी और टर्रा चढ़ा लिया। अब उसका मन बेचैन हो गया। मुश्किल से घंटा भी न बीता होगा कि वो वहां से भाग निकला। पांच बजे रामकिशन वहां आया। वो अपने साथ मजदूर लेकर आया था। रामकिशन मंडी का व्यापारी था और अपना ट्रैक्टर लेने आया था जो मंडी के अंदर खड़ा था। गेट पर ताला देखकर उसका सिरघूम गया। ये कया हो गया भैये...। प्रबंधक ने उसे आश्वस्त किया था कि पांच बजे तक मंडी खुली रखेंगे। अब न तो वो हैं न चौकीदार। रामकिशन गांव का दबंग था। वो पूरे गांव का मुखिया जैसा ही था। कुछ सोच वो बोला- तोड़ दे ताला। साथी मजदूरों ने ताला तोड़ दिया। पर गेट खुला नहीं। अब रामकिशन का सिर फिर से घूम गया। गिरा गेट को निकाल ट्रैक्टर। आदेश मिलते ही साथी मजदूरों ने गेट के जोड़ों पर गेतियां मारी। कुछ देर की मेहनत के बाद गेट धराशायी हो गया। अब सवाल था गेट का क्या करें? रामकिशन ने उसे उठावाकर वहां पड़े अटाले में रखवा दिया और ट्रैक्टर लेकर चलता बना। आपको बता दूं कि मंडी प्रबंधक अभी-अभी आए थे इसलिए उनका मोबाइल नंबर रामकिशन के पास नहीं था और सखाराम मोबाइल रखता नहीं था। मंडी सूनसान थी।
देर रात सखाराम लौटा तो गेट को न पाकर घबरा गया। उसने ऑफिस का ताला खोलकर पुलिस और प्रबंधक को फोन लगाया। पुलिस कुछ देर बाद आ गई। चोरी का मामला बन गया। तुम कहां थे? थानेदार ने पूछा। साहब बस यूं ही बाहर गए थे...बाहर गए थे। कहां गए थे? साहब पीने के बाद मन मचला तो चले गए। प्रबंधक भी भागे-भागे आए। रात हो चुकी थी। उन्होंने सखाराम पर विश्वास जताया। थानेदार ने प्रकरण दर्ज किया और चलता बना। गांव का पत्रकार मनीराम भी वहां आ पहुंचा। दूसरे दिन गेट चोरी का मामला उठ खड़ा हुआ। पेपर में खबर पढ़कर रामकिशन घबरा गया। उसने सोचा कि गेट कोई चुराकर ले गया है, वो गांव से भाग निकला। सरपंच को पता चला तो वो भी मंडी आए। प्रभारी मंत्री तक बात पहुंच गई। जांच में पता चला कि मंडी में लगे सीसीटीवी कैमरे भी सालों से बंद हैं। पूछताछ में पता चला कि रामकिशन वहां आने वाला था और उसका ट्रैक्टर भी अंदर से गायब था। पुलिस रामकिशन के घर पहुंची तो पता चला कि वो वहां नहीं है और उसके मजदूर भी भाग निकले हैं। यहां प्रबंधक के विरोधी सक्रिय हो गए और उनके खिलाफ दलबंदी शुरू हो गई। ये सब वाकया दो दिन में हो गया। तीसरे दिन जमादारिन लंबी झाड़ू लेकर आई। उसने सखाराम को देखा, वो परेशान बैठा था। अबही तलब न लगे तोके, वो हंसी और पैर पटका तो झांझ बज उठी। अकसर उसकी इस अदा पर सखाराम के अंदर का कामदेव जाग जाता था पर आज वो परेशान था। मंडी प्रबंधक ने उसे कह दिया था कि वो अब ज्यादा दिन का मेहमान नहीं है। हंसती-मुस्काती जमादारिन अंदर गई तभी उसे लघुशंका महसूस हुई। वो अटाले के पास चली गई। बाहर कोई देख सकता था इस लिए वो अंदर चली गई। उसने निवृत्त होने के दौरान वहां गेट रखे देखा तो वो मुस्काने लगी। वो साड़ी सम्हालती उठी और सखाराम के पास पहुंची। परेसान हो..सक्के बलमू (सखाराम का प्रेम का नाम जो जमादारिन ने दिया था। ) वो इठलाई-बलखाई। के करां छोरी...नौकरी पे बात आन पड़ी है। अबके सोना के करधनी दिलाव तो कहूं बात... नौकरी जोखिम में है रे पागली..ऐ बच जाए तो सोना में नहलाऊं तुझे...। ऐ लो, बगल में छोरा ने गांव में ढिंढोरा। मायने बोल छोरी...गेट तो ऐ रखा कबाड़े में। हें...सखाराम दौड़ा। उसने देखा। वाह... मेरी रबड़ी..अबके बार सोने के करधनी, सोने के पायल, सोने के चूड़ा सब लई ले। उसने प्रबंधक को फोन लगाया- साब, गेट तो अटाले में रखा है। लगता है रामकिशन उसे अटाले में रखवा गया। प्रबंधक ने अपने साब को फोन लगाया। उन्होंने कहा कि पुलिस से रिपोर्ट वापस ले लो और कह दो कि गेट चौकीदार ने रखवा दिया था और वो भूल गया था। वैसे भी वो नशेड़ी है ही, अब वो गेट मिल गया है। मामला रफा-दफा करो। बस मीडिया तक बात न पहुंचे और एक अपने लगे पत्रकार को पूरी कहानी बताकर अपने पक्ष में छपवा लो। प्रबंधक ने ऐसा ही किया। सखाराम नाराज हुआ- साहब, हमे नशेड़ी बताकर बदनामी क्यों करते हो। प्रबंधक ने धमकाया- अबे तेरी वजह से नाटक हुए। वो तो तेरी नौकरी बच रही है, इसके बाद भी बात करता है। चुप्पए रे...। सखाराम चुप रहा।
अब अंततोगत्वा जो हुआ वो जानते चलें- अखबार में खबर विश्लेषणात्मक छपी जिसमें प्रबंधक तक की टांग खिंच गई। बिना बात के सखाराम बदनाम हुआ, हालांकि वो वहां से जाता नहीं तो ये नौबत ही न आती, वो थोड़ा सा दोषी तो था पर इतना था पता नहीं। जमादारिन सोने से सजी या नहीं ये तो पता चल नहीं पाया पर रामकिशन पर सरकारी निर्माण में तोडफ़ोड़ करने का मामला दर्ज हो गया। रामकिशन वापस आ गया, जमानत हो गई पर कोर्ट में केस आ गया। गेट फिर लगाया गया पर अब वो तेढ़ा सा लगा था। इस तरह से गेट की कहानी पूरी हो गई।
गुरुवार, 14 जून 2018
इनका क्या करना है?
क्यों बे...आवाज को सुनकर सलीम, अशरफ, बाबू और मजहर चौंके। देखा तो सामने थानेदार खड़ा था। सलीम बोला- साहब, मालक ने तो माल भिजवा दिया था। हां..पर उसने ही बताया कि यहां क्या हो रहा है? क्या हो रहा है साहब..? मजहर का सवाल था। अबे काली के .. मुर्गे की लड़ाई का जुआ खेल रहे हो- थानेदार तैश में था। नहीं साहब...अशरफ की बात बनाने की कोशिश की। तो ये तंदुरस्त मुर्गों को लेकर क्या दावत मनाने आए हो? थानेदार ने डंडे से इशारा किया। दो तगड़े मुर्गे एक बांस के टोकने से बंधे खड़े थे। सिगरेट फूंकता बाबू उठने लगा तो थानेदार चिल्लाया- वहीं बैठ पिल्लो... हर बार मौका देखकर भाग निकलता है। तेरे से तो गंजेडिय़ों और अफीमची लोगों को ब्यौरा भी लेना है। बाबू ने सिगरेट फेंक दिया। क्यों सिगरेट में क्या था, गांजा..नहीं..अफीम..नहीं... भांग होगी..नहीं-नहीं साहब.. तो क्या था? बाबू चुप रहा...अबे मुफलिसी में छिपकली का चूरा तो नहीं फूंक रहा था। बाबू शर्माया..धत्त...हनुमान...अबे कहां गया? यहां हूं साहब...हवलदार पीछे से आया। इनको अंदर डाल ये मुर्गें भी उठा ले।
जैसे ही हवलदार ने मुर्गों की ओर हाथ बढ़ाया वो चोंच मारने लगे। हाय... अबे हिम्मत कर-थानेदार ने हवलदार का हौसला बढ़ाया। साहब मुश्किल है...अब थानेदार को फिर आया तैश। बता इनको कैसे ले चलें..साहब गीला कपड़ा इन पर रख तो नीम बेहोश हो जाएंगे- मजहर बोला। अबे तो कपड़ा मैं लाऊं और डालूं क्या? एक मिंट(मिनट का देसी रूपांतर) बाबू ने वहां रखा एक कपड़ा उठाकर मुर्गों की गर्दन पकड़कर उनके मुंह पर डाला। घबरा मुर्गें कुड़के.. फिर उनको टोकरे में डाल कर कपड़ा ऊपर से डाल दिया।
सभी थाने पहुंचे। मुर्गों को चारों के साथ लॉक अप में डाल दिया। अब मुर्गों को होश आया तो वो कुड़कने लगे। इनको भूख लगी है- मजहर बोला। बाबू ने जेब से दाने निकालकर डाले। वो चुग गए। शाम तक धीरे-धीरे चारों के बीवी, भाई, दोस्त आकर उनकी जमानत करवाकर ले गए। रह गए तो मुर्गें शाम को फिर वो कुड़कने लगे। लॉकअप में कोई था नहीं मुर्गे आपस में भिड़ गए। वो चारों उनको अलग रखे बैठे थे। अब पंख यहां-वहां उडऩे लगे। अरे रामसिंह इनको ठंडाकर..। दूसरा हवलदार रामसिंह अंदर जाने से डर रहा था। मुर्गों ने लड़-लड़कर लॉकअप में बीट कर डाली, पंख बिखरा दिये। कुछ देर बाद थककर मुर्गें शांत होकर कुड़कने लगे। थानेदार ने देखा। हनुमान..जी साब..ये पैसे लेकर जा और कांगनी ले आ..डाल दे कुकड़ों को... इतने में सिपाही अबरार वहां आया। हुजूर कुकड़े देखकर तबीयत हरी हो गई। मैं इनको साफ करना जानता हूं आप कहें तो दावत...थानेदार का मुंह देखकर वो चुप हो गया।
अब थानेदार ने साहब को फोन लगाया- खान साब..जी, क्या खिदमत करूं। आपके लोग तो जमानत करवा गए। ये मुर्गें रह गए हैं...अरे सोलंकी साहब उनको कौन छुड़ाएगा? आप तो उनको घर ले जाइये। भाभी से कहियेगा, अच्छी नस्ल के हैं। लजीज बनेंगे और अगर आपके यहां मुर्गियां हों तो मेल करवा दीजिए। फोन करना बेकार रहा। जवाब को कुछ समझकर अबरार बोला- मैं तो पहले ही कह रहा था साहब। थानेदार ने देखा मुर्गें कांगनी खाकर फिर से लड़ रहे थे। एक काम कर अबरार इन पर गीला कपड़ा डाल, टोकनी में रख। मैं घर ले जाकर सरोजा से पूछता हूं इनका क्या करना है?
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