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शुक्रवार, 2 जुलाई 2021
प्रायश्चित
छोटे ठाकुर....बकुला ने पीछे से आवाज दी।
एक साधु ठिठककर रुका।
छोटे ठाकुर..बकुला भागकर उनके पास आया।
छोटे ठाकुर..
बकुला...
हां...मालिक
कहां हो आजकल..
छोटे मालिक और कहां होऊंगा..मजदूरी कर रहा हूं..देश आजाद हो गया है..अपनों की गुलामी कर रहा हूं।
साधु हंसा।
हां..हां, हंस लो बाबू..तुम्हारा क्या संन्यासी ठहरे, हम तो जोरू और घरू कोल्हू में पिस रहे हैं बस..
यहां कैसे आये...?
बड़के साले का पिंडदान है बाबू..पर तुम तो तब के गये आज मिले हो..
हां..पर अब न मिलूंगा।
क्यों?
जा रहा हूं बहुत दूर...
बाबू ऐसा न करो..तुम को देखकर चैन आता है बाकी तो..
क्यों क्या हुआ बाकी तो?
बाकी तो अब बाड़ा वीरान है बाबू..
तुम क्या गये..सब..सब लुट गया।
होना ही था एक दिन ऐसा..
पर बाबू तुम गये कहां, ऐसा क्या हुआ? मैं तो गांव गया था लौटा तो कुछ ठीक से पता नहीं चला।
गया..साधु हंसा। गया कहां? अपने पापों की गठरी लिये फिर रहा हूं।
कैसा पाप छोटे बाबू..तुम सा बाड़े कोई न था। तुम देवता थे। देवन थे गांव वालों के, आज भी तुम्हारी बात होती है तो अदब से सिर झुक जाते हैं। छोटी मालकिन आज भी पीहर में तुम्हारी राह तक रही हैं बाबू।
उसे तकने दो..उसका कर्ज अगले जन्म पूरा कर दूंगा।
बाबू तुम्हारी आवाज में बहुत दर्द मालूम होता है। आज कह दो, निकाल दो पूरा दर्द।
इससे क्या होगा?
तुम हल्का महसूस करोगे बाबू..
अच्छा.. तो सुनना चाहते हो मेरे पाप की अनसुनी कहानी... तो सुनो।
वो दोनों घाट पर बैठ गये।
बाड़े में वो नाचने वाली आती थी न..
कौन? अमीरन
नहीं..
कौन?
बड़े नसीबों वाली
नसीबन
हां..उसके साथ एक छोटी लड़की को बचपन में देखा था।
कौन? वो बरखा
नहीं..
सुंदरी..
सुंदरी..
हां, तब मैं 12 साल का था, वो थी 10 साल की। उसकी डरी-डरी मृगिनी से आंखें। मैं तो उसे देखता ही रह गया। पूरे बाड़े हाथ पकड़कर उसे मैंने घुमाया..सबकी नजरों से बचाकर। जब ढुंढाई पड़ी तो पकड़ा गया। सब हंसे बोले- ठाकुर का लड़का है बचपन से ही तबीयत रंगीन है। नसीबन ठुमरी गा रही थी। मैं चुपके से सुंदरी को वहां से ले आया था। लड्डू खिलाये और शर्बत भी पिलाया था उसको। बहुत से बेर भी दिये थे। जो पकड़े जाने पर उसके आंचल से गिर गये थे।
बेर खाकर वो बोली थी बेर तो फीका है हमने उसका जूठा छीनकर खाया वो खट्टा था। हम बोले फीका नहीं खट्टा है। इस पर वो तपाक से बोली मीठे तो नहीं है न...। इस पर हम भी बोल पड़े थे- बेर तो मीठे ही थे पर पूरी मिठास तुम्हारे होठों ने चूस ली है। अब वो पलट कर बोली- चखे हो क्या जो ऐसे बोल रहे हो? हम अवाक् रह गये। बाद के दिनों में इस बात को याद कर वो हंस पड़ती थी।
हर साल नसीबन आती। सुंदरी भी आती। 15 साल का होते-होते मैं सुंदरी से कुछ इस तरह मिल गया कि उसे देखे बिना चैन न आता एक बार घोड़ा दौड़ाते मैं उसके कोठे तक पहुंच गया। नसीबन ने मेरी बड़ी खातिरदारी की और जब पता चला कि मैं सुंदरी से मिलने आया हूं तो उससे मिलवाया भी। जब ये बात जाहिर हुई तो बड़ी डांट पड़ी थी मुझे। आज भी याद है बड़े भैया और पिताजी। पूरा बाड़ा सिर पर उठा लिया था दोनों ने। खैर, मैंने भी रास्ता ढूंढ ही निकाला। मैं बाहर के कामों में रुचि दिखाता और मौका पाकर सुंदरी से मिलने पहुंच जाता। सुंदरी के कुछ लोग मुझे आकर खबर दे देते कि कहां मिलना है? पर इश्क-मुश्क झुपाये नहीं छुपते। अब नसीबन का घर आना होता तो भी सुंदरी न आती। कह दिया था उसको। उसके लोग भी अब न आते। एक बार नसीबन को मैंने अकेले में रोक लिया बाड़े में पूछ डाला पूरा हाल। वो बोली- ठाकुर साहब..हम गाते हैं। बांछड़े नहीं हैं हम। हमारी इज्जत है। पतुरिया जान हमारा अपमान न हो। मैंने कह डाला कि सुंदरी से प्रेम है और उसे हम रखेंगे नहीं। उसे ब्याहेंगे।
नसीबन की आंखों के आंसुओं की तो पूछो मत दस बार पूछ डाला। हम दस बार बोले- ब्याहेंगे...ब्याहेंगे...ब्याहेंगे। फिर पूछा- सुंदरी कहां है? वो बोली- गाना सीख रही है। हमने उससे वादा लिया कि वो हमारी अमानत है उसके पास।
अब हम सारा हिसाब-किताब देखने लगे तो हिम्मत खुल गई। सीना ठोंकर चले जाते सुंदरी के कोठे पर सब समझते मर्द आदमी है। जाना तो बनता ही है उस पर दौलत अकूत। हम सुंदरी से मिलते वो हमारे लिये सजती-संवरती। उसके सोलह श्रृंगार हम पर यूं बरपते मानों हजारों हथियार एक साथ दागे हों हम पर।
उसकी हर लालसा हमारी ही होती मानों उसका कोई अस्तित्व ही न हो। हर बात उसकी यही होती यह उनको पसंद होगा न। यह उनको पसंद आयेगा न। हमें राधाजी और श्रीकृष्ण की कहानी याद आती। हम भी कृष्ण की तरह यही सोचते- इतना मोह न रख पगली। हम तेरे प्रेम के आगे वामन न हो जायें। कहीं काल ने हमें भी अलग कर डाला तो। उससे कहते तो वो गाती- बांधी जिय की डोर तोसे, जाओ जेहि आंगन, बंधो जेहि ठौर, जा न सकि हो दूर मोसे। हमारा प्रेम हमें उसके समर्पण के आगे लघुकाय लगता इस पर कभी हम उसका माथा चूमते तो कभी पैर। इसमें कहीं भी वासना नहीं थी एक श्रद्धा थी न जाने कैसी?
एक दिन वो बोली- आपके नाम से रख लूं करवाचौथ हमने कहा- रख ले..वो बोली- मांग तो सूनी है..हमने तुरंत भर डाली। अब वो मानों हमारे चरण पडऩे लगी। देह की अगन पर बारिद बन बरसो..सात जन्म हम अबहु न तरसो..तुम ही सिंगार तुम ही नाथ...सत्ते जन्म निभाओ ते साथ।।
उस दिन से वो हमारी पत्नी हो गई। उस हमने जैसे ही उसकी मांग भरी वो आनंदातिरेक से उछलती-कूदती नसीबन के पास पहुंची और ये बात उसे बता दी। वो प्रसन्नता को नेत्रों से छलकाती हमारे पास आई और बोली- छोटे ठाकुर, जन्मोजन्म न मिले ऐसा सम्मान दिया तुमने हमको। हमारे कुनबे में ब्याह तो होता पर ऐसी बड़ी हस्ती न मिलती है। सुंदरी खुद राजपरिवार की वंशज है पर किस्मत का खेल। न राजा का नाम मिला न सम्मान।
अब नसीबन ने खुद उसे नववधु की तरह सजाया। मंगलगीत गाया। उस रात हम उसके ही पास रुके।
यहां उसकी जिव्हा मौन हो गई और आंखों में वो दृश्य प्रकट हुआ। चंचल सुंदरी ने सेज पर आते ही मसकदानी (मच्छरदानी) गिरा ली। दूध को स्वयं ही चख लिया।ये उसका शरारती अंदाज़ था और कुछ नहीं। उस रात ऐसी चैन की नींद आई जो अब नसीब नहीं होनी। सुबह जब वो उठा तो देखा। सुंदरी नहाकर कमरे में धूप दे रही थी। वो दीवार पर लगी कान्हा-राधाजी की तस्वीर को धूप देने के लिये कुर्सी पर चढ़ी। उसने देखा कि सुंदरी के पैरों से पानी की एक बूंद बहकर नीचे जा रही थी एक बूंद पायल के घुंघरू पर जमी थी। उसने उठकर हथेली लगाकर बूंद को समेटा और पी गया। वो सकपका गयी- ये क्या करते हो छोटे ठाकुर? हम दब जाये है पाप के बोझ से। इस पर वो बोल पड़ा था- चरणोदक ले रहा हूं प्रेम की देवी का..सात जन्म तर जाइ हैं हम। वो उतर कर बोली- जाओ नहीं बोलते तुम से। वो बोला- नेत्रों से बोल से बोल ही रही हो न...
जाने कैसे ये बात घर पहुंच गई और अब हुआ भाग्य का खेल..हमारी उम्र 20 के करीब थी कि एक दिन अचानक से ब्याह दिये गये हम न मर्जी पूछी न राय मांगी। निर्मला से ब्याह दिया गया हमको। ब्याह के बाद जब हम सुंदरी के पास गये तो वो गंभीर थी आज ही हमने उसे यूं गंभीर देखा। इस पर हमने उसे समझाया कि हम हमेशा उसके ही रहेंगे। जैसे कान्हाजी की परिणीता रुक्मिणी थी पर वो थे तो राधाजी के ही न...बहुत समझाने पर वो अनमने ढंग से मानी और विरहा का गीत सुनाया- धाये..धाये मंदिर, मूरत, नद, नारे..न लौटे सखी न लौटे सखी प्रियवर हमारे। फिरि फिरि जाये केहि भांति कहै जियरा भया अधीर, कान्हा केहि भांति समझिहौं राधा के उर की पीर। बहुत समय में मानी वो हमारी बात।
निर्मला हमारी परिणीता थी पर हम तो सुंदरी के ही हो चुके थे। रोज शाम उसके ही पास जाते। वो हमारे नाम से मांग भरती। हम उसे तोहफा देते कभी पायल तो कभी कंठहार। देर रात लौटते तो निर्मला को देखते..उससे कह भी नहीं पाते कि क्योंकर हमारी राह देखती हो। उसके हम अपराधी हो रहे थे। वहीं सुंदरी का प्रेम हमें डुबाता जा रहा था। बड़के भैया ने एक दिन कुछ लोगों को कोठे पर लट्ठ बजाने भेज दिया। हमको पता चला तो हम वहां जा पहुंचे। हंगामा हुआ..सुंदरी का डरा चेहरा हमें आज भी याद है। हमने चिल्ला-चिल्लाकर कहा- सुंदरी हमारी ब्याहता है। अगर कुछ किया तो कचहरी में मामला पहुंच जायेगा। कोतवाल से कहकर डलवा देंगे कारावास में। शाम को लौटे तो बड़के भैया ने बुलाया। धमकाया हम न माने तो बोले- पतुरिया की जात न जानते हो। हम वहीं चिल्लाये- पतुरिया न कहना मांग भरी है हमने उसकी वो भी निर्मला से पहले। निर्मला ने यह सुना।
हम कमरे में चले गये। दूसरे दिन हम लेखा देख रहे थे कि पता चला। बाग घूमने गई सुंदरी की हत्या कर दी गई है। हम दौड़कर वहां पहुंचे। देखा तो सुंदरी जमीन पर पड़ी थी। बिलकुल शांत। ऐसा लगा कि बुला रही है आइये..स्वामी देखो आज कैसा लेपन किया है हाथों पैरों में तुम्हारी पसंद से सजे हैं हम... कैसा है हमारा मांडना। हमारे कंगन देखो, पैजन की आवाज सुनो। आज कौन सा गीत सुनोगे? उसके हाथों में देखा तो एक अधखुला थैला था जिसमें पके बेर थे। बचपन के प्रेम की निशानी। कच्चे तो वो खुद खा गई थी पके-पके हमारे लिये रख लिये थे। हमारा दिमाग फिर गया।
हम समझ गये किसका काम है। हम घोड़े से बाड़े पहुंचे। वहां अश्वशाला में गये और भीमा, करिया, देशू, नंदू और भाम्भी को संटी से बुरी तरह मारा। वो गिर गये। पर कुछ न बोले। इससे भी मन न भरा तो चाबुक ही चाबुक मारे। इतने में बड़के आ गये। क्यों मारता है इनको?
हमने कह दिया कोतवाली में इनको देंगे कारावास करवायेंगे। बड़के बोले- हमको करवा कारावास। हमने करवाया है ये सब। ये तो निर्दोष है। पतुरिया के चक्कर में बाड़े को लजवाया।
उस दिन हम दहाड़े मार-मार कर रोये। हाय..सुंदरी भी तो निर्दोष थी। हम गये थे उसके पास वो न आयी थी। वो तो समर्पित थी। क्यों मार डाला उसको? हमारा पाप भुगता उसने। हाय हम विधुर हो गये। उस दिन हमने देखा अटारी से निर्मला हमें देख रही थी। सांझ का समय था। हम उस दिन निकले कहकर- पाप हुआ है हमसे..अब न लौटेंगे हम। प्रायश्चित करेंगे जिंदगीभर। बड़के बोले- चला जा..दो दिन बाद वापस आ जायेगा। उस दिन हम निकले तो निकले ही निकले।
हम सीधे कोठे पर पहुंचे। वहां मातम पसरा था। हम वहीं रुके। दूसरे दिन अपने हाथों से उसका दाहकर्म किया। उसे दुल्हन सा सजाया गया था। उसके बाद हम उसकी अस्थियां और राख लेकर उत्तरकर्म करने को निकले पर मन न हुआ और हमनेे अस्थियों का विसर्जन नहीं किया। कोठे से नसीबन ने जो कुछ पैसे दिये थे उससे काशी फिर बनारस पहुंचे। वहीं त्याग दिया संसार को। आलिंगनबद्ध कर लिया संन्यास को। सुंदरी की अस्थियां साथ लेकर तब से ही फिर रहे हैं।
मेरी मानों तो छोटे ठाकुर... सुंदरी की अस्थियों का विसर्जन कर दो..उसे मोक्ष दे दो अपने जीवन से अपनी यादों से। उसका अधिकार क्यों छीन रहे हो?
बकुला..यह भी करने की कोशिश की पर ज्यों मटकी छूते हैं त्यों ही उसकी आवाज सुनाई देती है- छोड़ न देहु पिया, बिसार न देहू छोड़ प्रेम की रीत। जग से विलग पर नीकी है हमरे हरदै की प्रीत। सुनि लो हमको मन महि ओठ सिये न सिये। सीने से लगा रखो हमहु, हम जिये न जिये। हमने कह रखा है जब हम मरे तब उसकी अस्थियों में भली तरह से मिलाकर हमारी अस्थियों का विसर्जन कर दिया जाये।
बकुला यह संसार कितना सजीला क्यों न हो पर मन तो कहीं लगता नहीं। सुंदरी का प्रेम था ही ऐसा कि उसका रंग जो चढ़े तो केहि भांति उतरे..उतरे जिन उतरे। हम जब जाते उसका गीत सुनते। हमने कभी उसे छुआ ही नहीं न उसने कभी हम पर हक जताया। स्पर्श का मोहताज नहीं था ये प्रेम। विवाह की रात भी सेज पर एक ओर हम उसे तकते रहे दूसरी ओर वो। जब वो सोगई तो भी रातभर हम उसे तकते रहे फिर न जाने कब आंख लग गई। उसके उस चित्र को मन में रख रखा है आज तक। याद है हमारी आखरी रात जब उससे मिले थे हम। न जाने क्यों उसको ऐसा अहसास था कि दूसरी रात वो हमसे न मिल सकेगी।
उसने पूछा था- ठाकुर..एक बात बताओ।
पूछ..
अगर तुम हमारी आवाज न सुन सकोगे..हमें देख न सकोगे तो क्या करोगे?
हम इतना भर बोले थे कि तुझसे ही यह दुनिया है..प्यारी, तुम नहीं तो जीवन नहीं।
उस रात वो हमारी छाती पर सिर रखकर बहुत चुप्पय रही। बहुत कहने पर वो गायी और सुबक उठी- उड़ी जई है चिडिया..छोड़ के नीड़-निवाड़, तू जगाते रहियो खोल द्वार किवाड़ रे सजनी खोल के द्वार किवाड़। सखी उड़ी जई हैं..
दूसरे दिन वो सैर करने और झूला झूलने को बाग गई। उसकी सखियों ने बताया। हमारे बचपन का किस्सा कहकर उसने पके-पके बेर हमारे लिये चुने। उस दिन वो बोली हम पूरे हो जाये। नदिया सिंधु महि मिल जाये। उर के कुसुम जेहि-तेहि खिलि जाये। उस दिन वो ऐसा झूला झूली कि मानों अब उसे यह नसीब ही न होगा और हुआ भी ऐसा ही। उसका आखरी गीत था- दे सखी झूलो तेज पिय से मिलन रितु आई। कोई न जाना कि ये पिय हम नहीं कान्हाजी होने वाले थे। जब वो लौटी तो टांगे के करीब ही उसको सभी लोग दिख गये पर वो भागी नहीं। बाकी सब भाग निकलीं। वो भागी नहीं। गला दबा दिया उसका। उदर में खंजर भी उतार दिया। उसके अब वो बोल न सका। कुछ देर में चेतना आई।
अच्छा तो अब हम चलें। रेलगाड़ी का बखत हो गया है।
कहां जाओगे छोटे मालिक..
जहां प्रायश्चित ले जाये...
कभी मिलना चाहो तो कहां मिलोगे...
रमता जोगी बहता पानी कहां रुकते हैं पर कभी आओ तो बनारस में बड़े बाबाजी के यहां से जान लोगे कहां हैं हम? वहां होंगे तो मिल लेना।
बाड़े के बारे में नहीं पूछोगे छोटे ठाकुर...
बाड़ा...संन्यासी का बाड़ा तो यह पूरा भूमंडल है..मैं चलता हूं सुंदरी बुला रही है। वो देखो वहां खड़ी है टांगे के पास।
वो दोनों उठकर चलते-चलते बाहर तक आ गये थे। बकुला ने टांगे के पास देखा उसे तो कुछ दिखा नहीं।
जाते-जाते पीछे से पूछा- कोई पूछे तो क्या कहूँ?
कह देना हम ससुराल चले गये हैं।
२८ मई २१
शुक्रवार, 7 मई 2021
The True hidden by Historians: Durgadas and the Doughter of Aurangzeb
Once hindu warriors attacked on Aurangzeb territory under the leadership of Veer Durgadaas to save the life of hindu prisoners. The soldiers of Aurangzeb ran away leaving the daughter of Aurangzeb back. Hindu warriors took the Daughter of Aurangzeb to Veer Durgadaas.
Veer Durgadaas not only made good separate residence for Aurangzeb's daughter to live until she returns back to Aurangzeb but also appointed an Islamic teacher for her to teach her Hadis and Kuran and he himself looked after herself.
After some time she sent back to Aurangzeb.
Looking her Aurangzeb said- What the Kaffir Durgadaas did with you. I think he tried to mislead you from Islam and its teachings at his level best. But I am sure you failed his every attempt.
She replied- Father, I don’t know who is Kaffir but I know only one thing that he is more greater than us.
Aurangzeb got angry- How dare you are speaking this? I will kill you.
It is the difference between You and Durgadaas. Getting me alone Durgadaas could do whatever he want to me. But he paid respect to me and appointed a special Islamic teacher to teach me. While he is a Hindu a Kaffir in your glimpse. And it is a Allah's order to kill them, rape their women (till they become pregnant by a Muslim man in order to purify them) and sale their children.
She spelled out Kalma.
Now think what could be happened to me, if I could be caught by some begot Islamic leader like you. Your coward soldiers ran away leaving me alone. They even didn't think about the daughter of a Islamic leader? they didn't think about the oath of Islam, they spell out to make you happy time to time? Life is more valuable than Islam?
Answer less Aurangzeb shouted- Take her away from my eyes.
After this incident he said artificially to his court men (while he was feared of Durgadaas)- I have a great duty to make this earth free from Kaffirs. Soon I will launch a great Campaign against Durgadass.
All court man shouted- Allah ho Akbar!
गुरुवार, 24 दिसंबर 2020
ग्वालिन का परमानंद
किसी गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह रोज एक पुरोहित के घर दूध देने जाया करती थी। पुरोहित का घर नदी के पार था। एक बार बारिश के मौसम में नदी ने रौद्र रूप ले लिया। इस कारण ग्वालिन पुरोहित के घर दूध देने नहीं जा सकी। दूसरे दिन जब ग्वालिन पुरोहित के घर गई तो पुरोहित ने उसे डांटा। इस बात पर ग्वालिन ने उसे बताया कि बारिश के कारण नदी का बहाव बहुत तेज था इसलिये वो नहीं आ पाई।
पुरोहित ने ग्वालिन से कहा कि भगवान श्रीहरि के नाम के सेतु (पुल) से लोग संसार के कष्टों की नदी पार कर जाते हैं तो इस उफनती नदी की क्या बात है? यह बात ग्वालिन के मन पर जम गई। अगले दिन फिर तेज बरसात हुई। नदी ने फिर रौद्र रूप ले लिया। पुरोहित को किसी काम से नदी पार जाना था पर वो उसके चरम बहाव को देखकर वापस लौट आया। कुछ देर बाद ग्वालिन उसके घर दूध देने आई। उसे आया देखकर पुरोहित को आश्चर्य हुआ। उसने उससे पूछा कि नदी का बहाव चरम पर है ऐसे में वो उसे पार कर उसके घर कैसे आई। उसी सेतु से जिसकी बात कल आपने बताई थी, ग्वालिन का सीधा सा उत्तर था। पुरोहित कुछ समझा नहीं इस पर ग्वालिन उसे लेकर नदी के पास पहुंची और श्रीहरि के नाम का जाप कर नदी के वेगवान पानी पर चलने लगी। यह देखकर पुरोहित ने भी ऐसा ही करने की कोशिश की पर वो असफल हो गया।
भगवान श्रीहरि विष्णु भावों के आग्रही हैं वह हृदय की पवित्रता और समर्पण देखते हैं स्तर नहीं इसलिये अपढ़ ग्वालिन भगवान की कृपा को प्राप्त कर गई वहीं ज्ञानी पुरोहित असफल हो गया।
बुधवार, 23 दिसंबर 2020
कहानी महादैत्य मिनाटोर की
(ये कहानी ग्रीक की लोक कथाओं पर आधारित है।)
ये कहानी शुरू होती है शक्तिशाली सम्राट एस्थेरियस या कहें एस्टेरिअन की मौत पर, एस्थेरियस जिसकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उसके अनाथ राज्य को साथ मिला उसके सौतेले बेटे और उसकी बेइंतहा खूबसूरत पत्नी यूरोपा और देवताओं के राजा जूस की संतान मिनस का। मिनस ने एस्टेरियस के राज्य पर अपना दावा पेश किया पर उसके सामने मुसीबतें कम नहीं थी इसलिये उसने 12 ओलंपियंस में से पांचवे ओलंपियन समुद्रों और तूफानों के देवता पोसेइडन से प्रार्थना की कि वो उसे अपना प्रतीक एक सांड दें जिससे कि वो अपने दुश्मनों पर यह जाहिर कर सके कि उसका राज्याभिषेक होना देवताओं की भी इच्छा है। उसने वादा किया कि वो राज्य मिलने के बाद उस सांड को पोसेइडन को बलि चढ़ा देगा।
पोसेइडन ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे एक सांड दिया। पोसेइडन ने अपना काम किया और मिनस को राज्य मिल गया।
अब मिनस की बारी थी अपना वादा निभानेे की पर मिनस ने जैसे ही उस सांड को देखा उसका मन बदल गया। सांड श्वेत रंग का और बेहद हृष्ट-पुष्ट था। उसकी सुंदरता और शक्ति को देखते हुए मिनस ने निर्णय लिया कि वो उस सांड की जगह किसी और सांड को बलि चढ़ायेगा और इस सांड को सुरक्षित रखेगा।
शीघ्र ही क्रोधित होने की प्रकृति वाले पोसेइडन इस बात पर नाराज हो गये और मिनस की पत्नी पेसिफे के मन में उस सांड के लिये अनुराग पैदा कर दिया।
मन में इस सांड से संसर्ग की इच्छा से तड़पती पेसिफे ने देवताओं के शिल्पी डिडेलस पर अपनी मंशा जाहिर की। डिडेलस ने उसके लिये एक लकड़ी की गाय बनाई।
पेसिफे ने इस काष्ठ की गाय में बैठकर इस सांड से संसर्ग किया। इस मिलन से पेसिफे गर्भवति हुई और उसने एक विचित्र बच्चे को जन्म दिया। इस बच्चे का सिर एक सांड का और धड़ एक मानव का था।
इस विचित्र बच्चे को इसके दादा एस्टेरिअन ने नाम दिया मिनाटोर जिसे मिनाटोरस के नाम से भी जाना गया।
इस बच्चे ने तेजी से विकसित होना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे वो बढ़ता गया उसकी भूख भी बढ़ती गई। दूसरी ओर बदनामी के डर से पेसिफे ने डिडेलस को एक ऐसी भूलभुलैया का निर्माण करने का आदेश दिया जिसमें से न तो मिनाटोर बाहर आ सके और न ही उसमें जाने वाला बाहर आने का रास्ता कभी खोज ही पाये। ताकि उसकी बदनामी सामने न आ पाये और यदि कोई इस बारे में जानने की कोशिश करे तो वो ही खत्म हो जाये।
बहुत जल्द ये अंधेरी भूलभुलैया महान दैत्य मिनाटोर की आश्रय स्थली बन गई। यहां मिनाटोर को मानव मांस दिया जाता था यहां खासकर उसे एथेंस के चौदह महान ज्ञानवान लोगों को भोज्य के तौर पर प्रस्तुत कर दिया गया जिनको एथेंस शहर से कुर्बानी के लिये हर नौ साल के अनुबंध पर मिनोस के आदेश पर लाया गया था। इसके पीछे मिनोस का बदला भी था जो वो एथेंसवासियों से लेना चाहता था। उसका पुत्र एंड्रोगिनस एथेंसवासियों की जलन का शिकार हो गया था जो उसके द्वारा उनको (एथेंसवासियों) पेनेथेनिक क्रीड़ाओं में हराये जाने से उपजी थी।
मिनाटोर की भूख बढ़ती गई और लोगों की कुर्बानी होती रही। पर जैसे हर रात की सुबह होती है वैसे ही हर पाप का अंत होता है और मिनाटोर का भी अंत था।
एथेंस के दुर्भाग्य को बदलने के लिये भी एक योद्धा का आगमन हुआ। शैतान कितना भी ताकतवर क्यों न हो ईश्वर से उसकी ताकत हमेशा ही कम होती है क्योंकि उसको भी ईश्वर ने ही जन्म दिया था। तीसरी बार जब एथेंसवासियों को कुर्बानी के लिये ले जाया जा रहा था तब इनके बीच थीसियस नामक योद्धा क्रीट की यात्रा करने के लिये इनके साथ चला गया या कि उसे भी मिनाटोर के भोजन के लिये ले जाया गया।
क्रीट में मिनोस की बेटी एरिडन थीसियस को दिल दे बैठी। उसने निश्चय किया कि वो थीसियस की मदद करेगी। उसने देवताओं के शिल्पी और भूलभुलैया के निर्माता डिडेलस से प्रार्थना की कि वो उसे भूलभुलैया का रहस्य बताये। डिडेलस का यह निश्चय कि वो भूलभुलैया के बारे में किसी को नहीं बतायेगा प्रेम की शक्ति के आगे नत हो गया और उसने उस भूलभुलैया को खोल दिया। इस घुप्प अंधकार में मिनोटोर कहां होगा इसका किसी को भी पता नहीं था। अपनी मौत से मुकाबला करने जा रहे थीसियस को एरिडेन ने धागों की गेंद दी जिससे कि वो मार्ग में भटके नहीं। एरिडेन ने अमत्र्य देवताओं से प्रार्थना की कि वो थीसियस की रक्षा करें। एरिडन ने थीसियस को यह भी बताया कि मिनाटोर को उसी के अस्त्र-शस्त्र से मारा जा सकता है। थीसियस ने एरिडन से वादा किया वो जिंदा लौटने की कोशिश करेगा और ये जानकारी मददगार थी। अगर किस्मत में हुआ तो उनका मिलन होगा।
थीसियस भूलभुलैया के अंधकार में गुम हो गया। समझदार थीसियस ने धागों की सहायता से मार्ग को चिन्हित किया ताकि वो वहां भटके नहीं। अंधकार में वो शवों की दुर्गंध से परेशान हुआ, अधखाये शवों से टकराया, नरकंकालों में उलझा और अंत में वो भूलभुलैया के केंद्र में जा पहुंचा। यहां उसका मुकाबला हुआ महान योद्धा मिनाटोर से। थीसियस ने उसे जितना शक्तिशाली समझा था वो उतना शक्तिशाली नहीं था...वो उससे भी अधिक अतुलनीय रूप से शक्तिशाली था। उन दोनों में घमासान युद्ध हुआ जिसमें मिनाटोर का सींग टूट गया थीसियस ने उसी सींग से मिनाटोर की छाती भेद दी और इस प्रकार महान मिनाटोर का अंत हुआ और क्रीट और एथेंस को इस महान राक्षस से मुक्ति मिली।
मंगलवार, 30 जून 2020
दिल बहलाने का सहारा
शर्मा जी दुखी होकर बालकनी से अंदर की ओर जा रहे थे। सामने वाली बालकनी में रहने वाली अमिता कमरा खाली करके चली गई थीं। यह फ्लेट अब बिक गया है और कल ही इसमें नये मालिक भी आ गये हैं। न जाने कैसे लोग हैं? अमिता जब भी आमने सामने होती थी तो एक दिलकश मुस्कान तो देती ही थी भले ही कुछ कहती न हो। दिल बहलाने को वो सहारा क्या कम था। अब न जाने क्या हो? तभी बालकनी का दरवाजा खुला एक गोरी गदराई महिला बालों को सुलझाती हुई पैजन बजाती हुई बालकनी में आई और शर्मा जी को देखकर बोली- नमस्ते जी हमने ये फ्लेट खरीदा है। कल ही शिफ्ट हुए हैं आपका भी खुद का ही फ्लेट है न। उसने लाली लगे भरेपूरे होठों से एक ताजगीभरी मुस्कान बिखेरी। उसके हाथों में मेहंदी का रंग खिल रहा था इस पर लंबे घनेरे गेसुओं का ये अंधेरा। हाँ..हाँ.. शर्माजी से अब कुछ बोलते न बना वो तो बस उसमें ही खो गये थे। आज शाम को आइये न..ये भी घर पर हैं..। अब शर्माजी अंदर की ओर भागे। भाभीजी को साथ लाइयेगा..उसकी आवाज पीठ से आई जिस पर शर्माजी का ध्यान न था। वो अंदर जाकर शर्माइन से बोले- सामने की बालकनी में अच्छे पड़ोसी आये हैं। पड़ोसी या पड़ोसन..शर्माइन ने पूछा। तुम जो समझो..शर्माजी ड्राइंग रूम की ओर चले गये। शर्मा जी सोच रहे थे कुछ भी हो दिल बहलाने का सहारा तो मिल ही गया।
गुरुवार, 25 जून 2020
मौत का सैंकड़ों साल पुराना बसेरा 50 बर्कले हाउस
क्या कुबूल है मौत की चुनौती
कई दुस्साहसी आए और जान की कीमत चुका कर रुखसत हो गए
उसे पसंद नहीं है दूसरों का दखल, वो चाहता है घुसपैठियों की मौत
बस आदर देकर कर सकते हैं उसका सामना
ब्रिटेन में स्थित है 50 बर्कले पैलेस। इस मकान का इतिहास सैंकड़ों साल पुराना है। कहते हैं इसका मालिक एक अय्याश आदमी था और हर रात एक नई लड़की को अपनी हवस की बली वेदी पर कुर्बान करता था यही नहीं वो इनको घर में ही कैद करके रखता था और वहशियत को अंजाम देता रहता था। वो लड़कियां केवल मरकर ही इस कैद से मुक्ति पा सकती थीं और वो मरती भी गईं पर उनकी अधूरी इच्छाओं ने उन्हें यहीं कैद कर दिया और उनका मालिक भी मरकर अपनी हैवानियत से बाज नहीं आया और इस मकान में शैतान के रूप में रहने लगा। ये मकान ब्रिटेन के सर्वाधिक भूतग्रस्त मकानों में गिना जाता है।
कहते हैं कुछ सौ साल पहले दो दोस्त नाविक भटकर यहां आ गए। घर को खाली देखकर वो रात बिताने के लिए अंदर चले गए। घर की मनहूसियत देखकर एक बारगी तो वो खौफजदा हो गए पर नींद और थकान से भारी होते वो दोनों ऊपर जाकर एक कमरे में सो गए। ये कमरा आज भी है और हाईलीएक्टिव यानी सर्वाधिक प्रेतात्मक रूप से सक्रिय माना जाता है। मध्य रात्रि भारी कदमों की आहट ने दोनों को जगा दिया। अचानक उनके कमरे का दरवाजा खुला और एक साया अंदर दाखिल हुआ। पहला दोस्त जो दरवाजे के पास सो रहा था अनिष्ट समझकर बाहर की ओर भाग निकला और दूसरा वहीं अंदर रह गया। उसके साथ अंदर क्या हुआ? कोई नहीं जानता। पहला दोस्त नाविक पुलिस को लेकर वहां पहुंचा तो उसकी रूह कांप उठी और पुलिस भी घबरा गई। उसका दोस्त उस कमरे की खिड़की से नीचे कूद गया था और नीचे लगे लंबे सींखचों में घुस चुका था। उसका चेहरा भयाक्रांत होकर विकृत हो चुका था। वो या तो डर के मारे खुद ही कूद गया था या उस शैतान ने उसे यहां फेंककर मार डाला था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सन् 1887 में दो नाविक व्यापारी जो एचएमएस नेनिलोप से संबंधित थे। यहां रुके थे जिनके साथ यह घटना हुई। दूसरे नाविक व्यापारी का कहना था कि उन्होंने श्रीमान मायर्स का भूत देखा था। जिसने उन्हें आक्रामक रूप से पकड़ लिया था।
कई दुस्साहसियों ने यहां आकर अपनी बहादुरी जताने की कोशिश की पर उन्होंने मौत की जो दहशत भरी इबारत लिखी उसको पढऩे की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाया। एक रात यहां तीन दोस्त रुके हुए थे और उनमें से एक ने शर्त लगाई कि वो ऊपर के कमरे में जाकर पूरी रात गुजार सकता है। बाकी दो ने उसे मना किया पर वो नहीं माना उसने कहा कि यदि कुछ गड़बड़ होगी तो वो घंटी बजाएगा। उसके जाने के चंद सेकंड के बाद घंटी बजी। दोनों दोस्त ऊपर पहुंचे तो पाया वो कुछ देखकर दहशत में है और मर रहा है। उन्होंने उससे पूछने की कोशिश की पर वो कुछ भी नहीं बता पाया और सो गया मौत की नींद में। एक बार एक महिला सफाई कर्मी सीढिय़ों पर सफाई कर रही थी अचानक वो कुछ देखकर सदमें में आ गई। उसने क्या देखा वो उसको कभी बता ही नहीं पाई। वो चलती फिरती लाश बन गई।
अगर इस दुनिया में महाशक्तिशाली परमात्मा है तो जाहिरातौर पर उसकी विरोधी शक्ति शैतान भी है जिसकी शक्ति परमात्मा से कम है पर इंसान से तो ज्यादा ही है।
इस मकान के भूत के बारे में कहा जाता है कि ये एक युवा महिला के भूत का आशियाना है जिसने यहां की ऊंची खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि इस महिला का यौन शोषण इसके अंकल द्वारा किया गया था जिससे वो आहत हो गई थी। ये भी कहा जाता है कि इस महिला का भूत लोगों को इतना डरा देता है कि उनकी मौत हो जाती है। देखने वालों ने बताया है कि इस महिला भूत भूरी झांई की तरह दिखाई देता है यद्यपि ये कभी-कभी सफेद भी दिखाई देता है।
एक अन्य दुर्लभ कहानी के अनुसार इस कमरे में एक आदमी को तालाबंद कर दिया गया था जिसे दरवाजे में बने एक छेद से भोजन दिया जाता था। इसे इस प्रकार से तब तक बंद करके रखा गया जब तक कि वो मर नहीं गया। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां वास करने वाली आत्मा एक छोटी बच्ची की है जिसे उसके वासनातुर नौकर ने मार डाला था।
ये कहा जाता है सन् 1859 से 1870 के मध्य थॉमस मायर्स यहां रहे थे। ऐसी जनश्रुति है कि उनकी प्रेयसी ने उनको छोड़ दिया था। वो यहां अकेले रहे और उन्होंने अपने आप को यहां तालाबंद कर लिया। वो यहां अपने पागल होने और नवंबर सन् 1874 में अपनी 76 साल में होने वाली मौत तक रहे। उनके यहां रहने के दौरान ही इस मकान की भूतग्रस्त होने के रूप में पहचान बनने लगी थी।
ऐसा बताया जाता है कि सन् 1872 में एक शर्त के अनुसार लार्ड लिटलेट इस मकान के सर्वाधिक भूतग्रस्त ऊपर के कमरे में रात बिताने पहुंचे। उनके पास एक बंदूक थी। रात में उनको एक साया दिख जिस पर उन्होंने गोली दागी। इसके बाद दूसरे दिन जब वो उस साये का पता लगाने के लिये घर के निरीक्षण पर निकले तो उन्हें साया तो नहीं मिला पर गोली के खाली खोखे उन्हें जरूर मिल गये।
बाद के सालों में स्थानीय काउंसिल ने इस घर के मालिक को एक समन भेजा जिसके अनुसार वो कर देने में असमर्थ बताया गया था पर वो किसी पर अभियोजन नहीं कर सके क्योंकि ये मकान भूतग्रस्त था और कोई भी इसका दायित्व लेने को तैयार नहीं था।
इस घर की बदनामियां यहीं तक सीमित नहीं हैं। सन् 1879 में प्रकाशित मेफेयर पत्रिका हमें बताती है कि यहां के ऊपरी कमरे में एक नौकरानी रुकी थी। बाद में वो पागल हो गई और दूसरे दिन पागलखाने में उसकी मौत हो गई। इसके साथ ही ये भी कहा जाता है एक सुप्रसिद्ध व्यक्ति ने यहां रात बिताई और वो लकवाग्रस्त और बोलने में असमर्थ पाये गये।
वर्तमान में माना जाता है कि पीटर अंडरवुड की किताब हांटेड लंदन (सन् 1975 में प्रकाशित) के कारण लोगों की रुचि इस भूतहे मकान में जागी थी जो आज भी कायम है। एक मजेदार तथ्य है कि सन् 1930 में जब से मेगस भाइयों ने इस मकान को खरीदा है तब से लेकर अब तक इस मकान में कोई भूतों की घटना घटित नहीं हुई है। यद्यपि मीडिया सूत्रों ने बताया है कि यहां ऐसी घटनाएं हुई हैं। हालांकि निकट वर्तमान में अनवेषणकर्ताओं ने ऐसी किसी भी प्रेत गतिविधि से इंकार किया है पर इनका कहना है कि एडवर्ड बुलवर-लिट्टन की कहानी द हंडेट एड द हंटर्स में उल्लेखित समानताएं 50 बर्कले पैलेस स्क्वेयर में भूतग्रस्त घटनाओं का समर्थन करती हैं।
बर्कले पैलेस में समय के तीन दौर का वर्णन मिलता है- सन् 1872 से 1883, 1879 और 1880 से 1881। सामान्यत: लोगों की यह राय है कि इस घर की अनदेखी ने यहां भूत होने की अफवाह को बढ़ावा दिया है।
लेडी डोरोथी नेविल ने अपनी सन् 1906 में प्रकाशित आत्मकथा में कथन किया है कि श्रीमान मायर्स उनके रिश्तेदार थे। अपनी प्रेमिका को खोने के बाद वो पागलपन की हद को पार कर गये। वो पूरे दिन घर में रहते थे और रात के समय ही सक्रिय होते थे जब वो किंकर्ताविमूढ़ होकर यहां-वहां घूमते और विचित्र आवाजें निकाला करते थे। यह घर रात के अंत पर ही शांत होता था। नेविल का निश्चित रूप से मानना था कि मायर्स की पागलपन भरी हरकतों को लोगों ने भ्रमित होकर प्रेतगतिविधि से जोड़ दिया होगा। वो निष्कर्ष निकालती हैं कि इस घर में प्रेतगतिविधि का कोई प्रमाणित आधार नहीं है और यह सबकुछ एक बकवास है।
आधुनिक अनवेषणकर्ताओं का मानना है कि यह घर कभी भूतग्रस्त था ही नहीं और यहां से संबंधित अधिकांशत: कहानियां या तो अफवाह हैं या बाद के लेखकों द्वारा आविष्कृत हैं। वे उदाहरण देते हैं कि नाविक व्यापारियों के यहां 1870 में यहां आने की कहानी इलियट ओ डोनेल द्वारा बनाई गई थी तथा इस कहानी के किसी भी भाग की प्रमाणिकता साबित नहीं हुई है।
इस मकान को कई लोगों ने खरीदा और बेचा। लोग यहां मरते रहे और दहशत बढ़ती ही रही। इसके वर्तमान मालिक मेगस ब्रदर्स ने यहां के पुस्तकालय बना रखा है। उनका कहना है कि जब भी वो यहां दाखिल होते हैं उनको एक अनजान साये के आसपास होने का अनुभव होता है। वो बड़े ही सम्मान के साथ उससे पेश आते हैं जिस पर उनको लगता है कि वो इससे खुश भले ही न होता पर उनको उनका काम करने भर की इजाजत दे देता है जिससे कि उन पर या उनके किसी कर्मचारी पर कोई आफत न आ जाये। उनका कहना है कि एक बार जब यहां सफाई की जा रही थी तो उनको महसूस हुआ कि कोई उनके पीछे खड़ा होकर बड़ी गंभीरता से यह सबकुछ देख रहा है। उनके कर्मचारी का कहना है कि ये एक आश्चर्य है कि यहां अनगिनत आत्माएं किताबों में घर बनाकर रह रही हैं।
उनके किताबों का काम सम्हालने वाले कर्मचारी का कहना है कि उसने कई बार सामने गैलरी में एक सफेद पोशीदा साए को आते-जाते देखा है। ऐसे कई साए हैं और ये महिलाओं के लगते हैं। उनको अब इसकी आदत हो गई है। वो कहते-कहते बतातें हैं कि अभी जब हम बातचीत कर रहे हैं एक साया सामने से गुजरा है। ये एक बेहद सामान्य सी घटना है और दिन में कई बार घटित होती है। यहां रात में रुकने का साहस कोई नहीं करता और ऊपर वाले कमरे में जो कि प्रेतगतिविधियों को लेकर अतिसक्रिय है कोई नहीं जाता है और अगर वो जाते भी हैं तो वहां उनका आचरण बेहद सम्मान जनक होता है और वो वहां ज्यादा देर नहीं रुकते हैं। रात को यहां कोई नहीं रुकता। इस घर के मालिक बताते हैं कि एक बार किताबों की सफाई करने के अवसर पर उनको लगा कि पूरे समय एक आदमकद साया यह सबकुछ खड़े होकर देखता रहा और उन्होंने उसके प्रति आदर भी प्रदर्शित किया।
कई मौसम बीत चुके हैं पर यहां पर मनहूसियत का साया जस का तस बना हुआ है और ये कब तक बना रहेगा कोई नहीं जानता। शायद ये साया कभी नहीं हटेगा। अगर आप कभी इंग्लैंड जाएं तो एक बार बर्कले हाउस को जरूर देखें शायद आपको वहां ऐसा कुछ दिख जाए जो आपको ऐसी दुनिया पर यकीन करने पर मजबूर कर दे जिस पर आपको कभी भी यकीन न हो सकता हो।
शनिवार, 13 जून 2020
समुद्र: धरती पर जीवन का पिता
समुद्रों का रंगनीला फ्लाइटोपेंटन नामक छोटे जीव के कारण भी दिखता है। अगर अगर एक समुद्री वनस्पति है। समुद्री लाल काई से सीरोटीन/केरोटीन नामक वनस्पति प्राप्त होती है। ये जैली बनाने तथा खाना सुरक्षित रखने वाले रसायन बनाने के काम आती है। लाल काई से अलजरिया प्राप्त होता है। ये कैंसर, डाइबिटीज, ब्लडप्रेशर, अल्सर आदि कई बीमारियों की दवा बनाने के काम आता है। आयोडीन भी एक प्रोटीन है। कोरल रीफ 0.07/0.05 भाग समुद्र में फैली हुई है। यह कुल मिलाकर 1 लाख किमी तक फैली है। भारत की समुद्री इकाई 1800 किमी में फैली है। कोरल बोन ट्रांसप्लॉटमेें महती भूूमिका निभाती है। नर्म कोरल अंडमान, लक्षद्वीप में पाई जाती है। कोरल एक जीव है जो ताजे पानी का आगमन होने पर अंडे देती है। यह समुद्र में ऑक्सीजन सहित अन्य गैसों और रसायनों को संतुलित करती है। यह सुनामी को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये अस्थमा, अर्थराइटिस, कैंसर, त्वचा संक्रमण में लाभप्रद है। मानव द्वारा समुद्र को दूषित करने के कारण भारी मात्रा में कोरल नष्ट हो रही हैं। अगर यह यूं ही नष्ट होती रही तो शीघ्र ही समुद्र में गैसों का संतुलन बिगड़ जायेगा और छोटी मछलियों के आश्रय के साथ ही समुद्र में जीवनदायिनी गैसों का अंत भी हो सकता है जिससे समुद्री जीवन नष्ट हो जायेगा। समुद्रों की कार्बनडाइऑक्साइड शोषित करने की क्षमता भी समाप्त हो जायेगी और मानव को इसका भारी मूल्य चुकाना होगा।
समुद्री हार्स शू क्रैब भी लाभप्रद जीव है। यह समुद्र के सबसे प्राचीनतम जीवों में से एक है। इसका अवतरण अमीबा के साथ ही होना निश्चित किया जाता है। इसने इंजेक्ट करने पर एचआईवी के विषाणु को खत्मकर दिया। हालांकि मानव स्वार्थों की बलिवेदी पर चढ़ा यह जीव अपने जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है। समुद्र स्पंज भी लाभप्रद है। कैंसर में ये लाभप्रद है। ये अदभुत जीव है।
शार्क को समुद्र का सफाईकर्मी कहा जाता है। यह फुर्तीली और बेहद खतरनाक मछली घायल, बीमार और कमजोर जलीयजीवों को खाकर समुद्र में संक्रमण फैलने से रोकने में महती भूमिका निभाती है। ऐसा माना जाता है कि यदि शार्क नहीं होती तो समुद्र एक विशाल तरल कब्रस्तान में बदल गया होता। यह 11 किमी दूर से ही पानी में रक्त को पहचान कर तुरंत ही जीव पर प्राणघातक हमला कर देती है। इसके कटीले दांत शुद्ध डायमंड की तरह मजबूत और धारदार होते हैं। खारे पानी की इस भयानक मछली के हमले अमेरिका और पश्चिमी देशों में इंसानों पर आम हैं। एक सर्वे के अनुसार इसके हमलों में मरने वालों की संख्या लगभग होने वालों सड़क हादसों में मृतकों की संख्या के बराबर ही है।
शार्क को ही समुद्र का सबसे घातक शिकारी कहना बेमानी बात होगी और यह नाइंसाफी होगी उस महान मछली के खिलाफ जिसे इसके कातिलाना अंदाज के कारण किलर व्हेल कहा जाता है। किलर व्हेल शार्क से भी ज्यादा घातक शिकारी होती है। यह समूह में शिकार करती है और सील जैसे चतुर जलीय जीवों सहित खुद शार्क और अपनी ही जाति की व्हेल का काम तमाम कर देती है। इस विशाल देहधारी को ओरका भी कहा जाता है। यूं तो यह बेहद खतरनाक होती है पर इंसानों पर इसका हमला होने की बात कम ही सामने आती है।
समुद्र की बात हो और मानव से मित्रवत ब्लू व्हेल, बेलूगा व्हेल और डॉल्फिन का जिक्र न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। समुद्र में इनका मित्रवत व्यवहार इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करता है। वैज्ञानिकों को मानना है कि यह पूर्व समय में एक विशाल स्थलीय जीव रही होंगी पर समुद्र में भोजन और सुरक्षा मिलने के चलते यह समुद्र आश्रित हो गई होंगी। समुद्र में डॉल्फिनों द्वारा मार्गभटके जहाजों और मानवों को रस्ता बताने की कहानियां रोमांचक होती हैं। यही नहीं डॉल्फिन को अन्य मछलियों और उनके बच्चों को भी मार्ग दिखाते देखा गया है। इसको जो भी चीज सिखाई जाती है यह उसे तुरंत ही सीख लेती है जिससे पता चलता है कि इनका आईक्यू और सोचने का तरीका काफी कुछ इंसानों जैसा ही है।
समुद्र को जीवन और धरती का पिता कहा जाता है। भारत में समुद्र को देवता का रूप देकर इसके मानव जीवन में महत्व को स्वीकार किया जाता है। भारतीय समुद्र की पूजा करते हैं और इसके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। समुद्र मानव के लियेे भोजन का भी एक मुख्य स्रोत है पर मानव की अपूर्ण क्षुधा के कारण यह खाली होता जा रहा है। मानव मत्स्यबीजों के विकसित होने से पहले ही विशाल जालों को डालकर इन्हें अपनी क्षुधापूर्ति के लिये उपयोग करता है जिसके कारण समुद्र में नई मछलियां आ नहीं पाती हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मानव अपनी क्षुधा के कारण समुद्र को भी खाली कर डालेगा।आज जरूरत है कि हम समुद्र को वहीं सम्मान दे जो कि हम धरती को देते रहे हैं। समुद्र हमारे पर्यावरण तंत्र का अमूल्य और अचल स्तंभ है। यह पृथ्वी के पर्यावरण तंत्र को लगातार प्रभावित करता रहता है। हमें अनंत काल तक पृथ्वी और जीवन की सुरक्षा के लिये समुद्र की रक्षा करनी चाहिये ये हमारा दायित्व और आने वाले युगों के प्रति कर्तव्य है।
शुक्रवार, 15 मई 2020
कहानी एक मंगनी प्रसंग की
गांव की एक वीथिका में एक घर में कुछ उत्सव का माहौल था। सामने कुछ चमकीली पन्नियां धागों में लटककर हवा के थपेड़े खा-खाकर निढाल होकर शुन्य में लटकी थीं। घर के सामने अनगढ़ रंगोली डली थी।
हवा में सौंधी-सौंधी सी गंध थी, अजीब सा आलस्य पसरा था यहां। अम्मा चमकीली लाल साड़ी में सजी यहां-वहां घर और घर के सामने डोल रही थीं। उनको देखकर ऐसा लग रहा था मानों हिंडिंबा को किसी ने लाली चुनरी में लपेट दिया हो।
पता नहीं हो तो आपको बता दूं कि आज राधा यानी इस घर की एकलौती बेटी को देखने के लिये लड़के वाले आने वाले थे, बात थी कि इसी वक्त मंगनी भी हो सकती थी। घरद्वार सजा था। अम्मा इस ठीकरे से घर की व्यवस्था का ऐसे मुआयना कर रही थीं कि मानों शायद इतनी कवायद तो बाबा आदम की शादी में फरिश्तों ने भी नहीं की होगी।
घर में दो भाभियां थीं छुटकी घर के अंदर तो बड़की बाहर की व्यवस्था सम्हाल रही थीं। कुल जमा ग्यारह लोग आयेंगे। सबके कपड़े-लत्ते, मिलनी-मिलानी तैयार है कि नहीं।
लड़के को ग्यारह सौ रुपये, एक अंगूठी, बुशर्ट-पतलून और कोट का पैसा सिलाई के साथ, एक घड़ी अच्छी वाली देने की बात तय थी। मोटर सायकल तो शादी के समय देना है। बाकी लोगों को एक सौ एक रुपये, मिठाई का डब्बा, शर्ट-पतलून का कपड़ा, साड़ी औरतों के लिये साथ ही साथ मेवे और कुछ नमकीन के पाकट देने हैं।
अब देखें भावी दुल्हन की कहानी, वो कमरे में दब-छुपकर नेहा के नाम से अपने प्रियवर से बातें कर रही थी।
तुम तो अम्मा के आंचल से बंध जाओ बस.. तुम्हारी उस फटफटी को आग लगा दो जिस पर हमको घुमाया करते थे। हम यहां मंगनी करेंगे वहां तुम कुएं में डूब मरो।
अरे ऐसा न बोल, चल किसी बहाने से घर के पीछे बछिया के बाड़े के पास कच्ची सड़क पर आजा शाम सात बजे। तुझे लेकर शहर चले चलता हूं। जो डर न करे तो आजा- प्रियवर का जवाब था।
राधा ने यहां-वहां देखा- अच्छा हम आते हैं पर कपड़े..।
उसकी फिकर न कर..कर लेंगे जुगाड़, वहीं माता मंदिर में हो जाएगा चटमंगनी पट ब्याह- व्याकुल नायिका के लिये यह आश्वासन उस समय उपयुक्त था।
यहां आंगन में छुटकी की मदद कर रही थी पार्वती, पार्वती जिसका महेश पर दिल था, जिसकी मंगनी राधा से हो रही थी। पार्वती ने महेश को गांव की वसुधा की शादी में देखा था वहीं से दिल में उसकी लगन लग गई पर आज उसका दिल जार-जार हो रहा था। मन तो होता था कि फूट-फूट कर रोये। महेश भी उसे ब्याह में पूरे समय घूरता रहा था फिर गा रहा था- सेज सजा दे सजनी। वो इस बात पर शर्मायी भी थी।
छुटकी की धरम की बहन और इस परिवार की धरमबेटी थी पार्वती। गरीब जातभाई की इस बेटी का अब तक का आधा जीवन इस घर में परिवार सदस्यों के बीच ही बीता था वो उसे घर का सदस्य ही मानते थे। सांझ को वो घर लौट जाती थी पर आज काम ज्यादा था इसलिये सांझ पड़े मदद के लिये बुला लिया था। खैर, महेश का परिवार आने वाला था रात आठ बजे। थककर पार्वती उठी- जाती हूं जीजी। अच्छा जा पर जब मंगनी हो तो आना जरूर।-छुटकी ने आमंत्रण दिया। बिना पावक के जलती पार्वती को वो गीत याद आया- राजा की आयेगी बारात..। हम देखेंगे जीजी घर में काम न हुआ तो आयेंगे। पार्वती दिल की जलन छुपाती निकल गई।
यहां घर के भीतर भावी दुल्हन का एक-एक पल भारी बीतता था। दुल्हन सी सजी राधा ने घड़ी देखी और सात बजने में पांच कम थे तब बड़की को चकमा देकर वो भाग निकली। उसके प्रियवर मधुसूदन शर्मा वहां इंतजार कर ही रहे थे झट बैठाया फटफटी पर फट से फुर्र हो गये दोनों।
जब राधा न आई तो ढुंढाई मची। खेत पर खेल रही मौसी की नन्हीं पोती ने तुतलाते हुए बताया कि लाधा दीदी एक ललके के थात गाड़ी पल बैतकर भाल गई...
अब तो घर में हंगामा हो गया। साढ़े सात बज रहे थे। दोषारोपण में समय खराब करने से अच्छा था कि आपदा का समुचित प्रबंधन किया जाये। बड़के भैया ने तुरंत दिमाग लगाया। चाचा की बेटी कौशल्या को बुला लाओ बोल देना कि हम लगन करवा रहे हैं महेश के साथ। चाचा की हालत पतली है सो वो मना न करेंगे। सांप भी मर जायेगा घर की इज्जत भी न जायेगी। महेश को हम समझा लेंगे कि राधा न सही कौशल्या से ही कर लो ब्याह। मोटर सायकल के साथ 11 तोला सोना दे देंगे।
दोनों भाभियां तनती रह गईं।
चाचा घर पर नहीं थे। बात सुनकर चाची ने कौशल्या को छुट्टन के साथ भेज दिया। इसकी मंगनी करवा दो शादी भी करवा देना- चाची बोली।
वैसे भी भरीपूरी लौंडिया भाग गई है इज्जत बचाने के लिये हमारी लड़की का ब्याह तो करवाना ही पड़ेगा- उन्होंने सोचा। आज मौका पडऩे पर पुरानी शत्रुता की गांठ ढीली पड़ गई थी। जिसका चाची पूरा लाभ लेना चाहती थी।
कौशल्या को ले आये। पौने आठ हो रहा था जल्दी-जल्दी उसे सजाया। भाभियों ने बाल सुलझाये जो महीनों से उलझे थे जुएं-लीखें भी निकालीं। वो नहायी भी न थी सो उसे पाउडर और खुश्बू से नहला दिया। क्रीम की परत पर परत चढ़ा दी।
बड़के दरवाजे से भीतर आये- कुसल्या को सजाया कि नहीं वो आते ही होंगे।
इतने में चाचा वहां आ धमके वो सीधे ठेके से ही निकल आये थे। घर पर जैसे ही पता चला कि कौशल्या को ले गये हैं तो वो नशें में वहां आ पहुंचे।
बड़के, हमारी बेटी हमारी बेटी है हम ही उसे ब्याहेंगे। भले ही दूल्हा निपट कंजरा ही हो। तुमने हिम्मत कैसे की हमारे घर आने की?- चाचा गुस्से में था।
बड़के ने बात सम्हाली- चाचा अभी घर जाओ। कौशल्या जैसे तुम्हारी बेटी वैसे ही हमारी बेटी। पुरानी बातें भूल जाओ।
अबे गधेड़े जो पुरानी बात भूले वो कुकर का मूत, कौशल्या हमारी बेटी है, उसे हम ही ब्याहेंगे, उसे वापस भेज -चाचा मानने को तैयार न था।
बड़के का मन हुआ कि पहले की तरह एक बार फिर से उसकी टांग तोड़ दें पर आज मामला नर्म था।
चल बेटी-चाचा कमरे में अंदर घुसने लगा। सबने सम्हाला पर वो न माना। जब ये नौटंकी चल रही थी पार्वती वहां आई। वो छुटकी से सिलाई-कढ़ाई सीख रही थी। उसी मामले में कुछ पूछने आई थी। उसने देखा चाचा कौशल्या को खींच कर ले गया। उसने पूछा तो किसी को न बताने की कसम देकर छुटकी ने सारी बात बतायी।
पार्वती बोली- जीजी, घर वालों का न बताओ तो बताऊं।
बोल परवा- छुटकी बोली। परवा पार्वती का घरु नाम था।
जीजी, मां से कहो, उनको मना लो तो हम महेश संग..-पार्वती की आधी बात सुनते ही छुटकी का मन शांत हुआ पूरी की बात ही छोड़ दो।
अरे छोड़ो शराबी को, पार्वती के घर जाओ और बोल दो कि हम पार्वती का लगन करवा रहे हैं। हमारी तो धरम बहन है ये-छुटकी की बात सुन छुट्टन पार्वती के घर की ओर दौड़ गये।
चल, परवा..छुटकी उसे कमरे में ले गई।
आठ पांच हो रहे थे। सभी घबराये हुए थे। न जाने कब महेश आ धमके।
कुछ देर बाद छुट्टन आये, वो शांत थे, पार्वती की अम्मा गौरी ने कहा है कि जैसे हमारी बेटी वैसे तुम्हारी...। बस बात पक्की करने से पहले इनको (पार्वती के पिताजी) लड़के वालों से जरूर मिलवा देना। आखरी फैसला तो इनका ही होगा।
अब कुछ राहत थी। पार्वती के बाबूजी को मनाना आसान ही था। गरीब वो थे ही और यदि शादी का खर्च उनकी जेब से न जाये तो पार्वती की खुशी में वो अपनी खुशी ही देखते थे। वैसे भी पार्वती उनकी भी धरमबेटी थी। उसने अब तक का आधा जीवन उनके साथ ही बिताया था। बस बात थी तो महेश को मनाने की। रात साढ़े आठ बजे महेश पधारे। साथ में पिता, मां और कुछ बंधु-बांधव थे।
घर में सबने तय किया था कि पहले महेश और पार्वती एक-दूसरे को देख लें फिर वो मान-मनौव्वत करेंगे। पार्वती को छुटकी लेकर आईं तो महेश चौंक गया। ये तो वो न थी जिसकी तस्वीर भेजी गई थी। बड़के बोले- वो क्या है कि आप क्षमा करें। राधा का दाखिला शहर के बड़े कॉलेज में हो गया है आज दोपहर को ही खबर मिली। वो पढऩे को अड़ गई और शहर निकल गई। अपनी बात रखनी थी इसलिये हम चाहते हैं कि आप छुटकी की धरम बहन और हमारी धरमबेटी पार्वती को हमारी बेटी राधा की तरह ही मान दें।
बड़के सोच रहे थे कि अगर बात न बनी तो पर महेश के बाबूजी तो खुद उसकी अम्मा को भगाकर लाये थे। उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? महेश के बड़के भैया के तो घर के सामने झाड़ू बुहारती मेतरानी से ही नैना चार हो गये थे। वो उसे ही ब्याह लाये..वो कुछ बोलेंगे या नहीं...। कुछ क्षणों के मौन के बाद महेश के बाबूजी बोले-भई, ब्याह तो महेश को करना है वो जाने..
महेश तो बाबूजी की इस बात का इंतजार ही कर रहे थे। पर वो जानते थे कि बात टाली तो मुसीबत हो सकती है, उनका बस चलता तो वो आज ही पार्वती को ब्याहकर ले जाते, सीधे-सीधे बोलना भी ठीक नहीं है। उसने बात बड़के भैया पर डालते हुए कहा- भैया जो बोलें।
आपको बता दें कि छुटकी भौजी महेश के बड़के भैया की किसी समय में प्रेमिका रही थीं ये और बात है कि बड़के का चंचल मन मेतरानी पर स्थिर हुआ और वो उसे ब्याह लाये पर प्रेम तो प्रेम है नयन से नयन में ही सारी बातें कर लेता है। महेश भी इस बात को जानता था और उसे यकीन था कि भैया हां ही करेंगे। छुटकी की नाराजगी दूर करने और पुराने प्रेम को जगाने का यह भला मौका जान पड़ा महेश के बड़के भैया को वो बोले- आप हमारे परिचित हैं खानदानी हैं इसलिये आपकी धरम बेटी हमारे घर की बेटी। हमारी ओर से तो बात पक्की आगे आप जो जानें.. पार्वती की जान जो सांसत में थी वो खिल गई।
तो भई देर किस बात की..आवाज उठी। अरे, जाकर पार्वती के बाबूजी और अम्मा को भी बुला लाओ। वो आये और इसके साथ ही रस्म अदायगी होने लगी।
सोमवार, 27 अप्रैल 2020
साढ़े तीन कुआरियां
कमरे में हलकी रोशनी थी, एक मोमबत्ती जल रही थी। जया, विजया, चैताली इस अलसाये माहौल में बैठी एक दूसरे का मुंह ताक रही थीं। चैताली की गोद में एक छोटा चौरस तकिया था जिसे वो कभी गोद में दबाती कभी छाती से लगाती।
जया जो इन दोनों में बड़ी थी अपने भारी सांवले चेहरे और कुछ थुलथुले बदन के कारण अलग ही नजर आ रही थी।
दीदी, आई की नहीं- चैताली की आवाज उठी।
आती होंगी-विजया ने आश्वासन दिया।
जया ने पीछे दरवाजे की ओर देखा।
दीदी... जया की भारी आवाज उस घुटन में घुट गई।
दीदी अंदर आई तो शांत माहौल में हलचल हुई। गर्मी की चढ़ी दोपहर ऊंघने का सबसे उपयुक्त समय होता है। तीनों अलसायी हुई थीं। तभी दीदी की आवाज आई- अम्मा की चिट्ठी आई है।
अम्मा की चिट्ठी- जया की आंखों के सामने जीवंत हो उठा एक दृश्यक्रम। अम्मा का भारी चेहरा, माथे पर बड़ा भारी बिंदा, फूले हुए होंठ। भारी हाथ उससे भी भारी आवाज-जया...ओ जया...भईया का बैग कहां है? वहीं होगा सोफे पर- जया की आवाज होती। अरे जरा आकर बता दे...उफ्फओ अम्मा...भाभी को बोल दो न..अरे वो रसोई में भात पका रही है...जरा देख दे न..आई मां- जया बालकनी से पाव पटकती भीतर आती। धम..धम, इस बीच उसके बड़े भारी पैरों में पड़ी मोटी पायजेब भी बज उठती।
भाभी के पीछे अम्मा कहती- तुझे काम के लिये बोलना पड़ता है वर्ना भाभी क्या समझेगी कि ननद तो मजा करे हम सजा भरें।
जया काली थी पर न जाने क्या गजब का आकर्षण था उसके अंदर। गली के लड़के उसे इस तरह घूरते कि पास पड़ोस की गोरी कन्याएं जलकर भस्म हो जाएं। जो लड़का उसे देखता उससे पहली ही बार में शादी करने को आतुर हो जाता पर जब कुछ समय बीतता, सारे मामले उठ खड़े होते। लड़की काली है, नौकरी नहीं करती, दान-दहेज क्या देंगे? लड़के वाले मुंह से थोड़े ही न मांगेंगे। लड़के को काया चाहिये, बाकी बातें वो न विचारेगा उसकी चिंता तो परिवार को ही करनी होगी न। लड़की एक अदद बदन है लड़के के लिये।
जया बनती-संवरती मुस्काती, किसी अंजान पर जाने-पहचाने स्पर्श का अनुभव कर लज्जातुर होती, यौवन मदमाता पर धीरे-धीरे समय बदला। लड़के के परिवार आते रहे जाते रहे। कोई कुछ बोले न बोले पर मां के चेहरे पर चिंता की लकीरें हर बार और से और स्पष्ट होती गईं। अब जया चोटी भी गूंथती तो भाभी मुस्की मारतीं- लो हो गईं अप्सरा तैयार, हाय री आज न जाने कौन मरेगा? भैया देखते और निकल लेते-इनका तो बस यही काम है।
कुछ लड़के वाले हां करते तो मामले यह निकलते-कोई तलाकशुदा, कोई दुहेजु, कोई परित्यक्त, कोई विकलांग, कोई विधुर तो किसी की लुगाई भाग निकली, लोग मजाक करते ये तो मर्द ही नहीं था बेचारा। कोई-कोई तो कारण ही न बताते- न जाने क्या बात है कहीं कोई बीमारी तो नहीं है?
मनीराम नाम के आदमी का तो किस्सा ही अनोखा निकला। ताई जी ने बताया- अरे ये तो नामर्द था, पहली तीन बीवियां वंशवृद्धि के लिये कभी तो देवर कभी जीजा के हवाले हुईं तीसरी पर तो इसके बाउजी ही पिल पड़े। तीनों भाग निकलीं। अखबार में भी तो मामला आया था। बड़ी मुश्किल से इसके परिवार ने पिंड छुड़ाया। अम्मा ने उससे हाथ जोड़ लिये पर अब अम्मा बोली- बेटी, नखरा न करना जो मिले उससे ब्याह ले। जया ने भी कह डाला- कुएं में ढकेल दो पर एैरे-गैरे से हम न ब्याह करेंगे।
भैया कहते- ताई तो घर में आग ही लगाना चाहती है। आप और उनकी बात को तवज्जो देते हो, ऐसे ही रहा तो ये रहेगी कुंआरी। लापरवाही और कुछ गुस्से में जया कहती- रहेंगे तो हम न कुंआरे तुमको क्या? भाभी धीरे से कहतीं- कुंआरी का लाढ़ कौन रखेगा? अम्मा जानती थीं उनके बाद जया का निबाह कैसे होगा? ऐसे में जब दीदी के गृह उद्योग और रहने के ठिकाने का पता चलने पर अम्मा ने जया को समझा-बुझाकर यहां दूसरे शहर भेज दिया। अब वो कुछ निश्चिंत थीं कि अगर वो ऊपर-नीचे होती हैं तो भी जया को दीदी का तो सहारा है ही न। थोड़ी-बहुत जो सिलाई-कढ़ाई जया ने सीखी थी वो यहां काम आई। अम्मा ने कहा था कि अब चिट्ठी तभी लिखेंगे जब बारात द्वार पर होगी। यहां रहते-रहते सबसे इतना अपनत्व हो गया था कि शादी की बात दुख ही देती।
कहानी वर्तमान में आई। चिट्ठी सबके लिये आई है- दीदी बोली। सबके लिये चिट्ठी- विजया के मन में तडि़तपात सा हुआ। अब वो अपने विचार क्रम से प्रत्यक्ष हुई।
विजया कॉलेज के होस्टल में रहकर होमसाइंस की पढ़ाई कर रही थी। वहां अन्य मित्रों के साथ उसकी भी चिट्ठी यूं ही आती थी पर चिट्ठी मां नहीं भाभी लिखती थी। भाभी सरकारी स्कूल में मास्टरनी थीं। भाई जब रोमांटिक होते तो उनसे कहते- हमें भी कुछ सिखाओ न, आज क्या सिखाओंगी वगैरह-वगैरह जिस पर भाभी का प्रतिउत्तर ऐसा ही बेमजा होता था जैसे जैन कुल्फी भंडार की ठंडी कुल्फी जिसमें दूध से ज्यादा पानी का स्वाद होता था। खैर , अम्मा थी काला अक्षर काजल टीकी बराबर इसलिये जो बात होती वो भाभी को बोल देती और वो उसे लिख देतीं जिसे वो समझकर कर पढ़ लेती। भाभी की हिंदी कमजोर थी न वो अंग्रेजी की अध्यापिका जो थीं। इसलिये उसे समझकर पढऩा होता था। ये कौन कहे कि वो जुगाड़ से लगी थीं, उनको कुछ न आता था पर अपने मटके को कौन कुम्हार फूटा कहता है।
एक दिन अम्मा ने लिखवाया कि श्रीवत्स जी के अग्रपुत्र शतांशु की मां ने सत्संग में पूछा है कि तुम्हारी पढ़ाई कहां तक पूरी हुई है? अब कितनी पढ़ाई बाकी है? एक अच्छी सी फोटो खिंचवाकर भेज दो न।
विजया की सखियों ने जब ये पोस्टकार्ड पढ़ा तो हंस-हंस कर पेट पकड़कर बैठ गईं। विजया ने कह रखा था कि ऐसी बातें हों तो इन्लेंड लेटर भेजा करो।
खैर, विजया खुद ही घर जा पहुंची। शतांशु पूरे परिवार सहित उसके घर आया। आज तो भाभी ने खुद विजया को सजाया। हाथों में मेहंदी, पैरों में आलता, बालों में गजरा मानों आज उसकी शादी ही हो। अरे आज मेरी शादी थोड़े ही है- विजया खिलखिलायी। हमारी बेटी है, सजेगी-संवरेगी नहीं तो बात ही क्या? तू तो बिना सिंगार के भी पार्वती सी सुंदर है-भाभी का जवाब था। फिर वो खुद ही बोलतीं- काजल लगा ले नहीं मेरी ही नजर न लग जाये।
सभी को पूरा विश्वास था कि शतांशु से ही विजया का विवाह होगा। शतांशु विजया को देखकर ही हां बोल गया पर होना कुछ और ही था। शादी की बात हुई ही थी कि अगले दिन से शतांशुु उनके घर आने लगा। विजया ने एक दो दिन तो हलके में लिया इसके बाद वो होस्टल जा पहुंची शतांशु वहां भी जा पहुंचा। विजया इस विश्वास के साथ शतांशु से प्रेम करने लगी कि यही उसका भावी वर है। वो उसके साथ घूमने चली जाती। प्रेम की सीमाओं के अंत पर हर तरह की दूरियां कम होने की स्थिति हो गई। यहां उसके परिवार वालों ने कुछ नगद और समान सहित गाड़ी की बात संकेतों में ही उन लोगों तक पहुंचा दी।
भाभी ने कुछ नहीं लिखा पर उसकी दोस्त जो वहीं रहती थी ने उसे यह सब बताया चूंकी उसकी मां भी सत्संग में उनके पास ही बैठती थी। यह जानकर विजया ने शतांशु से कहा कि अगर मुझ से प्यार करते हो तो दहेज क्यों? शतांशु ने आश्वासन तो खूब दिये पर मामला अटकता गया आखिर में विजया ने हिम्मत दिखाई और शतांशु से सीधे बात की तो वो अप्रत्यक्ष रूप से धमकी के लहेजे में बात करने लगा अब विजया ने उसे गार्ड के सामने थप्पड़ रसीद कर डाला। देख लूंगा-उसने धमकी दी फिर वो चलता बना।
विजया ने इस मामले को तवज्जो नहीं दी पर दूसरे दिन भईया का फोन आया। उन्होंने कहा कि शतांशु से माफी मांगो। विजया ने भी कह डाला कि उस गधे से माफी की बात क्या वो तो उसे चप्पल तक मारने के लायक नहीं समझती। फिर मुंह न दिखाना- भईया नाराज हो गये। विजया ने भी कह डाला अब उस घर का मुंह देखूं तो कोढ़ लग जाये।
विजया कुछ चिंतित होस्टल में बैठी ही थी कि उसकी दोस्त संतोषी वहां आई और उससे कहा कि उसकी एक दीदी को एक सहायक की जरूरत है। दीदी का घरेलू उद्योग है, कुछ ही महिलाएं और लड़कियां उनके साथ जुड़ी हैं। उनके घर में मुफ्त रहने का इंतजाम है, खाना भी मुफ्त ही समझो तनख्वाह ठीक-ठीक और समय पर मिलेगी। संतोषी जानती थी कि अब विजया का विवाह मजाक बनने वाला है।
विजया दीदी से मिली और नौकरी पक्की होने पर भाभी को फोन लगाकर बता दिया। तब से वो यहीं है। वर्ना उसकी शर्म उसे डुबो ही देती। प्रेम की पराकाष्ठा और फिर एक छल से विजया का मन द्रवित हो गया था। शादी को लेकर अब उसके मन में कोई विशेष तरंग न थी। भाभी ने लिखा था कि इन्लेंड लेटर तभी लिखेंगे जब शादी की बात होगी। वर्ना पोस्टकार्ड ही मुफीद होगा। अगर पोस्टकार्ड पर शादी की बात लिखी तो चिट्ठी मानो सबके लिये हो जायेगी...सबके लिये, एक मजाक। विजया के मन में बात खटकी कि अगर शादी की बात फिर सामने आ गई तो...वो दीदी का साथ छोडऩा चाहती ही नहीं थी।
भई, सबसे खास तो चैताली की चिट्ठी लगती है- दीदी बोली। सबसे खास चिट्ठी- चैताली की आंखों में घर का दृश्य घूम गया। उसे चिट्ठी लिखने वाली थी उसकी बड़ी बहन भद्रिका जिसने खुद शादी नहीं की थी उसका एक एनजीओ था। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। बहन ने उसे पाला-पोसा था, एक बार उनकी शादी का प्रकरण भी उठा था पर बात बन नहीं पाई। भद्रिका का क्रांतिकारी व्यवहार बहुधा उनके रिश्ते में बाधक बन जाता था। चालीस पार की इस महिला से शादी करने की बात सोचने वाला सबसे पहले यह सोचता था कि उनसे निभेगी कैसे? एक बार एक चैताली को खान नेताजी के भतीजे ने छेड़ दिया तो भद्रिका उसके पक्ष को लेकर पुलिस स्टेशन गईं पर जब बात न बनी तो उन्होंने ब्रम्हास्त्र का संधान कर डाला। ब्रम्हकुमार भट्ट नेता थे और एनजीओ के चक्कर में भद्रिका से दोचार होते रहते थे। उन्होंने भद्रिका के फोन करने पर पुलिस को लताड़ा और अपने खास गुंडों को भेजकर भतीजे को धमकाया। भतीजा शहर छोड़कर भाग गया।
चैताली भद्रिका के त्याग को समझती थी इसलिये उसने मर्यादा को कभी लांघा नहीं। दोस्ती रखी तो सिर्फ लड़कियों से लड़कों से उसका व्यवहार दूर से ही था। हालांकि उसके ही भीतर कहीं एक व्यक्तित्व था जो उससे विपरीत था पर वो उसकी बातों पर ध्यान न देती थी।
भद्रिका कहती- चैताली जब तेरे लायक लड़का मिल जायेगा तो उसका पूरा बायोडाटा चिट्ठी में लिख भेजूंगी। वो तेरे लिये सबसे खास चिट्ठी होगी। जब भद्रिका को लगा कि वो काम में ज्यादा मसरूफ होने वाली है तो उसने चैताली को दीदी के पास भेज दिया। भद्रिका के एनजीओ से सालों पहले दीदी के गृहउद्योग का पाला पड़ा था तब दोनों में दोस्ती हो गई थी जिसके परिणामस्वरूप अब वो दीदी के साथ थी।
चैताली का मन भी यहां से जाने या शादी करने को था ही नहीं।
अब तीनों वर्तमान में थीं। हमारी छोडिय़े दीदी अपनी कहिये। अपनी कहिये- दीदी के कानों में बात गूंज उठी। दीदी जिनका नाम था विभाषा। दीदी की शादी सालों पहले हो चुकी थी। पति का नाम था देवकुमार। पर इनकी कथा भी विचित्र सी थी। शादी के बाद जब वो माता पूजन के लिये जा रही थीं तभी पूरे परिवार के सामने एक महिला प्रकट हो गई। उसने फोटो के साथ बताया कि वो देवकुमार की अनब्याही पत्नी है। दोनों परिवार के लोगों ने उसे डांट-धमका कर भगा दिया। वो पुलिस लेकर आ गई। हंगामा हो रहा था कुछ रिश्तेदार छुपकर मुस्कुरा रहे थे तो कुछ हंस रहे थे। बस, दीदी इस माहौल से निकलकर बाहर आ गई। वो अपनी एक टीचर के घर जा पहुंची। टीचर का दुनिया में कोई नहीं था। दीदी वहीं रही- माता-पिता, रिश्तेदार आये बहुत समझाया पर दीदी वापस नहीं गई। टीचर के घर से ही गृहउद्योग की नींव पड़ी। दीदी सबकी बात सुनती पर जब कोई त्रस्त कहता हम तो जगत-जमाने के मारे हैं हमारी छोडिय़े अपनी कहिये तो दीदी मुस्का देती। अम्मा ने कहा था- हम दिल के मरीज हैं अगर चिट्ठी लिखकर लड़का बताएं तो शादी कर ही डालना..वर्ना हम तो..दीदी का डर तीनों से अलग न था।
अब तीनों ने अपनी-अपनी चिट्ठी पढ़ी।
जया ने सबसे पहले चिट्ठी पढ़ी और मुस्कायी।
अरे क्या हुआ?
जरा हमें भी तो बताओ।
सारा मजा खुद ही मार लोगी क्या?
जया बोल पड़ी- अम्मा ने लिखा है, अपनी शादी तो तुम खुद ही जानों जो तुम्हे भाये या दीदी बताये उससे कर लो शादी, यहां तो हमारी नजर में अब कोई नहीं है। वाह, अब हम तो दीदी के साथ ही रहेंगे।
पर दीदी ही ब्याह गईं तो? चैताली के सवाल पर तीनों असहज हो गईं।
अब विजया ने अपनी चिट्ठी खोली, पढ़ा फिर खिलखिलाकर हंसी।
इस हसीं का मायना क्या?
अरे, ये तो शादी की बात सुन बावली हो गई।
अरे जरा हमें भी तो कहो विजया दीदी।
हंसी को कुछ पल रोककर विजया बोली- अरे वो श्रीमान शतांशु को सजा हो गई, दहेज मांग रहे थे। भाभी ने लिखा है कि भईया तो कान के कच्चे थे जो कह दिया माफी मांग। तू सयानी है, सांवली सालोनी है सुंदर भी है तुझे तो कोई पोपटलाल ही न करेगा। अपने विवाह का तू स्वयं ही निर्णय ले और जब लड़का फाइनल कर ले तो यहां बता देना। फेरे की रस्म तो यही होगी न।
इनके बाद चैताली ने उत्साह से चिट्ठी खोली, फिर मुस्काकर उत्साह से बोली- अरे कोई मुझे चिमटी खोड़ो..
क्या हो गया छुटकी?
जरूर शादी पक्की हो गई..वो भी धनपति से
धन..धना..धन..धनपति
अरे, ये बात नहीं है..भद्रिका दीदी शादी कर रही हैं।
वाह..
वाह...
हें...
अरे सुनो तो सही लिखा है, चैताली अब तू सयानी हो गई है शोडषी नहीं रही..तेरे प्रति मेरे बहुत कुछ कर्तव्य का निर्वाह हो चुका है..मैं अब अपने जीवन को कुछ सजाना चाहती हूं।
अरे आगे बोल न।
शादी लगी भी तो लगी किससे?
किससे?
अरे वहीं भट्टजी से!
तीनों उत्सुक थीं।
आगे लिखा है- भट्ट जी के विचार और मेरे विचारों में काफी समानता है। हम काफी समय से साथ हैं। अब इस साथ को एक रिश्ते का नाम देना चाहते हैं अगर तू चाहे तो। अरे मेरा तो पूरा सपोर्ट है कर डालो शादी।
तो कब चलें दावत खाने।
लो मैं तो लगे हाथ वाट्सअप कर देती हूं कि अभी कि अभी कर लो शादी।
ये हुई न बात..
अब तीनों ने खुशी-खुशी दीदी का मुंह देखा। चैताली ने फोन में कुछ टटोला। कुछ किया कि नहीं पता नहीं।
दीदी ने खत पढ़ा और उदास हो गईं।
क्या हुआ?
कहो न?
शादी की बात हो गई क्या?
तीनों के भय और उदासी को देख दीदी हंसी।
अच्छा तो हमारा मजा ले रही थीं।
ये क्या हो रहा है हूं...
ये तो गलत है दीदी
अब दीदी माहौल में हलचल पैदा करतेे हुए बोली- अरे, अम्मा के पास कुछ जमा पूंजी है उन्होंने लिखा है शादी के लिये रखी थी, तो शादी तुम जब करो तब करो ये पैसे आकर ले जाओ।
अब तीनों निश्चिंत हो गईं।
खत एक ओर फेेंके। जया और विजया ने दीदी के कंधे पर सर रख लिया। चैताली दीदी की गोद में सिमट गई और दीदी ने आंखें बंद कर लीं। तीनों ऊंघने लगीं।
मंगलवार, 14 अप्रैल 2020
बेसहारा.....
ईसा से 3000 साल पहले मिश्र की एक अनोखी कहानी। इस कहानी से पता चलता है कि मिश्र की सभ्यता और संस्कृति उस समय कैसी थी और लोगों का जीवन और उनके आचार-विचार कैसे थे।
जोराह और अरफा दोनों जुड़वां भाई मिश्र के एक उपनगर में रहते थे। मां थी मरियम पिता था जुराज जो मिश्र की सेना में सिपाही था युद्ध के दौरान मर चुका था। मरियम का प्रेम जुराज के छोटे भाई से था जिसका नाम था इकरा। इकरा एक नजूमी-ए-ख्वाब, स्वप्र ज्योतिष था। उसने मरियम को बता दिया था कि जुराज मारा जाएगा। जूराज का व्यवहार मरियम के लिए वाहियात था और वो उसे प्रताडि़त ही करता था। ऐसे में जब वो लड़ाई पर जाता था इकरा उसे प्यार देता और उसके जख्मों पर मल्हम लगाता। नगर के राजपर्व होने पर वो मरियम को लबादा ओढ़ाकर गधे पर बिठाकर यहां वहां घुमाता। मरियम का मासूम चेहरा गहरी आंखे। इस पर तीनों जहां और फेरोस की सारी दौलते भी कुर्बान हों। 11 आत्माएं (मिश्र के लोगों का मानना था कि इंसान के जिस्म में 11 आत्माएं होती हैं।) उसके एक बोसे से तृप्त हो जाएं और मन चाहा वर दें या फिनिक्स का तोहफा अदा कर दिया जाए तो भी मरियम को कोई समझदार इंसान नहीं छोडऩा चाहेगा।
मरियम का विवाह जूराज के साथ होना भी एक अजब संयोग था। मरियम को पैदा होते ही उसके माता-पिता ने बेटा होने की आस में उसे देवी नौहीद के मंदिर के पुरोहित को सौंप दिया। पुरोहित ने उसे पाला-पोसा। जूराज ने युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाया था। इस पर पुरोहित ने उसका विवाह मरियम से करवा दिया या कहें तो उसे पुरस्कार के रूप में दे दिया। जूराज उसे पवित्र नहीं मानता था खैर, जूराज के मरने के बाद मरियम के पास एक ही रास्ता था कि वो नगर के हरम में चली जाए। वैसे भी ज्यादातर बेसहारा और खूबसूरत औरतों का यही ठिकाना था। देश-विदेश के लोगों का यहां आने का यह एक मुख्य कारण था। (मिश्र को विश्व की सबसे खूबसूरत वेश्याओं का नगर माना जाता था। यहां आने वाला हर एक शख्स उनके हरम में एक न एक बार जरूर जाता था। माना जाता था कि वहां की वेश्याएं संतुष्टि देने में सबसे अच्छी मानी जाती थीं। कुछ लोग तो यहां की यात्रा ही इसी कारण से करते थे जिनमें विश्वभर के अमीर लोग शामिल थे।) पर मरियम को मिला इकरा का साथ। इकरा और मरियम के रिश्ते को पाकिजदगी की वो हद मिली थी जहां जिस्म सीफर हो जाता है।
इन दिनों मरियम एक स्वप्र को लेकर परेशान थी। उसने देखा था कि फिनिक्स नील नदी पर उड़ रही है। उसके पंजों में फेरॉस और अन्न और रसों के थैले थे। इकरा ने जब यह सुना तो चिंतित हो गया। मिस्र को अपना दूध पिलाने वाली नाइल (नील नदी) अपना रास्ता बदलने वाली है। पूरा शहर उसकी धारा की ओर ही जाएगा। शहर कब्रगाह सा हो जाएगा। फेरॉस एक षड्यंत्र का शिकार होगा और कयामत आएगी। यह था इस स्वप्र का फल।
पर जोराह और अरफा इस बात से खुश थे कि नगर में उत्सव होने वाला था। फेरॉस को बेटा हुआ था। नगर में उत्सव का माहौल था। जोराह और अरफा को इस बात का इल्म जरा भी नहीं था कि ये जश्र कयामत का जश्र होगा। नगर में नंदी निकलेंगे धूम मचेगी। मामथ (बालों वाला झबरा हाथी जो अब विलुप्त हो चुका है।) की खाल ओढ़कर नाच भी होगा।
फेरॉस महल के ऊंचे हिस्से बच्चे को लोगों को दिखाएगा। कीमती पत्थर और मुद्राओं की बारिश होगी। पर मरियम ने उनको पहले की कह दिया था कि नगर से बाहर न जाएं खासकर वहां जहां संगतराशी हो रही थी पिरामिडों के लिए वर्ना पता चलेगा कि उनको भी गुलाम बनाकर संगकारी में लगा देंगे। उन दोनों ने कहा कि वो वहां नहीं जाएंगे पर जब पिरामिड बनेगा वो उसे देखने जरूर जाएंगे पर वो दिन कभी नहीं आने वाला था।
निश्चित दिन से एक रात पहले अचानक शहर में कोहराम मच गया। सड़कों पर घोड़े दौडऩे लगे और लोगों को पता चला कि हब्शी सेनापति हेथाडॉरस ने फेरॉस की हत्या कर दी है। राजरानी और उनका शिशु अब उसके कब्जे में हैं। अब से हेथाडॉरस ने लोगों को कहा कि वो राजधानी बदले वाला है। समुद्र की मां नील नदी मार्ग बदल रही है। फेरॉस की पत्नी अब हेथाडॉरस की हयात में शरीक थी। वो अब उससे उम्मीद से थी। एक यंत्रवत सी उसकी अपनी कोई हस्ती ही नहीं थी।
भयभीत लोगों ने शहर छोडऩा शुरू कर दिया। मरियम ने भी शहर छोड़कर नील की नई धाराओं की ओर जाने का फैसला लिया। इकरा ने मरियम को कहा कि वो नहीं जाए क्योंकि तीन दिन और तीन रात की कयामत होगी। पर वो नहीं मानी और निकल गई। उसने वादा किया कि वो व्यापारी की पत्नी अलम्मा की कनीज बनकर बगदाद जा रही है और वो उसे वहां जरूर मिलेगी। अगर वो आता है तो। उसकी इल्तेजा थी कि वो भी साथ चले। वहां उसका काम भी अच्छा चलेगा। पर इकरा नहीं गया। कारवां निकल गया पर बीच रास्ते में पर्शियन हमलावरों ने इन पर धावा बोल दिया। जोराह और अरफा भगदड़ में फंस गए अफरा तो किसी तरह उसे मिल गया पर जोराह नहीं मिला। मरियम अरफा को लेकर छिप गई। हमलावरों ने लोगों को गुलाम मनाया और सामान लेकर भाग निकले। इसके बाद रेगिस्तान की रेत में तेज बवंडर उठा और तीन दिन तक मरियम लाशों के बीच जोराह को ढूंढती रही। जोराह नहीं मिला वो गुलाम बनाकर ले जाया जा चुका था। आखिर में वो अरफा को लेकर लौट आई। इकरा मरने की कगार पर था। उसे खांसी चल रही थी। मरियम वहां पहुंची तब तक उसके हाथ में भूख-प्यास से मर चुके अरफा का मृत देह था। इकरा ने उसे देखा और आखरी मुस्कान के साथ बोला- काश तुम्हारे लबों पर लुकमान का लेह होता। शहर में वीराना था और हरम की लौंडिया भी नई धाराओं की ओर जा रही थी। मरियम ने इकरा की मृत देह को देखा और फिर अकेली निकल पड़ी। वो कहां गई किसी को पता नहीं चला बस रह गई उसकी खुशियों की कब्र और आंसुओं का मातम।
सोमवार, 30 मार्च 2020
किसी और की इज्जत
सिपाहीराम अपनी पत्नी मंदा को लेकर को लेकर गलियों में फिर रहा था। शाम का धुंधलका पडऩे में कुछ ही समय बचा था। कहीं से कोई टांगा या बैलगाड़ी मिल जाये तो स्टेशन तक पहुंच जाये और फिर वहां से शहर निकल जायें पर ऐसा कहां होना था? वो बदहवास जा ही रहा था उसके पीछे उसके दूधमुंहे बच्चे को गोद में दबायें उसकी महरू यानी पत्नी मंदा। तभी उसे घर के सामने से जाते देखकर बड़े घर के दरवाजे पर खड़ा ठाकुर का नौकर दत्तू चिल्लाया- अरे आज गाड़ी न मिली हो, तीज है आज रात गुजारने को अंदर आ जा महरू को भी ले आ। मंदा अंदर जाना न चाहती थी पर सिपाहीराम अंदर जा घुसा। उसने भी सोचा गाड़ी न मिली तो कहां रात का निर्वाह होगा? अंदर ठाकुर बैठा था आंच पर मुर्गा था और शराब की दावत होने वाली थी। ठाकुर के घर की औरतें रतजगे को देस की सारी औरतों के साथ माता मंदिर पर थीं। ठाकुर का नौकर दत्तू यूं तो सिपाहीराम को रोकता नहीं पर मंदा को देखकर उसका मन डोल गया। ठाकुर कहता था- शराबियों के तीन बाब- एक भी न हो तो मजा खराब-सुन रे मनवा कर रख याद-शराब-कबाब और मस्त शबाब।
सुसराल जाती मंदा रीत के मुताबिक सोलह श्रृंगारों से सजी थी। खूबसूरत तो वो गजब की थी ही उस पर ये नखरा। ठाकुर खुश हो जायेगा।
दोनों अंदर पहुंचे। मंदा ठाकुर से पर्दा कर रही थी। कोन है रे तू। यहां से दसवीं गली में जो रूपवती काकी है न मैं उनका जमाई सिपाहीराम और ये...
पता है..पता है- उसने हुक्का गुडग़ुड़ाया। आज तो तीज थी फिर क्यों ले जा रहा है? मंदिर पर रतजगा था वहां ना भेजा। सासुरी ने कहा नहीं आज त्यौहार है नहीं जाना है। रात रुक जाता कल चला जाता।
जो बात तो सही ठाकुर सा. पन मेरी चाकरी की खातिर जाना जरूरी है।
के काम करता है तू?
हुकम, सहर के चिट्ठीखाने में डाकिया हूं।
तो तू तो वही रहा डाकिया डाक लाया..डाकिया डाक लाया- वो हंसा।
हां, हुकम..
और तेरी घरवाली..क्या नाम?
मंदाकिनी- दत्तू के मुंह से एकदम से निकला। इससे सिपाहीराम असहज हो गया। ठाकुर ने दत्तू को घूरा।
मंदा...मंदावती- ठाकुर बोला, हमारे बाड़े में जब भी भजन होता अम्मा मंदा को बुलातीं और ये राधा-किशन के रास में राधा बनकर नाचती थी और किशन बनती थी वो..
रसीली- दत्तू के मुंह से फिर निकला। सिपाहीराम फिर असहज हो गया। ठाकुर ने फिर से दत्तू को घूरा।
रसाल, अब तो वो हमारे चचेरे भाई की ब्याहता है और बाड़े के पीछे के मकान में रहती है। मंदा मिली के नहीं उससे- ठाकुर का सवाल था जिसके जवाब में मंदा सिर हिलाकर हलके से बोली- हूं।
अंधेरा हो रहा था। शराब को देखकर मंदा और सिपाहीराम कुछ असहज थे सो ठाकुर ने दत्तू को बोला- नीचे के मुसाफिरखाने में इनको ठहरा दे। दो गिलास दूध दे दे और कुछ मांगें तो दे देना। गादी, गोदड़ा, बिछावन वहीं हैं लालटेन वहां कर देना। नीम का धुआं अच्छे से देना।
दत्तू उन दोनों को लेकर सामने के कमरे पर पहुंचा और दोनों को अंदर ले गया। सिपाहीराम की नजर शराब और मुर्गे पर थी जिसको ठाकुर भांप गया था। कमरे में दत्तू ने जल्दी-जल्दी झाड़ू बुहारी। गोदड़ा झटकारा। मंदा गोदड़ा बिछाकर उसपर अपने दूधमूंहे बच्चे को लेकर बैठ गई अब तक बच्चा भी उठ कर रोने लग गया।
अलेलेले..हमार मुन्ना..हमार चुन्नू, ए...-मंदा अपने बच्चे को लाढ़कर दूध पिलाने लगी।
उसकी आवाज सुनकर ठाकुर के जमा पांच लोग हंसने लगे। जिनकी आवाज मंदा ने न सुनी। कुछ देर बाद सिपाहीराम दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। उसका अंदाजा था कि उसे कबाब और शराब जरूर मिलेगी। यहां बोतलें खुल ही रही थीं कि सिपाही को देखकर वो लोग चौंके।
सिपाही झेंपी हंसी हंसकर बोला- हें..हें, पार्टी हो रही है।
पियोगे लाला..एक आवाज आई।
हूं..
जियो हो लाला जियो-बड़े छुपे रुस्तम निकले तुम तो।
आओ यहां बैठ जाओ।
सिपाही उनके बीच जा बैठा और मुर्गे की टंगड़ी शराब के साथ गुड़ककर वहीं टुन्न हो गया।
ठाकुर यह सब बैठकर देख रहा था। अब वो उठा और सामने मुसाफिरखाने की ओर चला गया।
सब खुश थे कि ठाकुर के बाद उनको भी मिलेगी मंदा। मंदा की जिस्मानी गर्म खुश्बू को महसूस कर सभी रोमांंचित हो रहे थे। ठाकुर ने उड़काया दरवाजा खोला तो देखा, गोदड़ा बिछा था जिस पर मंदा बैठी थी। बच्चा उसकी गोद में दूध पीते-पीते सो चुका था। ठाकुर को देखकर वो चौंकी।
ठाकुर सा. पैरन लागी अब छोड़ दे मने।
उसके गजरे की महक कमरे में फैले नीम के धुएं की सौंधी गंध में भी साफ आ रही थी।
बस.. भूल गई जब मैंने तेरा हाथ धरकर तुझे चिपटा लिया था अपने सरीर से। तब तो तूने कुछ कहा नहीं था। थारे होठन का जायका अब तक हमारे मुंह में रसता है। वो रस हम अब तक न भूलेे। तुझे लड़की से औरत बना दिया तब भी तू चुप ही रही।
ठाकुर तब में गांव की इज्जत थी पन अब में सिपाही की इज्जत हूं- मंदा बोली।
ठाकुर का नशा एकदम काफूर हो गया। वो बाहर आया और सांकल लगा दी हाथ में ल_ा उठाया और सीढिय़ों पर बैठ गया।
जो मंदा के साथ मजा करने का अरमान लिये उस ओर आने वाले थे, उनको धमकाते हुए ठाकुर ने कह डाला- अब यहां कोई पैर न धरे वर्ना सिर खोल डालूंगा। उसकी आवाज मंदा ने भी सुनी। ठाकुर नशे में था फिर भी वो अकेले दस के बराबर था। लट्ठ भी उसके हाथ में था।
धीरे-धीरे रात कटी सुबह सिपाही को होश आया तो उसने देखा कि सभी वहीं थे। ठाकुर सीढिय़ों पर उनींदा सा था। सिपाही को देखकर वो उठा और सांकल खोली देखा तो मंदा बच्चे साथ वहां सो रही थी जो हलचल सुनकर उठी।
सिपाही न जाने क्या समझा और बोल पड़ा- घणी खम्मा, ठाकुर सा. आप हमारे देवान हो। इसके बाद सिपाही मंदा को लेकर वहां से निकलने लगा। जाते-जाते मंदा ने ठाकुर का मुंह देखा जिस पर एक अजीब सा संतोष था। उसने ठाकुर के पैर छू लिये। दत्तू वहां एक टांगा ले आया था जिसमें सिपाही और मंदा को बिठा दिया। सिपाही टांगा चलाने वाले के पास बैठा था। टांगा निकल गया। कुछ समय के लिये ठाकुर की आंखों के सामने भूतकाल का एक चित्र घूम गया। मंदा या मंदावती या मंदाकिनी..उसके घर आती थी ठाकुर मौका पाकर उसे छेड़ा करता था वो कुछ न कहती थी। उसने उसे हर उस स्तर तक प्रताडि़त कर दिया था जो कि असामाजिक था। ठाकुर ऐसा उसके साथ ही नहीं कई और लड़कियों के साथ भी कर चुका था। यह ठाकुर का वर्चस्व ही था कि वो या कि कोई भी गांव की लड़की जिसे उसने छेड़ा था वो उसके खिलाफ कभी बोल न सकी।
जब तक मंदा गांव की इज्जत थीं, ठाकुर ने उसे छेड़ा पर अब वो अपने पति की इज्जत है उसके घर की इज्जत है जिस पर ठाकुर का कोई अधिकार नहीं था। ठाकुर आज बेहद गिरा हुआ महसूस कर रहा था। कुछ दूर मुड़ते समय तक ठाकुर उनको देखता रहा। जब टांगा मुडऩे लगा तब मंदा ने ठाकुर के हाथ जोड़े। फिर वो अदृश्य हो गये।
तीज का जागरण समाप्त हो चुका था औरतें लौट रही थीं और उनके गीत का स्वर दूर से ही सुनाई दे रहा था। ठाकुर के घर रातभर से जमें उसके दोस्त अब निकल रहे थे। उसका एक दोस्त बोला- रात को क्यों तूने इज्जत के खाखरे कर दिये? पूरे मजे की ऐसी की तैसी कर दी। अब वो गांव की नहीं किसी और की इज्जत है- इन शब्दों के साथ ठाकुर घर में वापस चला गया।
शनिवार, 28 मार्च 2020
एक थी नायिका
ये क्या मोल दिया?
दो रुपया...
रुक जा
उसने ब्लाउज में हाथ डाला। एक हथेली भर का पर्स निकाला। दो रुपया दिया और बिंदी के पैकेट को थैली में डाल लिया। सांवला भरापूरा बदन लटकते वक्ष और साड़ी से बाहर आने को मचलता पेट और निकलती नाभी। अरे चल..उसने अपने बच्चों को डपटा जो हाट में यहां-वहां मस्ता रहे थे। पैरों में मोटी पायल जो काली सी पड़ चुकी थी। भारी सी आवाज- जोक्या इधर चल। जोक्या यानी जोगिया और सुल्ला यानी समीर इस औरत के बच्चों का नाम था। इस औरत का नाम था-कामी। वैसे तो इसका नाम कामिनी था जिसे देखकर काम की आग पैदा हो जाए पर इसका नाम कामी हो गया जो कि इसके पिता ने इसे प्यार से दिया था। असल बात तो थी कि इसका नाम काली रखा गया था पर मां को शर्म आई और काली कामी हो गई। कामी पूरे बाजार-हाट घूमती और सामान सस्ता जो होता ले लेती।
इसका पति केवल एक अखबार में काम करता था। वो एक कंपोजर था जो कि अखबार के लिए खबरें चलाया करता था। वो जो शाम के छह बजे से जाता तो अखबार निकलने के बाद यानी ढाई-तीन बजे रात को ही लौट पाता था। जब वो लौटता तब वो दरवाजा, जो भेड़ा कर यानी अटका कर रखा जाता था, खोलता था और थककर चूर होकर कामी को उठाता वो उसे खाना परोसी और फिर लेट जाती। रात को जब काम न होता था तो वो अपने साथियों के साथ वयस्क फिल्में देखता और जब वो ऐसा करता तो रात में आकर बड़े प्यार से कामी के पैरों को सहलाकर उसे उठाता या उसके पैरों को चूम ही लेता। कभी गुदगुदी भी करता। कामी समझ जाती और सोने के बजाए जागती और फिर दोनों डूब जाते प्यार के समंदर में।
कामी एक कमरे के मकान में रहती थी। वहीं चौका वहीं सोना। एक पलंगपेटी थी जिस पर वो जोक्या और सुल्ला को सुला देती और खुद जमीन पर गंदला सा गद्दा जिसे आप गोदड़ा कह सकते हैं बिछाकर सो जाती। वहीं एक ड्रम जिसमें कपड़े और स्टोव सहित दूसरे जरूरत के सामान जो कम उपयोग में आते थे रखा होता था एक अद्दा सा टीवी जिस पर वो सास-बहू के सीरियल देखती और फिर वैसा ही फैशन करती, रखे होते थे।
आज कामी खुश थी आज ही के दिन उसका और केवल का विवाह हुआ था। वो सोलह श्रृंगार से सजी थी, लाल घाघरा-ओढऩी, उसका ब्याह हुआ था, वो भी केवल के साथ। इश्......श कामी शर्म से और काली पड़ जाती। उसका रोम रोम सिंहर उठता। शाम को शादी और उसी रात सुहागरात....वो उसको याद करती और गीत गाती- साजना है मुझे सजना के लिए...जो कि बेहद बेसुरा लगता।
पर आज जो हुआ वो उसपर किसी वज्रपात से कम न था। आज केवल की छुट़्टी थी और वो घर पर नहीं था। इस पर कानू भैया ने बताया कि उसका तो किसी दूसरी औरत से चक्कर है और वो उसके साथ सिनेमा देखने गया है सिनेमा का नाम भी था- ये प्यास कब बुझेगी। हें...रातरानी टॉकीज, जिसमें ऐसी वयस्क फिल्में लगती थीं, पास में ही था। वो वहां जा पहुंची। सिनेमा छूटी तो देखा केवल सैव्या के साथ निकला। वो खुश था कुछ बोल रहा था और सैव्या भी हंस रही थी। सैव्या कामी की पुरानी दोस्त थी। वो इससे पहले जहां रहती थी वहीं सैव्या भी रहती थी। शायद वहीं से इनका चक्कर शुरू हो गया होगा। सैव्या ने तो वहीं अपने पति को छोड़ मारा था।
अब कामी उनके सामने जा पहुंची। उसे देखकर वो घबरा गए। कामी ने सैव्या को पकड़कर उसका जूड़ा नोच लिया। भरे हाथों से मुक्के और थप्पड़ रसीद किये। अपने पति को छोड़कर मेरे पति पर डोरे डालती है। सैव्या को पिटता देख। केवल आगे आया-उसे छोड़ दे...अब मैं उसके साथ रहूंगा। तुझे आधी तनख्वाह दे दिया करूंगा। और क्या मेरे बगैर सो सकोगे...कामी ने पूछ डाला। अब ज्यादा डेकोरेशन मत कर घर जा। इतने में वहां दो हवलदार आ गए। और दोनों पक्षों को कचहरी ले जाए। सैव्या को थानेदार जानता था। वो उसका भी चाहने वाला था। मामले में पति ने कह दिया कि कामी के साथ नहीं रहूंगा चाहो तो जान से मार डालो। कामी अधूरे मन से वापस आ गई। अपनी पत्नी से अलग रह रहा उसका भाई कानू उनके पास आ गया।
लोग कामी को देखते तो मुस्कियां मारते। उसने पुराना घर छोड़ दिया और नए टापरे में आ गई। उसने पति को तनख्वाह देने से भी मना कर दिया। कानू मार्केट में सब्जी का ठेला लगाता था उसकी मदद से कामी ने भी सड़क किनारे सब्जी बेचना शुरू कर दिया। सब्जी के व्यापार में उसे कई लोगों से दो-चार होना पड़ता। कुछ उससे अच्छे से पेश आते तो कुछ शब्दिक बलात्कार कर डालते। बदमाश किस्म के लोग उसके अंगों की तुलना रसीले फलों से करते और लार टपकाते पर वो भी धीरे-धीरे दुनियादारी सीख गई। वो दबंग की तरह व्यापार करती, गालियां देती और व्यापार में चोखापन लाती। मोलभाव और बतियाने के चलते महिलाओं में वो लोकप्रिय हो गई। उसके ठिये पर महिलाओं की भीड़ होती।
इस बीच पास की एक सब्जी बेचने वाली छबीली से उसका टंटा भी हुआ। छबीली सभी से मजाक मारी करती यहां तक कि उसके तो कई सब्जीवालों से अंतरंग संबंध भी थे सो सभी उसकी ओर बोलने लगे। ऐसे में उसको साथ मिला कन्हैया का जो उसके पास ही बैठकर धंधा करता था। वो उसकी मदद करता। कामी उसकी ओर आकर्षित होने लगी। कन्हैया का परिवार पास के गांव में था। एक दिन कामी ने उसकी मदद करने की गरज से उसका टोकना उठा लिया जिसमें सब्जी थी और वो उसे लेकर उसके एक कमरे के मकान पर पहुंची जहां वो किराए से रहता था। वो अंदर गई उसने टोकना रखा इस बीच कन्हैया पास के कॉमन बाथरूम में हाथ-मुंह धोने गया। कामी ने उसका कमरा देखा। एक लोहे का पलंग, पानी का मटका और दीवार पर भोजपुरी अभिनेत्री का घाघरा-चोली वाला बेहद कामुक पोस्टर। रात का समय था और आसपास कोई भी नहीं। कामी का मनमचलने लगा। इस पर पलंग उसकी बेचैनी बढ़ा रहा था। उसका मन हुआ कि वो इस पर लेट जाए साड़ी उघाड़ दे। कन्हैया के साथ मन की आग बुझाकर उसकी ही हो जाए। कन्हैया, उसका साथी...वो उसकी हो जाए..बिलकुल इस अभिनेत्री की तरह कपड़े ओढ़ ले। बेकार तकलीफ कर डाली...कन्हैया मुंह पोछता हुआ अंदर आया। उसे देखकर कामी बाहर की ओर भागी..पायल छनक उठी..मन मचलने लगा वो भागी और बेतहाशा भागी। सूनसान गलियों को पार कर वो अपने घर आई और सांस लेकर थम गई। रात को तकिया पर उसे कन्हैया के जैसा लगने लगा पहले तो उसने उसे हटा दिया पर फिर उसके मन में ख्याल आया। जब केवल धोखा दे सकता है तो वो तो फिर भी....उसने साड़ी हटाई और तकिये पर लेकर उसे चूमती गई। हर अंग पर उसकी छुअन। एक अनोखा सहवास था ये...उत्तेजना के चरम से उतर जब वो कुछ होश में आई तो बाहर आकर उसने बाल्टी से पानी ले खूब मुंह धोया। पूरा ब्लाउज गीला हो गया। जोक्या जो दरवाजे से बाहर सटकर खाट पर सो रहा था उठा उसने उसे देखा फिर सो गया। वो समझा नहीं कि ये क्या हुआ था।
दूसरे दिन कन्हैया उससे मिला उसने पूछा कि वो रात को बिना कुछ बोले भाग क्यों निकली। इस पर कामी ने बहाना बयाना कि घर में जरूरी काम याद आ गया था। कन्हैया ने पोस्टर देखा था पर वो समझ नहीं पाया कि कामी ने कैसे अपने आप को टूटने से बचाया होगा। उसने ज्यादा ध्यान न दिया।
मंडी में ही व्यापार करता था जयजय बाबा। हवाई जहाज सा शरीर लंबे बाल, अजीब सी मूंछे और दाढ़ी। एक एकहरा आदमी वहां का दादाभाई था। उसने जब कामी को देखा तो देखता ही रह गया। जब उसका और छबीली का विवाद हुआ तो वो भी वहां आया और छबीली को चुप रहने की हिदायत दे गया। कामी को देखकर वो भी मचल गया। आदमी ने कैसे इसे छोड़ दिया...वो सोचता और अपने अंतरंग मित्रों से कहता- कितनी भरपूर है ये उफ...इसके आदमी ने कैसे इसे छोड़ दिया। अरे ... नहीं होता होगा साले का..उसके दोस्त कहते। ये एक रात का माल नहीं है हर रात...हर रात को ये रंगीन बना दे। ये ... से भरे वक्ष..ये भरापेट, ये रसीले होंठ, ये पूर से उफनता बदन। वो बात करने के बहाने कामी के पास आ जाता और उसकी छाती को देखता और ब्लाउज के अंदर झांकने की कोशिश करता जिसे कामी कभी समझ न पाई। वो सोचता एक दिन ये टूटेगी जरूर और उस दिन वो उसे अपनी बनाकर ही रहेगा। उसे छोड़ेगा नहीं...मांग में सिंदूर डालकर अपनी रखैल बनाकर रखेगा और कहीं एक कमरा दिलवाकर रखेगा। रोज उसके साथ दिन मंडी में और रात बिस्तर पर गुजारेगा। हालांकि जयजय बाबा ऐसा कुछ करता नहीं उसका तो खुद का परिवार था और एक खूबसूरत पत्नी भी थी पर उसका सपना था कि एक बार कामी उसे मौका दे। कामी को पता चला कि वो गुंडा-दादा है तो उसके पास राखी लेकर पहुंच गई। राखी देकर बाबा चमक (हैरान हो) गया उसने रखी तो नहीं बंधवाई पर वचन दिया कि वो उसकी रक्षा करेगा। कामी खुश हो गई। इसके साथ ही कामी पार्षद दादा दयावान को धार्मिक कार्यक्रम का सबसे ज्यादा चंदा देती और फोटो खिंचवाती। अंतत: छबीली मंडी छोड़कर ही भाग निकली।
पांच साल बीत चुके थे। आज होली दहन की शाम थी, बाजार जल्दी उठ गया था। एक गेर निकली थी जिसने रामरज फैला दी थी। कामी का सामान समेटा जा चुका था वो बस ठिये को अगरबत्ती लगाकर घर जाने वाली थी। वो उठी और बोरा जिस पर वो बैठी उठाने लगी तो उसे याद आया शादी के बाद की पहली होली, जब केवल ने उसे रंग लगाया तो वो भागकर कमरे में चली गई केवल वहां आया-दरवाजा बंद किया और.....जो प्यार का रंग लगाया वो जोक्या के रूप में गर्भ में समाया। ऐसे ही करवाचौथ की रात को हुआ और सुल्ला होने को हो गया। ओए..होए....क्या क्या प्यार भरी यादें हैं जो अब याद करने लायक लगती नहीं।
खैर, वो उठी उसकी उम्र अब प्रौढ़ हो गई थी। कमर में दर्द भी रहता था। वो बोरा हिलाकर साफ कर ही रही थी कि आवाज आई। कामी...ये आवाज केवल की थी। उसके बाल बिखरे थे और वो बौराया सा था। कामी ने उसे देखा। क्या बात है? कामी....वो फूटफूट कर रोने लगा। कामी ने उसे पास ठिये पर बिठाया। कहो क्या बात है? केवल ने रोते हुए बताया- सैव्या को वह पहचाना नहीं। उसके कई पति थे और वो हर एक के साथ घूमती और मजा मारती थी। उसने आज उसे रंगेहाथों पकड़ा तो उसने और उसके साथी ने उसे पीटा और भगा दिया। वो एक ठेले पर बैठा था। कामी उसके सामने खड़ी थी। उसने उसका मुंह पकड़कर उसे अपनी छाती से लगा लिया। उसके वक्षों के बीच उसका पूरा चेहरा समा गया। कुछ क्षण वो ऐसे ही रहे। केवल के कानों पर पानी गिरा वो कुछ समझ गया। कामी के शरीर की गर्मी और पसीने की तीखी गंध को पाकर केवल यूं संतुष्ट हुआ मानों सर्दी की रात में अलाव मिल गया हो। फिर कामी ने उसे छोड़ दिया। मुझे माफ कर दे कामी। मुझसे भूल हो गई। उसने देखा कामी की आंखें गीली थीं। अब कामी गंभीर होकर बोली- आप छोड़कर गए। जिंदगी ने बहुत कुछ सिखा दिया। अब आप वापस भी आ जाओ तो भी मुझे वैसा न पाओगे। आप वैसे हो जाओ भले ही पर मैं पहले सी न हो पाऊंगी। आपको शायद मेरा शरीर मिले पर मेरी आत्मा की तो आप बहुत पहले ही हत्या कर चुके हो। आपने मेरी छाती को चूमा पर आंख से गिरते आंसुओं को आप जान न पाये। मेरा शरीर आपका था है और रहेगा। आप साथ चल सकते हो। रह सकते हो पर मेरी आत्मा इन आंसुओं के समान बहकर निकल चुकी है। केवल चुप रहा। कुछ देर बाद कामी ने जयजय बाबा को फोन लगाया और केवल का मामला बताया-बाबा, सैव्या इनका माल दबा गई है। बाबा, जो होली की पूजा करती महिलाओं से घिरा था वहां से निकलना नहीं चाहता था, उससे बोला कि वो रंगपंचमी तक रुक जाए उसके बाद वो सैव्या को पेलकर पूरा माल निकलवाएगा। पेलकर...।
आपको बता दें कि जयजयबाबा अपनी कॉलोनी या बस्ती का कथित दादा था जो हर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करता था जिसमें महिलाओं की भागीदारी होती थी वो उनके बीच जाता और ऊर्जा से भर जाता महिलाएं भी मुस्काकर उसका स्वागत करतीं। वो सुनहरा मौका छोडऩा चाहता ही नहीं था वर्ना उस रात ही केवल का माल उसके पास आ जाता। खैर, कामी केवल को अपने साथ ले गई। कानू ने उसे गालियां दी पर कामी के बीच में हस्तक्षेप करने पर वो बाहर रंग खेलने चला गया। जाहिरातौर पर वो दूसरे दिन भी घर नहीं आने वाला था जबतक कि कामी उसे न बुलाए। जोक्या और सुल्ला, जो अब बड़े हो गये थे, ने उससे बात नहीं की वो चुपचाप रोटी खाकर बाहर ही खाट पर सो गये। देर रात को कामी बाहर आई कंबल लेकर वो जानती थी केवल के लिये ऐसे रात काटना मुश्किल था। उसने उसे कंबल ओढ़ाया और भीतर चली गई। कामी मुझे माफ कर दे...एक आवाज उठी पर कामी भीतर चली गई। कुछ लोगों का कहना था कि कामी ने उसे कंबल ओढ़ाया और खुद भी उसमें समा गई। क्योंकि वो जानती थी केवल अकेले सो नहीं सकता। उसकी बाहों में खुद को समेट दिया। एक समर्पण था ये। क्या हुआ ये कोई नहीं जानता? आपको जैसा लगे वैसा इस कहानी का अंत समझ सकते हैं। पर मैं जानता हूं कि मेरी कहानी की नायिका विद्रोह करती है और वो समर्पण कर ही नहीं सकती वो भी गलत आदमी के सामने...मैं आश्चर्य करता हूं कि वो समर्पण कैसे कर सकती है? मेरे हिसाब से उसने समर्पण तो नहीं ही किया! वैसे कुछ दिन बाद कामी और केवल एक हो गये, सबकुछ पहले जैसा हो गया बस कामी पहले सी नहीं हो पाई...वो एक जिस्म हो गई पर आत्मा...वो तो पहले ही मर चुकी थी।
गुरुवार, 26 मार्च 2020
एक प्रेतबाधित सवाल
वो जब घाघरा और चोली पहनकर गरबे के पंडाल में उतरती और गरबा रमती तो सब लोगों की आंखें उस पर ही टिक जाती। वो भी रोज नया श्रृंगार करके आती। उसका गोरा रंग तो पंडाल में दमकता ही था चूडिय़ों की खनक और पैरों की पायल की छनक तक कभी-कभी सुनाई दे जाती। हर दिन हाथों में नए-नए चूड़ले-नई कलाकारी की मेहंदी, पैरों में आलता, नए तरह की पायल, हर दिन नया नखरा हर दिन नई अदा। लड़के उसे देखकर ये सोचते कि किसी तरह से उससे पहचान हो जाए तो फ्रेंड की बात तो छोड़ो फिर तो सीधे शादी की ही बात पर वो आकर रुकेंगे पर वो लड़की कहां से आती और कहां को जाती पता ही न चलता था।
इस लड़की का नाम था पायल। परिवार वाले तो उसे आने ही न देते पर वो जिद करके यहां आ जाती थी। वो स्कूटी उठाती और फुर्र हो जाती। वो सिविल लाइंस के मकान नंबर 11 में रहती थी। पायल के पिता थे रमाकांत गुजराती, दो भाई और छोटी बहन सहित मां, यही उसका परिवार था। वो सबसे बड़ी थी। तनसुखभाई के सुंदरी इंटरप्राइजेस की वो रौनक थी और उनके बेटे जिग्रेश के दिल का चैन। जिग्रेश मुंह से तो कुछ न कहता पर पायल जानती थी कि उसकी पायल से जिग्रेश का दिल धड़क पड़ता है। बात कही तो न गई पर सभी जानते थे कि उसकी शादी जिग्रेश से ही होगी और पायल की और उसके परिवार की अबोली सहमति भी थी। अष्टमी की रात वो रात के बारह बजे तक घर न पहुंची। पिता को चिंता हुई। गरबा आयोजक किशोर भाई को फोन लगाया तो वो बोले, पायल तो दस बजे ही निकल गई थी। अब पूरा परिवार परेशान हो गया। जिग्रेश को फोन लगाया वो भी उसे खोजने निकला। साढ़े बारह बजे पायल घर लौटी। बाल बिखरे और कपड़े अस्त-व्यस्त। चेहरे पर शरीर पर चोटें। क्या हुआ पायल? पिता ने पूछा। पापा...कुछ लड़कों ने मेरे साथ छेड़छाड़ की है। अरे..रे जाने दे तू तो ठीक है न... पापा मैं तो ठीक पर मैं उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करवाऊंगी- पायल ने जिद की। अरे बेटी रहने दे..बदनामी होगी- मां ने समझाया। न मां मैं तो रिपोर्ट करवाऊंगी। वो अंदर चली गई। दूसरे दिन वो पुलिस स्टेशन गई। रमाकांत भी साथ गए। मामला खंगाला तो पता चला कि समाजसेवी और नेता वसुभाई के बेटे सूरी, उसके दोस्त इकबाल और बाबा खान के साथ दो लड़कों के नाम सामने आए। पांचों की पृष्ठभूमि बेहद रसूखदार परिवारों से थी। पुलिस वालों ने कहा कि लिखित में आवेदन दे दो। पायल अड़ गई कि एफआईआर दर्ज करो। मामला बनते न देख पायल ने जिग्रेश को फोन लगाया। वो आया और पुलिस से पूछताछ की। फिर उसने पिता को फोन लगाया और मामला बताया। तनसुख ठहरे व्यापारी वो घबरा गए। अगर वसुभाई को पता चला तो ठीक है पर बाबा खान के अब्बा तक बात गई तो पूरी इंटरप्राइजेस तहस-नहस हो जाएगी। वो बोले कि जिग्रेश भई तू तो घर आ जा।
अब पायल को गुस्सा आ गया। उसने अपनी पत्रकार दोस्त वैभवी को फोन लगाया और जिग्रेश को बोल दिया कि घर लौट जाओ। पापा राह देखता होगा। वैभवी वहां आ गई और मामला मीडिया की नजर में आ गया। पुलिस ने दबाव में एफआईआर दर्ज तो कर ली आरोपियों पर कार्रवाई होने में शुबहा था। पायल घर आ गई। दूसरे दिन पेपरों मामला आ गया। पुलिस ने जैसा कि अंदाजा था कोई कार्रवाई न की। उल्टे पायल पर ही सवाल खड़े कर दिये। पूरी कॉलोनी में पायल का परिवार चर्चा का विषय बन गया। कुछ लोगों को उससे हमदर्दी थी तो कुछ उसके विरोध में थे। घर वालों ने तो बाहरी लोगों से बात करना और उनकी ओर देखना भी बंद कर दिया। पिता घूमने बाहर नहीं गए और बाकी लोग तो मौन व्रत पर हो गए। पूरे घर में मरघट की सी शांति छा गई।
पायल परेशान थी कि तभी वैभवी घर आ गई। उसके साथ जागो शक्ति जागो महिला संगठन की अध्यक्ष मणिबेन और प्रमुख कांता ताई भी आई थीं। उन लोगों ने पायल को ढांढस बंधाया। वॉट्सअप और फेसबुक सहित दूसरे माध्यमों पर लोगों ने पायल का साथ दिया और आंदोलन की पृष्ठभूमि बनने लगी। शाम तक पुलिस का प्रमुख घर आ गया और पायल का बयान ले लिया और आरोपियों को धरदबोचा। रात में ही पूछताछ शुरू हो गई। दशमी यानी दशहरे के दिन पुलिस को ऐसी हकीकत पता चली कि वो हैरान रह गई। अब पुलिस प्रमुख पायल के घर पहुंचा। जरा पायल को बुला देंगी, उसने मां से कहा। मां घबराई क्या हुआ? उसी से बात करनी है। इतने में पायल वहां आई। मां यहां-वहां हो गई। पायल रहस्यमय ढंग से मुस्काई फिर बोली- सर, हमारा समाज प्रेतबाधा से ग्रस्त है। हम कितने ही आधुनिक क्यों न हो जाएं हमारी सोच बदल ही नहीं सकती। आपको सूरी ने सब सच बता दिया न। अब पुलिस प्रमुख के पसीने छूटने लगे।
गरबा में सूरी ने मुझे देखा और कहा कि गर्लफ्रेंड बनोगी मैंने इंकार कर दिया, वो पीछे पड़ा तो झिड़क दिया। चिढ़कर उसने मुझे इकबाल और बाबा खान की मदद से उठा लिया। उन दोनों ने उसे मर्दानगी की दुहाई दी थी। कहा कि मर्द बन कर दिखा। वो तो अपनी बहनों तक को न छोड़ते थे। मैं तो फिर भी पराई थी। उसके दो दोस्त और भी थे वहां। मैं चिल्लाई और कुछ लोगों ने देखा पर किसी ने मदद नहीं की। उन्होंने बहुत कोशिश की पर जब काबू नहीं पा सके तो सूरी और इकबाल ने मुझे पकड़ा और बाबा खान ने मेरे सिर पर लोहे की रॉड मार कर मुझे मार डाला और लाश जमीन में दबा दी। मैं मर गई कुछ लेना-देना तो किसी से था नहीं पर इस समाज की प्रेतबाधा को दूर करने के लिए मैं वापस आई। मैं जानती हूं कि शायद मुझे न्याय न मिले पर मैंने समाज को इस बाधा से मुक्ति दिलवाने के लिए एक कदम बढ़ाया है। लोग आगे आएंगे। अब जाऊंगी सर पर एक बात का दु:ख रहेगा कि जो मेरी इज्जत बचाने और हरदम अपना बनाने को ललचता था वो मुझे ऐसे वक्त में छोड़ गया। आप जिग्रेश से मिलो तो कहना कि पायल उसे कभी नहीं भूलेगी। नहीं भूलेगी कि वो कैसा बेवफा निकला। मैं दाल-रोटी कमाने वाली नहीं थी (गुजरात में ऐसी महिलाएं जो वेश्यावृत्ति में लिप्त होती हैं और पूरा परिवार उनके इस पेशे को करने के लिए उनको बाध्य करता है यहां तक कि पति भी। उनको वहां आम भाषा में दाल-रोटी कमाने वाली के नाम से संबोधित किया जाता है)। जो वो मुझे यूं बेसहारा छोड़ गया।
लोग कहते है कि डीकरी है घर में रह पर्दा कर पर अपने वहशी बेटों से नहीं कहते कि औरत की इज्जत कर। ये है प्रेतबाधा इस समाज की सर। बेटी हो तो सीता सी, राधा सी नहीं...भले भगवान हो जाए पर बदनाम तो होगी ही न।
गरबा करेगी नाचेगी तो नजर आएगी ही, कुछ होगा नहीं तो क्या होगा? क्यों घूमती है आवारा सी, लड़के तो छेड़ेंगे ही। उनका अधिकार है। चुपड़ी रोटी दिखी तो कुत्ता ललचाया। मर्दानगी दिखानी है तो औरत पर दिखा...कैसी कुंठा है? अरे मर्द हो तो मर्दानी देश की सीमा पर दिखाओ। लोगों के अधिकारों के लिए लड़ो। बदमाशों को मारो...नहीं, ऐसा करना तो मर्दानगी नहीं है, वहां तो सिर कटना पड़ेगा न, गुंडे धुन देंगे, यहां तो बस जोर दिखाना है, अबला को दबाना है जो जितना दबाएगा वो उतना मर्द, सच्चा मर्द। सर, समाज की ये प्रेतबाधा है, हमेशा रहेगी। हमारे देश में मर्दानगी को लेकर इतनी शंका है जिसका उदाहरण आपको दीवारों पर, अखबारों में कई जगह मिलेगा जहां मर्दानगी बढ़ाने की दवाइयों का जिक्र सबसे ज्यादा होता है।
खैर, आप लोगों ने मेरी लाश जब्त कर ही ली है और उनके भेडिय़ों के बयान भी हो गए हैं। कोशिश कीजिएगा कि उनको सजा मिले। वर्ना मैं तो हूं ही न...वो बोली। अष्टमी को दुर्गा जागी है, दशमी को महिषासुर का दलन होना चाहिए, नहीं होगा तो दीपावली अंधियारी हो जाएगी।
इसके बाद वो बाहर गई, मां से बोली-चिता को आग मत देना। गाड़ देना, मुझे मुक्ति नहीं चाहिए। मैं तो भटकूंगी...अतृप्त आत्मा सी पर एक उद्देश्य से, ऐसे बदमाशों को जिनको समाज सजा नहीं देगा, कानून सजा नहीं देगा उनको मैं सजा दूंगी। मैं वापस नहीं आऊंगी पर याद रखना कि बेटी थी और बदमाशों को सजा दिलवाना। मां कुछ समझती उससे पहले ही वो गायब हो गई। पायल की लाश को श्मशान में गाड़ दिया। जहां उसके परिवार वाले और कभी चोरी-छिपे से जिग्रेश जाकर फूल चढ़ा देता था। जिन लोगों को ये बात पता चली वो आश्चर्य में पड़ गए और पागल कहलाने के डर से पूरा मामला दबा दिया। लोग इस बात को कैसे पचाते कि एक आत्मा लोगों के बीच आई और इंसाफ मांगा।
कानून अंधा है कोर्ट से सामने मामला साबित नहीं हुआ और वो तीनों अपने दो दोस्तों के साथ छूट गए। दीपावली की वो तीनों मुख्य आरोपी रहस्यमय रूप से गायब हो गए और फिर उनका कोई पता नहीं चला। तीनों के घर वालों को एक मैसेज मिला मोबाइल पर.....मैं जिंदा हूं और जिंदा रहूंगी। बाकी एक को लकवा मार गया और दूसरा पागल हो गया। इसके बाद किसी को कुछ नहीं पता क्या हुआ? लोगों का कहना था कि जिग्रेश ने ही उन लोगों को ठिकाने लगाया था। वो पायल का बदला ले रहा था या फिर उसके परिवार के किसी ने उनको मार डाला। पुलिस ने जांच भी की पर कुछ पता नहीं चला। पर मन कहता है कि शायद पायल आज भी अतृप्त आत्मा के रूप में जिंदा है, जिंदा है एक सवाल बनकर कि समाज की प्रेतबाधा दूर होगी या नहीं। वर्ना वो तो है ही... न...एक भटकता सवाल बनकर।
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कुएं का रहस्य
दोनों लापता दोस्तों का आज तक पता नहीं चला है। पर लोगों को आज भी उस सड़क पर जाने में डर लगता है। कुछ दुस्साहसियों ने वहां से गुजरने की कोशिश ...
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कार जा ही रही थी कि सामने पत्थरों को देखकर ड्राइवर ने कार को रोका और बाहर निकला। वो पत्थर को उठाने के लिए झुका ही था कि उसके सिर पर जोरदार ट...
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बशीरिये को कई बार बोला इतनी तंबाकू-सुपारी मत खा पर वो मानने वाला ही कहां था? कहता था ये लत तो मरकर ही छूटेगी। बीवी बन्नो कहती इनको कहां तक ...
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आत्मा को सारे राज पता होते हैं क्योंकि बंदिशें जिस्मानी होती हैं रूहानी नहीं। सेंटीपल नाम का एक युवक नार्नियो जुंदाहो नाम के तांत्रिक के पास...






















