सोमवार, 4 सितंबर 2023

कुएं का रहस्य

दोनों लापता दोस्तों का आज तक पता नहीं चला है। पर लोगों को आज भी उस सड़क पर जाने में डर लगता है। कुछ दुस्साहसियों ने वहां से गुजरने की कोशिश की पर दूर से ही उनको एक बूढ़ा आदमी दिखता है जो उनको बुलाता है और दुस्साहसी .....

बिहार की राजधानी पटना के पास एक उपनगर था। यहीं पर एक एकांत सड़क थी जिस पर से कोई भी रात में नहीं निकलता था। क्योंकि जो कोई वहां से निकला वो वापस लौटकर नहीं आया। आया भी तो कुछ बोल ही नहीं पाया या तो पागल हो गया या फिर मर गया। 


दो युवक इन बातों को नहीं मानते हुए उस सड़क से निकले। इस अफवाह का मजाक उड़ाते हुए वो जा ही रहे थे कि एक बूढ़ा आदमी उनके पास आया।  क्या हुआ दादा-युवकों ने पूछा। बूढ़ा बोला- पास कुएं में मेरा पोता गिर गया है निकाल दो तो मेहरबानी। क्यों नहीं? दोनों ने बूढ़े को आश्वस्त किया। दोनों युवक बूढ़े के साथ कुएं पर पहुंचे।  पेड़ों की छाया में वो एक बेहद मनहूस जगह थी। कुएं में से आवाज आ रही थी-दादा..मुझे बाहर निकालो। युवकों ने कुएं में झांका। अंदर सफेद कपड़ों में एक बच्चे की अस्पष्ट झलक दिखी। एक युवक कुएं में उतर गया और कुछ देर बाद उस बच्चे के साथ बाहर आ गया। 

 


अब युवक ने बूढ़े को डांटा- अरे, तुम लोग इतनी रात में घर के बाहर निकले ही क्यों? बच्चे को कुछ हो जाता तो। वो तो गनीमत है कि हम यहां से जा रहे थे। वरना..। इतना कहकर युवक रुका। युवक की बात सुनकर दादा और पोता जोर-जोर से हंसने लगे। इस बात पर  दोनों युवकों को आश्चर्य हुआ। इसके बाद कुएं में उतरने वाला युवक तुरंत कुछ शंकित होकर बोला- दादा कुआं ज्यादा गहरा नहीं है। इसमें सीढिय़ां भी हैं और तुम चल भी ठीक-ठाक ही रहे हो तो तुमने खुद ही बच्चे को क्यों नहीं निकाल लिया। हमें क्यों बुलाया?

अब दादा और पोता और  जोर से और भयानक ढंग से हंसे। इस बात पर पहले दोस्त ने उनको डांटा- अरे, जब कुएं में उतर  ही नहीं सकते हो तो रात में घर से निकले ही क्यों? मदद के बगैर। अब दादा और पोते ने  जीभ  बाहर निकालकर  बेहद भयानक आवाज निकाली और पहले दोस्त, जो कि उनको डांट रहा था, पर कूदे। वो जिस तरह से कूदे थे  उस तरह से वो इंसान तो नहीं लग रहे थे। यह देखकर दूसरा दोस्त वापस भागा पर वो दिशा भटक गया और जंगल में अंधाधुंध भागने लगा। उसे लगा कि दादा और पोता उसके पीछे हवा में उड़ते हुए आ रहे हैं।  वो भागता गया भागता गया। आखिरकार वो किसी तरह घर वापस पहुंचा।   उसने सारी बात घरवालों को बताई इस बात पर उन लोगों ने तो विश्वास कर लिया पर उसके गायब दोस्त के परिवार वालों ने पुलिस को सूचना दी।


पुलिस मौके पर पहुंची और जांच की। पुलिस ने माना कि दूसरे दोस्त ने पहले वाले को गायब किया है और उसका मानसिक संतुलन बिगड़  गया है। इस बात की बिनाह पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया पर उस पर आरोप साबित नहीं हुए और वो तीन महीने बाद घर लौट आया। घर में भी उसने किसी से बात नहीं की। तीन दिन बाद वो बिना कुछ कहे घर से चला गया और फिर कभी घर वापस नहीं आया। लोगों ने उसे आखिरी बार उसी कुएं की ओर जाते हुए देखा था। उसके लापता होने पर घर वालों ने उसे ढूंढा और पुलिस में रिपोर्ट करवाई। पुलिस फिर से कुएं के पास गई जांच की पर कुछ हाथ नहीं लगा और केस बंद हो गया।  

दोनों लापता दोस्तों का आज तक पता नहीं चला है। पर लोगों को आज भी उस सड़क पर जाने में डर लगता है। कुछ दुस्साहसियों ने वहां से गुजरने की कोशिश की पर दूर से ही उनको एक बूढ़ा आदमी दिखता है जो उनको बुलाता है और दुस्साहसी डर के मारे वापस आ जाते हंै।  यह सड़क आज भी वीरान है और लगता है कि वो अब आपको बुला रही है। क्या आप जायेंगे? 


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

प्रायश्चित

छोटे ठाकुर....बकुला ने पीछे से आवाज दी।
एक साधु ठिठककर रुका।
छोटे ठाकुर..बकुला भागकर उनके पास आया।
छोटे ठाकुर..
बकुला...
हां...मालिक
कहां हो आजकल..
छोटे मालिक और कहां होऊंगा..मजदूरी कर रहा हूं..देश आजाद हो गया है..अपनों की गुलामी कर रहा हूं।
साधु हंसा।
हां..हां, हंस लो बाबू..तुम्हारा क्या संन्यासी ठहरे, हम तो जोरू और घरू कोल्हू में पिस रहे हैं बस..
यहां कैसे आये...?
बड़के साले का पिंडदान है बाबू..पर तुम तो तब के गये आज मिले हो..
हां..पर अब न मिलूंगा।
क्यों?
जा रहा हूं बहुत दूर...
बाबू ऐसा न करो..तुम को देखकर चैन आता है बाकी तो..
क्यों क्या हुआ बाकी तो?
बाकी तो अब बाड़ा वीरान है बाबू..
तुम क्या गये..सब..सब लुट गया।
होना ही था एक दिन ऐसा..
पर बाबू तुम गये कहां, ऐसा क्या हुआ? मैं तो गांव गया था लौटा तो कुछ ठीक से पता नहीं चला।
गया..साधु हंसा। गया कहां? अपने पापों की गठरी लिये फिर रहा हूं।
कैसा पाप छोटे बाबू..तुम सा बाड़े कोई न था। तुम देवता थे। देवन थे गांव वालों के, आज भी तुम्हारी बात होती है तो अदब से सिर झुक जाते हैं। छोटी मालकिन आज भी पीहर में तुम्हारी राह तक रही हैं बाबू। उसे तकने दो..उसका कर्ज अगले जन्म पूरा कर दूंगा।
बाबू तुम्हारी आवाज में बहुत दर्द मालूम होता है। आज कह दो, निकाल दो पूरा दर्द।
इससे क्या होगा?
तुम हल्का महसूस करोगे बाबू..
अच्छा.. तो सुनना चाहते हो मेरे पाप की अनसुनी कहानी... तो सुनो।
वो दोनों घाट पर बैठ गये।
बाड़े में वो नाचने वाली आती थी न..
कौन? अमीरन
नहीं..
कौन?
बड़े नसीबों वाली
नसीबन
हां..उसके साथ एक छोटी लड़की को बचपन में देखा था।
कौन? वो बरखा
नहीं..
सुंदरी..
सुंदरी..
हां, तब मैं 12 साल का था, वो थी 10 साल की। उसकी डरी-डरी मृगिनी से आंखें। मैं तो उसे देखता ही रह गया। पूरे बाड़े हाथ पकड़कर उसे मैंने घुमाया..सबकी नजरों से बचाकर। जब ढुंढाई पड़ी तो पकड़ा गया। सब हंसे बोले- ठाकुर का लड़का है बचपन से ही तबीयत रंगीन है। नसीबन ठुमरी गा रही थी। मैं चुपके से सुंदरी को वहां से ले आया था। लड्डू खिलाये और शर्बत भी पिलाया था उसको। बहुत से बेर भी दिये थे। जो पकड़े जाने पर उसके आंचल से गिर गये थे।
बेर खाकर वो बोली थी बेर तो फीका है हमने उसका जूठा छीनकर खाया वो खट्टा था। हम बोले फीका नहीं खट्टा है। इस पर वो तपाक से बोली मीठे तो नहीं है न...। इस पर हम भी बोल पड़े थे- बेर तो मीठे ही थे पर पूरी मिठास तुम्हारे होठों ने चूस ली है। अब वो पलट कर बोली- चखे हो क्या जो ऐसे बोल रहे हो? हम अवाक् रह गये। बाद के दिनों में इस बात को याद कर वो हंस पड़ती थी।
हर साल नसीबन आती। सुंदरी भी आती। 15 साल का होते-होते मैं सुंदरी से कुछ इस तरह मिल गया कि उसे देखे बिना चैन न आता एक बार घोड़ा दौड़ाते मैं उसके कोठे तक पहुंच गया। नसीबन ने मेरी बड़ी खातिरदारी की और जब पता चला कि मैं सुंदरी से मिलने आया हूं तो उससे मिलवाया भी। जब ये बात जाहिर हुई तो बड़ी डांट पड़ी थी मुझे। आज भी याद है बड़े भैया और पिताजी। पूरा बाड़ा सिर पर उठा लिया था दोनों ने। खैर, मैंने भी रास्ता ढूंढ ही निकाला। मैं बाहर के कामों में रुचि दिखाता और मौका पाकर सुंदरी से मिलने पहुंच जाता। सुंदरी के कुछ लोग मुझे आकर खबर दे देते कि कहां मिलना है? पर इश्क-मुश्क झुपाये नहीं छुपते। अब नसीबन का घर आना होता तो भी सुंदरी न आती। कह दिया था उसको। उसके लोग भी अब न आते। एक बार नसीबन को मैंने अकेले में रोक लिया बाड़े में पूछ डाला पूरा हाल। वो बोली- ठाकुर साहब..हम गाते हैं। बांछड़े नहीं हैं हम। हमारी इज्जत है। पतुरिया जान हमारा अपमान न हो। मैंने कह डाला कि सुंदरी से प्रेम है और उसे हम रखेंगे नहीं। उसे ब्याहेंगे।
नसीबन की आंखों के आंसुओं की तो पूछो मत दस बार पूछ डाला। हम दस बार बोले- ब्याहेंगे...ब्याहेंगे...ब्याहेंगे। फिर पूछा- सुंदरी कहां है? वो बोली- गाना सीख रही है। हमने उससे वादा लिया कि वो हमारी अमानत है उसके पास। अब हम सारा हिसाब-किताब देखने लगे तो हिम्मत खुल गई। सीना ठोंकर चले जाते सुंदरी के कोठे पर सब समझते मर्द आदमी है। जाना तो बनता ही है उस पर दौलत अकूत। हम सुंदरी से मिलते वो हमारे लिये सजती-संवरती। उसके सोलह श्रृंगार हम पर यूं बरपते मानों हजारों हथियार एक साथ दागे हों हम पर।
उसकी हर लालसा हमारी ही होती मानों उसका कोई अस्तित्व ही न हो। हर बात उसकी यही होती यह उनको पसंद होगा न। यह उनको पसंद आयेगा न। हमें राधाजी और श्रीकृष्ण की कहानी याद आती। हम भी कृष्ण की तरह यही सोचते- इतना मोह न रख पगली। हम तेरे प्रेम के आगे वामन न हो जायें। कहीं काल ने हमें भी अलग कर डाला तो। उससे कहते तो वो गाती- बांधी जिय की डोर तोसे, जाओ जेहि आंगन, बंधो जेहि ठौर, जा न सकि हो दूर मोसे। हमारा प्रेम हमें उसके समर्पण के आगे लघुकाय लगता इस पर कभी हम उसका माथा चूमते तो कभी पैर। इसमें कहीं भी वासना नहीं थी एक श्रद्धा थी न जाने कैसी?
एक दिन वो बोली- आपके नाम से रख लूं करवाचौथ हमने कहा- रख ले..वो बोली- मांग तो सूनी है..हमने तुरंत भर डाली। अब वो मानों हमारे चरण पडऩे लगी। देह की अगन पर बारिद बन बरसो..सात जन्म हम अबहु न तरसो..तुम ही सिंगार तुम ही नाथ...सत्ते जन्म निभाओ ते साथ।।
उस दिन से वो हमारी पत्नी हो गई। उस हमने जैसे ही उसकी मांग भरी वो आनंदातिरेक से उछलती-कूदती नसीबन के पास पहुंची और ये बात उसे बता दी। वो प्रसन्नता को नेत्रों से छलकाती हमारे पास आई और बोली- छोटे ठाकुर, जन्मोजन्म न मिले ऐसा सम्मान दिया तुमने हमको। हमारे कुनबे में ब्याह तो होता पर ऐसी बड़ी हस्ती न मिलती है। सुंदरी खुद राजपरिवार की वंशज है पर किस्मत का खेल। न राजा का नाम मिला न सम्मान। अब नसीबन ने खुद उसे नववधु की तरह सजाया। मंगलगीत गाया। उस रात हम उसके ही पास रुके।
यहां उसकी जिव्हा मौन हो गई और आंखों में वो दृश्य प्रकट हुआ। चंचल सुंदरी ने सेज पर आते ही मसकदानी (मच्छरदानी) गिरा ली। दूध को स्वयं ही चख लिया।ये उसका शरारती अंदाज़ था और कुछ नहीं। उस रात ऐसी चैन की नींद आई जो अब नसीब नहीं होनी। सुबह जब वो उठा तो देखा। सुंदरी नहाकर कमरे में धूप दे रही थी। वो दीवार पर लगी कान्हा-राधाजी की तस्वीर को धूप देने के लिये कुर्सी पर चढ़ी। उसने देखा कि सुंदरी के पैरों से पानी की एक बूंद बहकर नीचे जा रही थी एक बूंद पायल के घुंघरू पर जमी थी। उसने उठकर हथेली लगाकर बूंद को समेटा और पी गया। वो सकपका गयी- ये क्या करते हो छोटे ठाकुर? हम दब जाये है पाप के बोझ से। इस पर वो बोल पड़ा था- चरणोदक ले रहा हूं प्रेम की देवी का..सात जन्म तर जाइ हैं हम। वो उतर कर बोली- जाओ नहीं बोलते तुम से। वो बोला- नेत्रों से बोल से बोल ही रही हो न...
जाने कैसे ये बात घर पहुंच गई और अब हुआ भाग्य का खेल..हमारी उम्र 20 के करीब थी कि एक दिन अचानक से ब्याह दिये गये हम न मर्जी पूछी न राय मांगी। निर्मला से ब्याह दिया गया हमको। ब्याह के बाद जब हम सुंदरी के पास गये तो वो गंभीर थी आज ही हमने उसे यूं गंभीर देखा। इस पर हमने उसे समझाया कि हम हमेशा उसके ही रहेंगे। जैसे कान्हाजी की परिणीता रुक्मिणी थी पर वो थे तो राधाजी के ही न...बहुत समझाने पर वो अनमने ढंग से मानी और विरहा का गीत सुनाया- धाये..धाये मंदिर, मूरत, नद, नारे..न लौटे सखी न लौटे सखी प्रियवर हमारे। फिरि फिरि जाये केहि भांति कहै जियरा भया अधीर, कान्हा केहि भांति समझिहौं राधा के उर की पीर। बहुत समय में मानी वो हमारी बात।
निर्मला हमारी परिणीता थी पर हम तो सुंदरी के ही हो चुके थे। रोज शाम उसके ही पास जाते। वो हमारे नाम से मांग भरती। हम उसे तोहफा देते कभी पायल तो कभी कंठहार। देर रात लौटते तो निर्मला को देखते..उससे कह भी नहीं पाते कि क्योंकर हमारी राह देखती हो। उसके हम अपराधी हो रहे थे। वहीं सुंदरी का प्रेम हमें डुबाता जा रहा था। बड़के भैया ने एक दिन कुछ लोगों को कोठे पर लट्ठ बजाने भेज दिया। हमको पता चला तो हम वहां जा पहुंचे। हंगामा हुआ..सुंदरी का डरा चेहरा हमें आज भी याद है। हमने चिल्ला-चिल्लाकर कहा- सुंदरी हमारी ब्याहता है। अगर कुछ किया तो कचहरी में मामला पहुंच जायेगा। कोतवाल से कहकर डलवा देंगे कारावास में। शाम को लौटे तो बड़के भैया ने बुलाया। धमकाया हम न माने तो बोले- पतुरिया की जात न जानते हो। हम वहीं चिल्लाये- पतुरिया न कहना मांग भरी है हमने उसकी वो भी निर्मला से पहले। निर्मला ने यह सुना।
हम कमरे में चले गये। दूसरे दिन हम लेखा देख रहे थे कि पता चला। बाग घूमने गई सुंदरी की हत्या कर दी गई है। हम दौड़कर वहां पहुंचे। देखा तो सुंदरी जमीन पर पड़ी थी। बिलकुल शांत। ऐसा लगा कि बुला रही है आइये..स्वामी देखो आज कैसा लेपन किया है हाथों पैरों में तुम्हारी पसंद से सजे हैं हम... कैसा है हमारा मांडना। हमारे कंगन देखो, पैजन की आवाज सुनो। आज कौन सा गीत सुनोगे? उसके हाथों में देखा तो एक अधखुला थैला था जिसमें पके बेर थे। बचपन के प्रेम की निशानी। कच्चे तो वो खुद खा गई थी पके-पके हमारे लिये रख लिये थे। हमारा दिमाग फिर गया।
हम समझ गये किसका काम है। हम घोड़े से बाड़े पहुंचे। वहां अश्वशाला में गये और भीमा, करिया, देशू, नंदू और भाम्भी को संटी से बुरी तरह मारा। वो गिर गये। पर कुछ न बोले। इससे भी मन न भरा तो चाबुक ही चाबुक मारे। इतने में बड़के आ गये। क्यों मारता है इनको?
हमने कह दिया कोतवाली में इनको देंगे कारावास करवायेंगे। बड़के बोले- हमको करवा कारावास। हमने करवाया है ये सब। ये तो निर्दोष है। पतुरिया के चक्कर में बाड़े को लजवाया।
उस दिन हम दहाड़े मार-मार कर रोये। हाय..सुंदरी भी तो निर्दोष थी। हम गये थे उसके पास वो न आयी थी। वो तो समर्पित थी। क्यों मार डाला उसको? हमारा पाप भुगता उसने। हाय हम विधुर हो गये। उस दिन हमने देखा अटारी से निर्मला हमें देख रही थी। सांझ का समय था। हम उस दिन निकले कहकर- पाप हुआ है हमसे..अब न लौटेंगे हम। प्रायश्चित करेंगे जिंदगीभर। बड़के बोले- चला जा..दो दिन बाद वापस आ जायेगा। उस दिन हम निकले तो निकले ही निकले।
हम सीधे कोठे पर पहुंचे। वहां मातम पसरा था। हम वहीं रुके। दूसरे दिन अपने हाथों से उसका दाहकर्म किया। उसे दुल्हन सा सजाया गया था। उसके बाद हम उसकी अस्थियां और राख लेकर उत्तरकर्म करने को निकले पर मन न हुआ और हमनेे अस्थियों का विसर्जन नहीं किया। कोठे से नसीबन ने जो कुछ पैसे दिये थे उससे काशी फिर बनारस पहुंचे। वहीं त्याग दिया संसार को। आलिंगनबद्ध कर लिया संन्यास को। सुंदरी की अस्थियां साथ लेकर तब से ही फिर रहे हैं। मेरी मानों तो छोटे ठाकुर... सुंदरी की अस्थियों का विसर्जन कर दो..उसे मोक्ष दे दो अपने जीवन से अपनी यादों से। उसका अधिकार क्यों छीन रहे हो?
बकुला..यह भी करने की कोशिश की पर ज्यों मटकी छूते हैं त्यों ही उसकी आवाज सुनाई देती है- छोड़ न देहु पिया, बिसार न देहू छोड़ प्रेम की रीत। जग से विलग पर नीकी है हमरे हरदै की प्रीत। सुनि लो हमको मन महि ओठ सिये न सिये। सीने से लगा रखो हमहु, हम जिये न जिये। हमने कह रखा है जब हम मरे तब उसकी अस्थियों में भली तरह से मिलाकर हमारी अस्थियों का विसर्जन कर दिया जाये।
बकुला यह संसार कितना सजीला क्यों न हो पर मन तो कहीं लगता नहीं। सुंदरी का प्रेम था ही ऐसा कि उसका रंग जो चढ़े तो केहि भांति उतरे..उतरे जिन उतरे। हम जब जाते उसका गीत सुनते। हमने कभी उसे छुआ ही नहीं न उसने कभी हम पर हक जताया। स्पर्श का मोहताज नहीं था ये प्रेम। विवाह की रात भी सेज पर एक ओर हम उसे तकते रहे दूसरी ओर वो। जब वो सोगई तो भी रातभर हम उसे तकते रहे फिर न जाने कब आंख लग गई। उसके उस चित्र को मन में रख रखा है आज तक। याद है हमारी आखरी रात जब उससे मिले थे हम। न जाने क्यों उसको ऐसा अहसास था कि दूसरी रात वो हमसे न मिल सकेगी।
उसने पूछा था- ठाकुर..एक बात बताओ।
पूछ..
अगर तुम हमारी आवाज न सुन सकोगे..हमें देख न सकोगे तो क्या करोगे?
हम इतना भर बोले थे कि तुझसे ही यह दुनिया है..प्यारी, तुम नहीं तो जीवन नहीं।
उस रात वो हमारी छाती पर सिर रखकर बहुत चुप्पय रही। बहुत कहने पर वो गायी और सुबक उठी- उड़ी जई है चिडिया..छोड़ के नीड़-निवाड़, तू जगाते रहियो खोल द्वार किवाड़ रे सजनी खोल के द्वार किवाड़। सखी उड़ी जई हैं.. दूसरे दिन वो सैर करने और झूला झूलने को बाग गई। उसकी सखियों ने बताया। हमारे बचपन का किस्सा कहकर उसने पके-पके बेर हमारे लिये चुने। उस दिन वो बोली हम पूरे हो जाये। नदिया सिंधु महि मिल जाये। उर के कुसुम जेहि-तेहि खिलि जाये। उस दिन वो ऐसा झूला झूली कि मानों अब उसे यह नसीब ही न होगा और हुआ भी ऐसा ही। उसका आखरी गीत था- दे सखी झूलो तेज पिय से मिलन रितु आई। कोई न जाना कि ये पिय हम नहीं कान्हाजी होने वाले थे। जब वो लौटी तो टांगे के करीब ही उसको सभी लोग दिख गये पर वो भागी नहीं। बाकी सब भाग निकलीं। वो भागी नहीं। गला दबा दिया उसका। उदर में खंजर भी उतार दिया। उसके अब वो बोल न सका। कुछ देर में चेतना आई।
अच्छा तो अब हम चलें। रेलगाड़ी का बखत हो गया है।
कहां जाओगे छोटे मालिक..
जहां प्रायश्चित ले जाये...
कभी मिलना चाहो तो कहां मिलोगे...
रमता जोगी बहता पानी कहां रुकते हैं पर कभी आओ तो बनारस में बड़े बाबाजी के यहां से जान लोगे कहां हैं हम? वहां होंगे तो मिल लेना।
बाड़े के बारे में नहीं पूछोगे छोटे ठाकुर...
बाड़ा...संन्यासी का बाड़ा तो यह पूरा भूमंडल है..मैं चलता हूं सुंदरी बुला रही है। वो देखो वहां खड़ी है टांगे के पास।
वो दोनों उठकर चलते-चलते बाहर तक आ गये थे। बकुला ने टांगे के पास देखा उसे तो कुछ दिखा नहीं।
जाते-जाते पीछे से पूछा- कोई पूछे तो क्या कहूँ?
कह देना हम ससुराल चले गये हैं।
२८ मई २१

शुक्रवार, 7 मई 2021

The True hidden by Historians: Durgadas and the Doughter of Aurangzeb

Once hindu warriors attacked on Aurangzeb territory under the leadership of Veer Durgadaas to save the life of hindu prisoners. The soldiers of Aurangzeb ran away leaving the daughter of Aurangzeb back. Hindu warriors took the Daughter of Aurangzeb to Veer Durgadaas.
Veer Durgadaas not only made good separate residence for Aurangzeb's daughter to live until she returns back to Aurangzeb but also appointed an Islamic teacher for her to teach her Hadis and Kuran and he himself looked after herself.
After some time she sent back to Aurangzeb.
Looking her Aurangzeb said- What the Kaffir Durgadaas did with you. I think he tried to mislead you from Islam and its teachings at his level best. But I am sure you failed his every attempt.
She replied- Father, I don’t know who is Kaffir but I know only one thing that he is more greater than us.
Aurangzeb got angry- How dare you are speaking this? I will kill you.
It is the difference between You and Durgadaas. Getting me alone Durgadaas could do whatever he want to me. But he paid respect to me and appointed a special Islamic teacher to teach me. While he is a Hindu a Kaffir in your glimpse. And it is a Allah's order to kill them, rape their women (till they become pregnant by a Muslim man in order to purify them) and sale their children.
She spelled out Kalma.
Now think what could be happened to me, if I could be caught by some begot Islamic leader like you. Your coward soldiers ran away leaving me alone. They even didn't think about the daughter of a Islamic leader? they didn't think about the oath of Islam, they spell out to make you happy time to time? Life is more valuable than Islam? Answer less Aurangzeb shouted- Take her away from my eyes.
After this incident he said artificially to his court men (while he was feared of Durgadaas)- I have a great duty to make this earth free from Kaffirs. Soon I will launch a great Campaign against Durgadass.
All court man shouted- Allah ho Akbar!

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

हम इंदौर पर कभी हमला नहीं करेंगे! एलियन का कलमछाप द्वारा एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

एक कलमछाप देर रात घर लौट रहा था. साइकल पर सवार थका और परेशान....तभी उसने देखा कि एक विचित्र की आकृति सडक़ पर भाग रही है...रात गहरी थी और उसे रामसे बंधुओं की फिल्मों की याद भी थी....कलमछाप ने सोचा कि चलो इसके पीछे चलता हूं...देखें क्या मामला है? हो सकता है कुछ फायदा हो जाए....कलमछाप उसके पीछे हो लिया... और एक जगह उन दोनों का सामना हो गया...कलमछाप ने देखा कि वो आकृति अजीब सी थी बिलकुल एलियन जैसी....वो उसे देखकर डर गई थी...कौन हो? एलियन....हे..एलियन को हिन्दी बोलता सुनकर कलमछाप हैरान हो गया उसे पता था कि एक आरटीआई में किसी ने भारत पर एलियन और पिशाचों के हमले और उनसे निपटने के बारे में जानकारी मांगी थी.. तुम एलियन हो...हां कितनी बार बताऊं हां भई हां...यहां क्या कर रहे हो...मैं यहां खाना खाने आया था सुना है यहां भोजभंडारे होते ही रहते हैं....हां पर अभी सीजन नहीं है सुबह आना श्राद्ध का खाना कहीं न कहीं तो मिल ही जाएगा...वो बात नहीं है..मुझे पौष्टिक खाना चाहिए...वो तो यहां मध्यान्हभोजन में भी नहीं मिलता तुम कहीं और चले जाओ...अच्छा..अब कलमछाप ने सोच अच्छा मौका है इसका एक्सक्लूसिव इंटरव्यू ले लेता हूं हो सकता है कहीं चांस मिल जाए...कलमछाप पेन डायरी निकालने लगा.. ये क्या कर रहे हो? वो घबराया...कुछ नहीं पेन-डायरी निकाल रहा हूं ताकि तुम्हारा इंटरव्यू ले सकूं...अच्छा अच्छा तो ये बात है..पूछो-पूछो शौक से पूछो वैसे भी मेरे ग्रह फाल्तूनोवा में सब मुझे गधा कहते हैं मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मैं कितना समझदार हूं...
सवाल- क्या आपको मालूम है? एक आरटीआई आपके हमले के बारे में....हां पता चला था पर हमारा ऐसा कोई फ्यूचर प्लान नहीं है...सवाल- आप हमेशा विकसित देश में ही हमला क्यों करते हैं जैसा कि एवेंजर्स में बताया था...अरे यार हमले का कोई फायदा भी तो होना चाहिए भारत में हमला करके हमें क्या मिलेगा हां..वैसे इस फिल्म की पायरेटेड सीडी से फिल्म देखकर हमारे राजा मर गए..उनको डर बैठ गया कि अगर एवेंजर्स ने हमारे ग्रह पर हमला बोल दिया तो..सवाल- अगर आप इंदौर शहर पर हमला कर दें तो? अबे यहां हम हमला क्यों करेंगे? अरे ये स्मार्ट सिटी है..स्मार्ट मेरी नाक का बाल..सडक़ों में गड्ढे, आवारा ढोर, गंदगी, खराब व्यवस्थाएं, अपराधों का हाई ग्राफ...हम पागल हैं जो यहां हमला करेंगे... कलमछाप ने सोचा हम जिन बातों को गलत समझते हैं वास्तव में वो कितनी अच्छी हैं जिनकी वजह से हम एलियनों के हमलों से बचे हुए हैं...क्या सोच रहे हो? अगर हम यहां आते हैं तो हमारी गाडिय़ां गड्ढे में गिर जाएंगी हम जख्मी हो जाएंगे, मर गए तो क्या?...गंदगी से हम बीमार हो जाएंगे शायद मर भी जाएं... आवारा ढोर अगर हम पर हमला कर दें तो हमारा क्या होगा बताओ तो जरा...गाय-ढोर तो ठीक आवारा कुत्ते तो हमारा अगाड़ा पिछाड़ा सब फाड़ देंगे...रैबीज हो गया तो ये बीमारी हमारे ग्रह तक चली गई तो? तुम्हारे शहर में अपराधों का ग्राफ हाई है अगर किसी ने एलियन को चाकू मार दिया तो? यहां दुष्कर्म के मामले बच्चों के साथ तक हो रहे हैं अगर किसी ने हमारी एलियाना को या हमारे बच्चों के साथ...तुम्हारे शहर में नशा होता है-सटï्टा भी होता है हमारे एलियन नशे से बर्बाद हो जाएंगे...सट्टे में हमारे यहां की मुद्रा लगाकर हमारे ग्रह को दीवालिया कर देंगे... अपराधों का प्रभाव तो देखो..यहां पर तो तुम लोगों की रिपोर्ट पुलिस तक नहीं लिखती हम तो फिर परग्रही एलियन हैं यहां के कानून से बाहर...हमारा दिमाग खराब नहीं हो गया है जो इंदौर पर हमला करें.....अगर कभी भविष्य में विज्ञान उन्नत हो गया और इंदौरी तुम्हारे ग्रह पर हमला करने पहुंच गए तो? अरे हां ये तो बहुत खतरे की बात हो जाएगी...मैं जाकर अभी नवनियुक्त एलियन राजा से इस बारे में बात करता हूं. वैसे आपके पास तो अत्याधुनिक हथियारों से भी अत्याधुनिक हथियार होंगे...अरे यार पर वो तुम्हारे इंदौरीयों से ज्यादा नहीं हैं....हें वो कैसे? अरे तुम्हारे यहां तो लोग चम्मच को घिसकर चाकू बना लेते हैं ये टेक्रोलॉजी हमारे पास है ही कहां? और तो और अगर हमारे एलियन बंदूक लेकर आए तो तुम्हारा इंदौरी इन पर गुटका पीक देगा ये भी हमला है वायरसों का हमला...अरे हम तो इसे गंदगी मानते हैं ये तो हथियार निकला..हां तभी हम इंदौरियों से डरते हैं वो कहींसे भी कैसे भी हमला कर सकते हैं...अच्छा अब मैं चलता हूं एक सवाल और...पूछो..कुछ खास चीज जो तुम लेजाना चाहते थे पर ले नहीं जा सके और मौका मिले तो ले जाओगे..राहुल खाट हां...राहुल खाट हमारे ग्रह पर कुछ लोग ये ले गए हैं और आराम से इस पर सो रहे हैं...भाई जाते-जाते एक आखरी सवाल...पूछो पर इसके बाद नहीं...हां..भारत के सुपर हीरो शक्तिमान, क्रिश और फ्लाइंग जट्ट के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है....हाहाहाहा...ये टटपुंजिये अपने देश को नहीं सम्हाल सकते तुम हमारी बात करते हो...देखो शक्तिमान को साधुओं ने पाला था सो वो हिन्दू था एक खास वर्ग के लोगों ने उसका बहिष्कार कर डाला...ये देखकर क्रिश बिना धर्म का हो गया...फ्लाइंग जट्ट सिख है सो फिर खास वर्ग ने उससे दूरी बना डाली..कुछ दिन में दलित कहेंगे ये सुपर हीरो सवर्ण हैं हमें तो दलित सुपरहीरो चाहिए...फिर दबंग सुपरहीरो चाहिए..पाटीदार तो कहीं जाट और कहीं मराठा, हिन्दू-मुसलिम सुपरहीरो...जहां अच्छाई को भी धर्म की नजर से देखा जाता हो वहां का सुपरहीरो इन्हीं बुराइयों में फंसकर दम तोड़ देगा..वो हमारा मुकाबला क्या करेगा? अरे एक बात तो बताते जाओ भारत की कुछ चीज तो तुम्हारे यहां होगी...कुछ खास नहीं पर हमारे राजा रोज रजनी केन (कांट नहीं क्योंकि वो हर चीज कर सकता है) की पूजा करते हैं...अच्छा चलता हूं...पर मुझे और सवाल पूछने हैं...मैं एक-दो दिन बाद फिर आऊंगा तब कर लेना.. यहीं मिलूंगा..मेरा नाम जरूर लगा देना बतोड़ेंबो...तभी कहीं से आवारा कुत्तों ने उस पर हमला कर दिया और वो अंधेरे में गुम हो गया....कलमछाप लौट आया. ये उसी का हिस्सा है आगे के इंटरव्यू के लिए इंतजार करें जैसे कलमछाप को इंतजार है.......

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

राजा-रानी, मंत्री, चोर सिपाही तंत्री

ये कहानी सच है या झूठ इस बात से ज्यादा इस बात को समझना जरूरी है कि ऐसा क्योंकर हुआ।
राजा अपने सिंहासन पर मदिरा के मद में चूर होकर बैठा था तभी मंत्री वहां आया। महाराज......महाराज....। क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहा है। राजन हमने अभी एक चोर को पकड़ा है, ये राजमहल से कुछ चोरी करके ले जा रहा था। प्रस्तुत करो....। चोर को लाए। वो डरा नहीं। बोल क्या चुरा रहा था? चोर ने अकड़कर कहा- जरा मंत्री से एकांत में बात करवाइये। राजा बोला- कर ले। मंत्री और चोर एकांत में आए। सुन भई मंत्री...मेरी घुमाफिराकर बात करने की आदत नहीं है। तू महारानी के साथ जो कक्ष में कर रहा था और वो जो चाहकर भी कह रही थीं ना ना रे ना। वो अगर बोल दूं तो। मंत्री चकराया-अरे ये तो बाप निकला। हे क्या सोच रहा है, बचना चाहता है तो अभी कि अभी सवालाख स्वर्ण मुद्राएं दे और राजकीय मुद्रा लगाकर सातकुएं और खेती की जमीन मेरे नाम लिख। मंत्री चालाक था वो बोला- मित्र मैं तो रानी से प्रेम करता हूं। राजा तो कांटा है कांटा ऊपर से कापुरुष भी तू राजा का वधकर दे। मैं तुझे राजा बना देता हूं। रानी को लेकर मैं आधा राज्य ले लूंगा आधा तेरा। चोर सोचने लगा। फिर बोला- रानी से बात करवा वो भी अकेले में तुझ पर यकीन नहीं है।
अब मंत्री सोच में पड़ गया फिर वो उसे लेकर रानी के कक्ष में गया। चोर की पूरी कहानी रानी को सुनाई और कहा कि वो चोर उससे इस बात का प्रमाण चाहता है कि वो भी उसकी प्रेमिका है या नहीं। रानी अकेले मेंं चोर के सामने थी। चोर के आधेनंगे बदन, विशाल भुजाओं और प्रबल पौरुष को देखकर वो मचल उठी। उसने उसे कमनीय अदाएं दिखायी। चोर न पिघला-देखो रानी ये देखकर तो हर कोई रीझ जाएगा मैं जो कहता हूं ध्यान से सुनो। रानी दौड़कर बाहर मंत्री के पास आई। वो मान गया। वो राजा का वध करेगा फिर तुम उसका फिर तुम राजा और मैं रानी। वाह, ये हुई न बात..जानता हूं तुम्हारे वशीकरण से तो साक्षात ब्रम्हदेव भी न बच पाएं। पर एक शर्त है मेरी...। बोलो रानी। मैं उस राजा का वध और इस नीच चोर का वध अपनी आंखों से देखना चाहती हूं। तो चलो जल्दी शुभस्य शीघ्रम्। वो राजा के कक्ष में पहुंचे। राजा कुछ होश में था- आए गए मंत्री...बहुत देर में आए। चोर ने एक चाकू फेंककर राजा को मारा तो वो उसके सीने के आर-पार हो गया। मंत्री ने तुरंत कृपाण से चोर की पीठ पर आघात किया पर वो दर्द से कर्राहकर वहीं गिर गया। राजरानी ने उसकी पीठ में कृपाण उतार दी थी अब चतुर रानी ने कृपाण घायल चोर को फेंककर मार दी। चोर घबरा गया। रानी तुमने तो कुछ और ही कहा था, चोर बोल पड़ा। चोर की आंखों के सामने रानी के कक्ष का दृश्य घूम गया। चोर ने रानी से कहा- मेरी बात ध्यान से सुनों क्यों इस मद्यपायी राजा या पौरुषहीन मंत्री से संबंध रखती हो। तुम मुझे अपने गले में पड़ा नौलखा हार दे दो तो मैं इन दोनों को मारकर तुमको इनके बंधन से मुक्त कर दूंगा। पर यहां तो कुछ और ही हो गया।
अब रानी मुस्कुरायी- क्या तुम पुरुष ही नारी से खेल सकते हो, कभी सीता बनाकर गर्भकाल में वन भेज देते हो तो कभी द्रोपदी के रूप में भरी सभा में उसका शीलहरण होते देखते रहते हो। कभी विधर्मी के रूप में उनको पवित्र करने के उद्देश्य से उनसे दुष्कर्म करते हो कहते हो इनमें आत्मा ही नहीं है और इसे धर्म का अंग बताते हो तो कभी जोधा के रूप में उपहार दे देते हो। चोर और न सह सका और वहीं गिर गया। रानी ने अपने खास सिपाही को बुलाया। जो बाहर ही खड़ा था, उसने चोर और रानी सहित मंत्री और रानी का पूरा वार्तालाप सुना था। जब मंत्री नहीं होता था तो यह सिपाही ही रानी का प्रेमपात्र होता था। चोर मर चुका था और दोनों हत्याएं उसके सिर थीं। अब रानी मुक्त थी। एक दिन बाद रात्रि को रानी शयनकक्ष में थी उसने बाहर से सिपाही को बुलाया वो कक्ष में आ गया। वो कक्ष के कपाट बंद करता उससे पहले रानी की मदपूर्ण आवाज आई- देखना कहीं कोई चोर न हो। सिपाही बोला-राजरानी अबकी मेरी बारी न हो। रानी ने प्याला लेकर अ_हास किया- अभी मुझे तुम्हारी आवश्यकता है। इस सब को जानकर इतिहास तंत्र के तंत्री ने लिखा-
किसी बात का गिला नहीं, शर्म नहीं हया नहीं, किरदार बदले मगर फसाना नया नहीं।
मोहरे अब मात देती हैं खिलाड़ी को, अब खेल भी बाहया नहीं।।

ग्वालिन का परमानंद

किसी गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह रोज एक पुरोहित के घर दूध देने जाया करती थी। पुरोहित का घर नदी के पार था। एक बार बारिश के मौसम में नदी ने रौद्र रूप ले लिया। इस कारण ग्वालिन पुरोहित के घर दूध देने नहीं जा सकी। दूसरे दिन जब ग्वालिन पुरोहित के घर गई तो पुरोहित ने उसे डांटा। इस बात पर ग्वालिन ने उसे बताया कि बारिश के कारण नदी का बहाव बहुत तेज था इसलिये वो नहीं आ पाई।
पुरोहित ने ग्वालिन से कहा कि भगवान श्रीहरि के नाम के सेतु (पुल) से लोग संसार के कष्टों की नदी पार कर जाते हैं तो इस उफनती नदी की क्या बात है? यह बात ग्वालिन के मन पर जम गई। अगले दिन फिर तेज बरसात हुई। नदी ने फिर रौद्र रूप ले लिया। पुरोहित को किसी काम से नदी पार जाना था पर वो उसके चरम बहाव को देखकर वापस लौट आया। कुछ देर बाद ग्वालिन उसके घर दूध देने आई। उसे आया देखकर पुरोहित को आश्चर्य हुआ। उसने उससे पूछा कि नदी का बहाव चरम पर है ऐसे में वो उसे पार कर उसके घर कैसे आई। उसी सेतु से जिसकी बात कल आपने बताई थी, ग्वालिन का सीधा सा उत्तर था। पुरोहित कुछ समझा नहीं इस पर ग्वालिन उसे लेकर नदी के पास पहुंची और श्रीहरि के नाम का जाप कर नदी के वेगवान पानी पर चलने लगी। यह देखकर पुरोहित ने भी ऐसा ही करने की कोशिश की पर वो असफल हो गया।
भगवान श्रीहरि विष्णु भावों के आग्रही हैं वह हृदय की पवित्रता और समर्पण देखते हैं स्तर नहीं इसलिये अपढ़ ग्वालिन भगवान की कृपा को प्राप्त कर गई वहीं ज्ञानी पुरोहित असफल हो गया।

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

कहानी महादैत्य मिनाटोर की

(ये कहानी ग्रीक की लोक कथाओं पर आधारित है।)
ये कहानी शुरू होती है शक्तिशाली सम्राट एस्थेरियस या कहें एस्टेरिअन की मौत पर, एस्थेरियस जिसकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उसके अनाथ राज्य को साथ मिला उसके सौतेले बेटे और उसकी बेइंतहा खूबसूरत पत्नी यूरोपा और देवताओं के राजा जूस की संतान मिनस का। मिनस ने एस्टेरियस के राज्य पर अपना दावा पेश किया पर उसके सामने मुसीबतें कम नहीं थी इसलिये उसने 12 ओलंपियंस में से पांचवे ओलंपियन समुद्रों और तूफानों के देवता पोसेइडन से प्रार्थना की कि वो उसे अपना प्रतीक एक सांड दें जिससे कि वो अपने दुश्मनों पर यह जाहिर कर सके कि उसका राज्याभिषेक होना देवताओं की भी इच्छा है। उसने वादा किया कि वो राज्य मिलने के बाद उस सांड को पोसेइडन को बलि चढ़ा देगा।
पोसेइडन ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे एक सांड दिया। पोसेइडन ने अपना काम किया और मिनस को राज्य मिल गया।
अब मिनस की बारी थी अपना वादा निभानेे की पर मिनस ने जैसे ही उस सांड को देखा उसका मन बदल गया। सांड श्वेत रंग का और बेहद हृष्ट-पुष्ट था। उसकी सुंदरता और शक्ति को देखते हुए मिनस ने निर्णय लिया कि वो उस सांड की जगह किसी और सांड को बलि चढ़ायेगा और इस सांड को सुरक्षित रखेगा।
शीघ्र ही क्रोधित होने की प्रकृति वाले पोसेइडन इस बात पर नाराज हो गये और मिनस की पत्नी पेसिफे के मन में उस सांड के लिये अनुराग पैदा कर दिया।
मन में इस सांड से संसर्ग की इच्छा से तड़पती पेसिफे ने देवताओं के शिल्पी डिडेलस पर अपनी मंशा जाहिर की। डिडेलस ने उसके लिये एक लकड़ी की गाय बनाई।
पेसिफे ने इस काष्ठ की गाय में बैठकर इस सांड से संसर्ग किया। इस मिलन से पेसिफे गर्भवति हुई और उसने एक विचित्र बच्चे को जन्म दिया। इस बच्चे का सिर एक सांड का और धड़ एक मानव का था।
इस विचित्र बच्चे को इसके दादा एस्टेरिअन ने नाम दिया मिनाटोर जिसे मिनाटोरस के नाम से भी जाना गया।
इस बच्चे ने तेजी से विकसित होना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे वो बढ़ता गया उसकी भूख भी बढ़ती गई। दूसरी ओर बदनामी के डर से पेसिफे ने डिडेलस को एक ऐसी भूलभुलैया का निर्माण करने का आदेश दिया जिसमें से न तो मिनाटोर बाहर आ सके और न ही उसमें जाने वाला बाहर आने का रास्ता कभी खोज ही पाये। ताकि उसकी बदनामी सामने न आ पाये और यदि कोई इस बारे में जानने की कोशिश करे तो वो ही खत्म हो जाये।
बहुत जल्द ये अंधेरी भूलभुलैया महान दैत्य मिनाटोर की आश्रय स्थली बन गई। यहां मिनाटोर को मानव मांस दिया जाता था यहां खासकर उसे एथेंस के चौदह महान ज्ञानवान लोगों को भोज्य के तौर पर प्रस्तुत कर दिया गया जिनको एथेंस शहर से कुर्बानी के लिये हर नौ साल के अनुबंध पर मिनोस के आदेश पर लाया गया था। इसके पीछे मिनोस का बदला भी था जो वो एथेंसवासियों से लेना चाहता था। उसका पुत्र एंड्रोगिनस एथेंसवासियों की जलन का शिकार हो गया था जो उसके द्वारा उनको (एथेंसवासियों) पेनेथेनिक क्रीड़ाओं में हराये जाने से उपजी थी।
मिनाटोर की भूख बढ़ती गई और लोगों की कुर्बानी होती रही। पर जैसे हर रात की सुबह होती है वैसे ही हर पाप का अंत होता है और मिनाटोर का भी अंत था। एथेंस के दुर्भाग्य को बदलने के लिये भी एक योद्धा का आगमन हुआ। शैतान कितना भी ताकतवर क्यों न हो ईश्वर से उसकी ताकत हमेशा ही कम होती है क्योंकि उसको भी ईश्वर ने ही जन्म दिया था। तीसरी बार जब एथेंसवासियों को कुर्बानी के लिये ले जाया जा रहा था तब इनके बीच थीसियस नामक योद्धा क्रीट की यात्रा करने के लिये इनके साथ चला गया या कि उसे भी मिनाटोर के भोजन के लिये ले जाया गया।
क्रीट में मिनोस की बेटी एरिडन थीसियस को दिल दे बैठी। उसने निश्चय किया कि वो थीसियस की मदद करेगी। उसने देवताओं के शिल्पी और भूलभुलैया के निर्माता डिडेलस से प्रार्थना की कि वो उसे भूलभुलैया का रहस्य बताये। डिडेलस का यह निश्चय कि वो भूलभुलैया के बारे में किसी को नहीं बतायेगा प्रेम की शक्ति के आगे नत हो गया और उसने उस भूलभुलैया को खोल दिया। इस घुप्प अंधकार में मिनोटोर कहां होगा इसका किसी को भी पता नहीं था। अपनी मौत से मुकाबला करने जा रहे थीसियस को एरिडेन ने धागों की गेंद दी जिससे कि वो मार्ग में भटके नहीं। एरिडेन ने अमत्र्य देवताओं से प्रार्थना की कि वो थीसियस की रक्षा करें। एरिडन ने थीसियस को यह भी बताया कि मिनाटोर को उसी के अस्त्र-शस्त्र से मारा जा सकता है। थीसियस ने एरिडन से वादा किया वो जिंदा लौटने की कोशिश करेगा और ये जानकारी मददगार थी। अगर किस्मत में हुआ तो उनका मिलन होगा।
थीसियस भूलभुलैया के अंधकार में गुम हो गया। समझदार थीसियस ने धागों की सहायता से मार्ग को चिन्हित किया ताकि वो वहां भटके नहीं। अंधकार में वो शवों की दुर्गंध से परेशान हुआ, अधखाये शवों से टकराया, नरकंकालों में उलझा और अंत में वो भूलभुलैया के केंद्र में जा पहुंचा। यहां उसका मुकाबला हुआ महान योद्धा मिनाटोर से। थीसियस ने उसे जितना शक्तिशाली समझा था वो उतना शक्तिशाली नहीं था...वो उससे भी अधिक अतुलनीय रूप से शक्तिशाली था। उन दोनों में घमासान युद्ध हुआ जिसमें मिनाटोर का सींग टूट गया थीसियस ने उसी सींग से मिनाटोर की छाती भेद दी और इस प्रकार महान मिनाटोर का अंत हुआ और क्रीट और एथेंस को इस महान राक्षस से मुक्ति मिली।

The Girl at the Bus stop

When the bus crossed stop number 8 a boy looked at the stop. He looked a girl out off the window her face was covered by a cloth. The name of this boy was Niket. Each and every day looking her was his routine work or in other words he was habitual of it. What a charm she had that he did not stop him looking her. He had a great love for her. It was a silent love but he did not tell her. She was waiting for another bus he thought.
One day she entered in the same bus he was going by. All time he looked her by pretend. But that day was a shocking for him. He did not see the girl at the point. Many days were passed he did not see the girl. Since a long time she was not stand there for any bus. Her absences pained him a lot but he was unable to do anything even he did not know her name then what to say about her whereabouts. After one and a half year he got married with a local girl Suruchi. But he did not forget her. One week has passed of his marriage but he did not comfortable in his love life. His wife Suruchi was also knowing this but she did not say anything.
One day she requested him that she had some work in bank and after doing that could he drop her to her mother’s home. He unwillingly agreed. He took her to Bank after some time she came out he looked her face it was covered by cloth and she was looking similar to the girl to whom he looked at bus stop.
He put the Motor bike on stand and asked to her that before one and a half year was she awaited for bus at bus stop number 8 for some days.
She replied- Yes, but why. Now he hold her and kissed her. The “but why” was muted in the lips touching.
As he freed herself she said hey! she surprised at this- What happened.. What are you doing.. Are you crazy...O my god...People are noticing all this..
The only words he said were- I got the peace of my heart. I got the girl for whom my heart was waiting at the bus stop. Suruchi was surprisingly looking all this without understanding the matter.

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

The Nature

Rain poured drops on her face.
Moisted her hair, smile and dress.
Her feeling broke down all bands.
But her warmness expressed her presences.
She drank water in her palms and dropped down lifewater to the earth.
It is pracious and has no worth.
Do you know this creatore.
It is not other than nature.
Nature Mother, Guide or fiancee any incarnation she could take she is in our favour.
Let's save her and love her as she could exist without us but we never, never and never.
AjayShrivastava

मंगलवार, 30 जून 2020

दिल बहलाने का सहारा

शर्मा जी दुखी होकर बालकनी से अंदर की ओर जा रहे थे। सामने वाली बालकनी में रहने वाली अमिता कमरा खाली करके चली गई थीं। यह फ्लेट अब बिक गया है और कल ही इसमें नये मालिक भी आ गये हैं। न जाने कैसे लोग हैं? अमिता जब भी आमने सामने होती थी तो एक दिलकश मुस्कान तो देती ही थी भले ही कुछ कहती न हो। दिल बहलाने को वो सहारा क्या कम था। अब न जाने क्या हो?
तभी बालकनी का दरवाजा खुला एक गोरी गदराई महिला बालों को सुलझाती हुई पैजन बजाती हुई बालकनी में आई और शर्मा जी को देखकर बोली- नमस्ते जी हमने ये फ्लेट खरीदा है। कल ही शिफ्ट हुए हैं आपका भी खुद का ही फ्लेट है न। उसने लाली लगे भरेपूरे होठों से एक ताजगीभरी मुस्कान बिखेरी। उसके हाथों में मेहंदी का रंग खिल रहा था इस पर लंबे घनेरे गेसुओं का ये अंधेरा। हाँ..हाँ.. शर्माजी से अब कुछ बोलते न बना वो तो बस उसमें ही खो गये थे। आज शाम को आइये न..ये भी घर पर हैं..। अब शर्माजी अंदर की ओर भागे। भाभीजी को साथ लाइयेगा..उसकी आवाज पीठ से आई जिस पर शर्माजी का ध्यान न था। वो अंदर जाकर शर्माइन से बोले- सामने की बालकनी में अच्छे पड़ोसी आये हैं। पड़ोसी या पड़ोसन..शर्माइन ने पूछा। तुम जो समझो..शर्माजी ड्राइंग रूम की ओर चले गये। शर्मा जी सोच रहे थे कुछ भी हो दिल बहलाने का सहारा तो मिल ही गया।

गुरुवार, 25 जून 2020

मौत का सैंकड़ों साल पुराना बसेरा 50 बर्कले हाउस

क्या कुबूल है मौत की चुनौती
कई दुस्साहसी आए और जान की कीमत चुका कर रुखसत हो गए
उसे पसंद नहीं है दूसरों का दखल, वो चाहता है घुसपैठियों की मौत
बस आदर देकर कर सकते हैं उसका सामना
ब्रिटेन में स्थित है 50 बर्कले पैलेस। इस मकान का इतिहास सैंकड़ों साल पुराना है। कहते हैं इसका मालिक एक अय्याश आदमी था और हर रात एक नई लड़की को अपनी हवस की बली वेदी पर कुर्बान करता था यही नहीं वो इनको घर में ही कैद करके रखता था और वहशियत को अंजाम देता रहता था। वो लड़कियां केवल मरकर ही इस कैद से मुक्ति पा सकती थीं और वो मरती भी गईं पर उनकी अधूरी इच्छाओं ने उन्हें यहीं कैद कर दिया और उनका मालिक भी मरकर अपनी हैवानियत से बाज नहीं आया और इस मकान में शैतान के रूप में रहने लगा। ये मकान ब्रिटेन के सर्वाधिक भूतग्रस्त मकानों में गिना जाता है।
कहते हैं कुछ सौ साल पहले दो दोस्त नाविक भटकर यहां आ गए। घर को खाली देखकर वो रात बिताने के लिए अंदर चले गए। घर की मनहूसियत देखकर एक बारगी तो वो खौफजदा हो गए पर नींद और थकान से भारी होते वो दोनों ऊपर जाकर एक कमरे में सो गए। ये कमरा आज भी है और हाईलीएक्टिव यानी सर्वाधिक प्रेतात्मक रूप से सक्रिय माना जाता है। मध्य रात्रि भारी कदमों की आहट ने दोनों को जगा दिया। अचानक उनके कमरे का दरवाजा खुला और एक साया अंदर दाखिल हुआ। पहला दोस्त जो दरवाजे के पास सो रहा था अनिष्ट समझकर बाहर की ओर भाग निकला और दूसरा वहीं अंदर रह गया। उसके साथ अंदर क्या हुआ? कोई नहीं जानता। पहला दोस्त नाविक पुलिस को लेकर वहां पहुंचा तो उसकी रूह कांप उठी और पुलिस भी घबरा गई। उसका दोस्त उस कमरे की खिड़की से नीचे कूद गया था और नीचे लगे लंबे सींखचों में घुस चुका था। उसका चेहरा भयाक्रांत होकर विकृत हो चुका था। वो या तो डर के मारे खुद ही कूद गया था या उस शैतान ने उसे यहां फेंककर मार डाला था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सन् 1887 में दो नाविक व्यापारी जो एचएमएस नेनिलोप से संबंधित थे। यहां रुके थे जिनके साथ यह घटना हुई। दूसरे नाविक व्यापारी का कहना था कि उन्होंने श्रीमान मायर्स का भूत देखा था। जिसने उन्हें आक्रामक रूप से पकड़ लिया था।
कई दुस्साहसियों ने यहां आकर अपनी बहादुरी जताने की कोशिश की पर उन्होंने मौत की जो दहशत भरी इबारत लिखी उसको पढऩे की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाया। एक रात यहां तीन दोस्त रुके हुए थे और उनमें से एक ने शर्त लगाई कि वो ऊपर के कमरे में जाकर पूरी रात गुजार सकता है। बाकी दो ने उसे मना किया पर वो नहीं माना उसने कहा कि यदि कुछ गड़बड़ होगी तो वो घंटी बजाएगा। उसके जाने के चंद सेकंड के बाद घंटी बजी। दोनों दोस्त ऊपर पहुंचे तो पाया वो कुछ देखकर दहशत में है और मर रहा है। उन्होंने उससे पूछने की कोशिश की पर वो कुछ भी नहीं बता पाया और सो गया मौत की नींद में। एक बार एक महिला सफाई कर्मी सीढिय़ों पर सफाई कर रही थी अचानक वो कुछ देखकर सदमें में आ गई। उसने क्या देखा वो उसको कभी बता ही नहीं पाई। वो चलती फिरती लाश बन गई।
अगर इस दुनिया में महाशक्तिशाली परमात्मा है तो जाहिरातौर पर उसकी विरोधी शक्ति शैतान भी है जिसकी शक्ति परमात्मा से कम है पर इंसान से तो ज्यादा ही है।
इस मकान के भूत के बारे में कहा जाता है कि ये एक युवा महिला के भूत का आशियाना है जिसने यहां की ऊंची खिड़की से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि इस महिला का यौन शोषण इसके अंकल द्वारा किया गया था जिससे वो आहत हो गई थी। ये भी कहा जाता है कि इस महिला का भूत लोगों को इतना डरा देता है कि उनकी मौत हो जाती है। देखने वालों ने बताया है कि इस महिला भूत भूरी झांई की तरह दिखाई देता है यद्यपि ये कभी-कभी सफेद भी दिखाई देता है।
एक अन्य दुर्लभ कहानी के अनुसार इस कमरे में एक आदमी को तालाबंद कर दिया गया था जिसे दरवाजे में बने एक छेद से भोजन दिया जाता था। इसे इस प्रकार से तब तक बंद करके रखा गया जब तक कि वो मर नहीं गया। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां वास करने वाली आत्मा एक छोटी बच्ची की है जिसे उसके वासनातुर नौकर ने मार डाला था।
ये कहा जाता है सन् 1859 से 1870 के मध्य थॉमस मायर्स यहां रहे थे। ऐसी जनश्रुति है कि उनकी प्रेयसी ने उनको छोड़ दिया था। वो यहां अकेले रहे और उन्होंने अपने आप को यहां तालाबंद कर लिया। वो यहां अपने पागल होने और नवंबर सन् 1874 में अपनी 76 साल में होने वाली मौत तक रहे। उनके यहां रहने के दौरान ही इस मकान की भूतग्रस्त होने के रूप में पहचान बनने लगी थी।
ऐसा बताया जाता है कि सन् 1872 में एक शर्त के अनुसार लार्ड लिटलेट इस मकान के सर्वाधिक भूतग्रस्त ऊपर के कमरे में रात बिताने पहुंचे। उनके पास एक बंदूक थी। रात में उनको एक साया दिख जिस पर उन्होंने गोली दागी। इसके बाद दूसरे दिन जब वो उस साये का पता लगाने के लिये घर के निरीक्षण पर निकले तो उन्हें साया तो नहीं मिला पर गोली के खाली खोखे उन्हें जरूर मिल गये।
बाद के सालों में स्थानीय काउंसिल ने इस घर के मालिक को एक समन भेजा जिसके अनुसार वो कर देने में असमर्थ बताया गया था पर वो किसी पर अभियोजन नहीं कर सके क्योंकि ये मकान भूतग्रस्त था और कोई भी इसका दायित्व लेने को तैयार नहीं था।
इस घर की बदनामियां यहीं तक सीमित नहीं हैं। सन् 1879 में प्रकाशित मेफेयर पत्रिका हमें बताती है कि यहां के ऊपरी कमरे में एक नौकरानी रुकी थी। बाद में वो पागल हो गई और दूसरे दिन पागलखाने में उसकी मौत हो गई। इसके साथ ही ये भी कहा जाता है एक सुप्रसिद्ध व्यक्ति ने यहां रात बिताई और वो लकवाग्रस्त और बोलने में असमर्थ पाये गये।
वर्तमान में माना जाता है कि पीटर अंडरवुड की किताब हांटेड लंदन (सन् 1975 में प्रकाशित) के कारण लोगों की रुचि इस भूतहे मकान में जागी थी जो आज भी कायम है। एक मजेदार तथ्य है कि सन् 1930 में जब से मेगस भाइयों ने इस मकान को खरीदा है तब से लेकर अब तक इस मकान में कोई भूतों की घटना घटित नहीं हुई है। यद्यपि मीडिया सूत्रों ने बताया है कि यहां ऐसी घटनाएं हुई हैं। हालांकि निकट वर्तमान में अनवेषणकर्ताओं ने ऐसी किसी भी प्रेत गतिविधि से इंकार किया है पर इनका कहना है कि एडवर्ड बुलवर-लिट्टन की कहानी द हंडेट एड द हंटर्स में उल्लेखित समानताएं 50 बर्कले पैलेस स्क्वेयर में भूतग्रस्त घटनाओं का समर्थन करती हैं।
बर्कले पैलेस में समय के तीन दौर का वर्णन मिलता है- सन् 1872 से 1883, 1879 और 1880 से 1881। सामान्यत: लोगों की यह राय है कि इस घर की अनदेखी ने यहां भूत होने की अफवाह को बढ़ावा दिया है।
लेडी डोरोथी नेविल ने अपनी सन् 1906 में प्रकाशित आत्मकथा में कथन किया है कि श्रीमान मायर्स उनके रिश्तेदार थे। अपनी प्रेमिका को खोने के बाद वो पागलपन की हद को पार कर गये। वो पूरे दिन घर में रहते थे और रात के समय ही सक्रिय होते थे जब वो किंकर्ताविमूढ़ होकर यहां-वहां घूमते और विचित्र आवाजें निकाला करते थे। यह घर रात के अंत पर ही शांत होता था। नेविल का निश्चित रूप से मानना था कि मायर्स की पागलपन भरी हरकतों को लोगों ने भ्रमित होकर प्रेतगतिविधि से जोड़ दिया होगा। वो निष्कर्ष निकालती हैं कि इस घर में प्रेतगतिविधि का कोई प्रमाणित आधार नहीं है और यह सबकुछ एक बकवास है।
आधुनिक अनवेषणकर्ताओं का मानना है कि यह घर कभी भूतग्रस्त था ही नहीं और यहां से संबंधित अधिकांशत: कहानियां या तो अफवाह हैं या बाद के लेखकों द्वारा आविष्कृत हैं। वे उदाहरण देते हैं कि नाविक व्यापारियों के यहां 1870 में यहां आने की कहानी इलियट ओ डोनेल द्वारा बनाई गई थी तथा इस कहानी के किसी भी भाग की प्रमाणिकता साबित नहीं हुई है।
इस मकान को कई लोगों ने खरीदा और बेचा। लोग यहां मरते रहे और दहशत बढ़ती ही रही। इसके वर्तमान मालिक मेगस ब्रदर्स ने यहां के पुस्तकालय बना रखा है। उनका कहना है कि जब भी वो यहां दाखिल होते हैं उनको एक अनजान साये के आसपास होने का अनुभव होता है। वो बड़े ही सम्मान के साथ उससे पेश आते हैं जिस पर उनको लगता है कि वो इससे खुश भले ही न होता पर उनको उनका काम करने भर की इजाजत दे देता है जिससे कि उन पर या उनके किसी कर्मचारी पर कोई आफत न आ जाये। उनका कहना है कि एक बार जब यहां सफाई की जा रही थी तो उनको महसूस हुआ कि कोई उनके पीछे खड़ा होकर बड़ी गंभीरता से यह सबकुछ देख रहा है। उनके कर्मचारी का कहना है कि ये एक आश्चर्य है कि यहां अनगिनत आत्माएं किताबों में घर बनाकर रह रही हैं।
उनके किताबों का काम सम्हालने वाले कर्मचारी का कहना है कि उसने कई बार सामने गैलरी में एक सफेद पोशीदा साए को आते-जाते देखा है। ऐसे कई साए हैं और ये महिलाओं के लगते हैं। उनको अब इसकी आदत हो गई है। वो कहते-कहते बतातें हैं कि अभी जब हम बातचीत कर रहे हैं एक साया सामने से गुजरा है। ये एक बेहद सामान्य सी घटना है और दिन में कई बार घटित होती है। यहां रात में रुकने का साहस कोई नहीं करता और ऊपर वाले कमरे में जो कि प्रेतगतिविधियों को लेकर अतिसक्रिय है कोई नहीं जाता है और अगर वो जाते भी हैं तो वहां उनका आचरण बेहद सम्मान जनक होता है और वो वहां ज्यादा देर नहीं रुकते हैं। रात को यहां कोई नहीं रुकता। इस घर के मालिक बताते हैं कि एक बार किताबों की सफाई करने के अवसर पर उनको लगा कि पूरे समय एक आदमकद साया यह सबकुछ खड़े होकर देखता रहा और उन्होंने उसके प्रति आदर भी प्रदर्शित किया।
कई मौसम बीत चुके हैं पर यहां पर मनहूसियत का साया जस का तस बना हुआ है और ये कब तक बना रहेगा कोई नहीं जानता। शायद ये साया कभी नहीं हटेगा। अगर आप कभी इंग्लैंड जाएं तो एक बार बर्कले हाउस को जरूर देखें शायद आपको वहां ऐसा कुछ दिख जाए जो आपको ऐसी दुनिया पर यकीन करने पर मजबूर कर दे जिस पर आपको कभी भी यकीन न हो सकता हो।

शनिवार, 13 जून 2020

समुद्र: धरती पर जीवन का पिता

समुद्रों का रंगनीला फ्लाइटोपेंटन नामक छोटे जीव के कारण भी दिखता है। अगर अगर एक समुद्री वनस्पति है। समुद्री लाल काई से सीरोटीन/केरोटीन नामक वनस्पति प्राप्त होती है। ये जैली बनाने तथा खाना सुरक्षित रखने वाले रसायन बनाने के काम आती है। लाल काई से अलजरिया प्राप्त होता है। ये कैंसर, डाइबिटीज, ब्लडप्रेशर, अल्सर आदि कई बीमारियों की दवा बनाने के काम आता है। आयोडीन भी एक प्रोटीन है। कोरल रीफ 0.07/0.05 भाग समुद्र में फैली हुई है। यह कुल मिलाकर 1 लाख किमी तक फैली है। भारत की समुद्री इकाई 1800 किमी में फैली है। कोरल बोन ट्रांसप्लॉटमेें महती भूूमिका निभाती है। नर्म कोरल अंडमान, लक्षद्वीप में पाई जाती है। कोरल एक जीव है जो ताजे पानी का आगमन होने पर अंडे देती है। यह समुद्र में ऑक्सीजन सहित अन्य गैसों और रसायनों को संतुलित करती है। यह सुनामी को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये अस्थमा, अर्थराइटिस, कैंसर, त्वचा संक्रमण में लाभप्रद है। मानव द्वारा समुद्र को दूषित करने के कारण भारी मात्रा में कोरल नष्ट हो रही हैं। अगर यह यूं ही नष्ट होती रही तो शीघ्र ही समुद्र में गैसों का संतुलन बिगड़ जायेगा और छोटी मछलियों के आश्रय के साथ ही समुद्र में जीवनदायिनी गैसों का अंत भी हो सकता है जिससे समुद्री जीवन नष्ट हो जायेगा। समुद्रों की कार्बनडाइऑक्साइड शोषित करने की क्षमता भी समाप्त हो जायेगी और मानव को इसका भारी मूल्य चुकाना होगा।
समुद्री हार्स शू क्रैब भी लाभप्रद जीव है। यह समुद्र के सबसे प्राचीनतम जीवों में से एक है। इसका अवतरण अमीबा के साथ ही होना निश्चित किया जाता है। इसने इंजेक्ट करने पर एचआईवी के विषाणु को खत्मकर दिया। हालांकि मानव स्वार्थों की बलिवेदी पर चढ़ा यह जीव अपने जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है। समुद्र स्पंज भी लाभप्रद है। कैंसर में ये लाभप्रद है। ये अदभुत जीव है।
शार्क को समुद्र का सफाईकर्मी कहा जाता है। यह फुर्तीली और बेहद खतरनाक मछली घायल, बीमार और कमजोर जलीयजीवों को खाकर समुद्र में संक्रमण फैलने से रोकने में महती भूमिका निभाती है। ऐसा माना जाता है कि यदि शार्क नहीं होती तो समुद्र एक विशाल तरल कब्रस्तान में बदल गया होता। यह 11 किमी दूर से ही पानी में रक्त को पहचान कर तुरंत ही जीव पर प्राणघातक हमला कर देती है। इसके कटीले दांत शुद्ध डायमंड की तरह मजबूत और धारदार होते हैं। खारे पानी की इस भयानक मछली के हमले अमेरिका और पश्चिमी देशों में इंसानों पर आम हैं। एक सर्वे के अनुसार इसके हमलों में मरने वालों की संख्या लगभग होने वालों सड़क हादसों में मृतकों की संख्या के बराबर ही है। शार्क को ही समुद्र का सबसे घातक शिकारी कहना बेमानी बात होगी और यह नाइंसाफी होगी उस महान मछली के खिलाफ जिसे इसके कातिलाना अंदाज के कारण किलर व्हेल कहा जाता है। किलर व्हेल शार्क से भी ज्यादा घातक शिकारी होती है। यह समूह में शिकार करती है और सील जैसे चतुर जलीय जीवों सहित खुद शार्क और अपनी ही जाति की व्हेल का काम तमाम कर देती है। इस विशाल देहधारी को ओरका भी कहा जाता है। यूं तो यह बेहद खतरनाक होती है पर इंसानों पर इसका हमला होने की बात कम ही सामने आती है। समुद्र की बात हो और मानव से मित्रवत ब्लू व्हेल, बेलूगा व्हेल और डॉल्फिन का जिक्र न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। समुद्र में इनका मित्रवत व्यवहार इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करता है। वैज्ञानिकों को मानना है कि यह पूर्व समय में एक विशाल स्थलीय जीव रही होंगी पर समुद्र में भोजन और सुरक्षा मिलने के चलते यह समुद्र आश्रित हो गई होंगी। समुद्र में डॉल्फिनों द्वारा मार्गभटके जहाजों और मानवों को रस्ता बताने की कहानियां रोमांचक होती हैं। यही नहीं डॉल्फिन को अन्य मछलियों और उनके बच्चों को भी मार्ग दिखाते देखा गया है। इसको जो भी चीज सिखाई जाती है यह उसे तुरंत ही सीख लेती है जिससे पता चलता है कि इनका आईक्यू और सोचने का तरीका काफी कुछ इंसानों जैसा ही है।
समुद्र को जीवन और धरती का पिता कहा जाता है। भारत में समुद्र को देवता का रूप देकर इसके मानव जीवन में महत्व को स्वीकार किया जाता है। भारतीय समुद्र की पूजा करते हैं और इसके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। समुद्र मानव के लियेे भोजन का भी एक मुख्य स्रोत है पर मानव की अपूर्ण क्षुधा के कारण यह खाली होता जा रहा है। मानव मत्स्यबीजों के विकसित होने से पहले ही विशाल जालों को डालकर इन्हें अपनी क्षुधापूर्ति के लिये उपयोग करता है जिसके कारण समुद्र में नई मछलियां आ नहीं पाती हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मानव अपनी क्षुधा के कारण समुद्र को भी खाली कर डालेगा।आज जरूरत है कि हम समुद्र को वहीं सम्मान दे जो कि हम धरती को देते रहे हैं। समुद्र हमारे पर्यावरण तंत्र का अमूल्य और अचल स्तंभ है। यह पृथ्वी के पर्यावरण तंत्र को लगातार प्रभावित करता रहता है। हमें अनंत काल तक पृथ्वी और जीवन की सुरक्षा के लिये समुद्र की रक्षा करनी चाहिये ये हमारा दायित्व और आने वाले युगों के प्रति कर्तव्य है।

शुक्रवार, 15 मई 2020

कहानी एक मंगनी प्रसंग की

गांव की एक वीथिका में एक घर में कुछ उत्सव का माहौल था। सामने कुछ चमकीली पन्नियां धागों में लटककर हवा के थपेड़े खा-खाकर निढाल होकर शुन्य में लटकी थीं। घर के सामने अनगढ़ रंगोली डली थी।
हवा में सौंधी-सौंधी सी गंध थी, अजीब सा आलस्य पसरा था यहां। अम्मा चमकीली लाल साड़ी में सजी यहां-वहां घर और घर के सामने डोल रही थीं। उनको देखकर ऐसा लग रहा था मानों हिंडिंबा को किसी ने लाली चुनरी में लपेट दिया हो।
पता नहीं हो तो आपको बता दूं कि आज राधा यानी इस घर की एकलौती बेटी को देखने के लिये लड़के वाले आने वाले थे, बात थी कि इसी वक्त मंगनी भी हो सकती थी। घरद्वार सजा था। अम्मा इस ठीकरे से घर की व्यवस्था का ऐसे मुआयना कर रही थीं कि मानों शायद इतनी कवायद तो बाबा आदम की शादी में फरिश्तों ने भी नहीं की होगी।
घर में दो भाभियां थीं छुटकी घर के अंदर तो बड़की बाहर की व्यवस्था सम्हाल रही थीं। कुल जमा ग्यारह लोग आयेंगे। सबके कपड़े-लत्ते, मिलनी-मिलानी तैयार है कि नहीं।
लड़के को ग्यारह सौ रुपये, एक अंगूठी, बुशर्ट-पतलून और कोट का पैसा सिलाई के साथ, एक घड़ी अच्छी वाली देने की बात तय थी। मोटर सायकल तो शादी के समय देना है। बाकी लोगों को एक सौ एक रुपये, मिठाई का डब्बा, शर्ट-पतलून का कपड़ा, साड़ी औरतों के लिये साथ ही साथ मेवे और कुछ नमकीन के पाकट देने हैं।
अब देखें भावी दुल्हन की कहानी, वो कमरे में दब-छुपकर नेहा के नाम से अपने प्रियवर से बातें कर रही थी।
तुम तो अम्मा के आंचल से बंध जाओ बस.. तुम्हारी उस फटफटी को आग लगा दो जिस पर हमको घुमाया करते थे। हम यहां मंगनी करेंगे वहां तुम कुएं में डूब मरो।
अरे ऐसा न बोल, चल किसी बहाने से घर के पीछे बछिया के बाड़े के पास कच्ची सड़क पर आजा शाम सात बजे। तुझे लेकर शहर चले चलता हूं। जो डर न करे तो आजा- प्रियवर का जवाब था।
राधा ने यहां-वहां देखा- अच्छा हम आते हैं पर कपड़े..।
उसकी फिकर न कर..कर लेंगे जुगाड़, वहीं माता मंदिर में हो जाएगा चटमंगनी पट ब्याह- व्याकुल नायिका के लिये यह आश्वासन उस समय उपयुक्त था।
यहां आंगन में छुटकी की मदद कर रही थी पार्वती, पार्वती जिसका महेश पर दिल था, जिसकी मंगनी राधा से हो रही थी। पार्वती ने महेश को गांव की वसुधा की शादी में देखा था वहीं से दिल में उसकी लगन लग गई पर आज उसका दिल जार-जार हो रहा था। मन तो होता था कि फूट-फूट कर रोये। महेश भी उसे ब्याह में पूरे समय घूरता रहा था फिर गा रहा था- सेज सजा दे सजनी। वो इस बात पर शर्मायी भी थी।
छुटकी की धरम की बहन और इस परिवार की धरमबेटी थी पार्वती। गरीब जातभाई की इस बेटी का अब तक का आधा जीवन इस घर में परिवार सदस्यों के बीच ही बीता था वो उसे घर का सदस्य ही मानते थे। सांझ को वो घर लौट जाती थी पर आज काम ज्यादा था इसलिये सांझ पड़े मदद के लिये बुला लिया था। खैर, महेश का परिवार आने वाला था रात आठ बजे। थककर पार्वती उठी- जाती हूं जीजी। अच्छा जा पर जब मंगनी हो तो आना जरूर।-छुटकी ने आमंत्रण दिया। बिना पावक के जलती पार्वती को वो गीत याद आया- राजा की आयेगी बारात..। हम देखेंगे जीजी घर में काम न हुआ तो आयेंगे। पार्वती दिल की जलन छुपाती निकल गई।
यहां घर के भीतर भावी दुल्हन का एक-एक पल भारी बीतता था। दुल्हन सी सजी राधा ने घड़ी देखी और सात बजने में पांच कम थे तब बड़की को चकमा देकर वो भाग निकली। उसके प्रियवर मधुसूदन शर्मा वहां इंतजार कर ही रहे थे झट बैठाया फटफटी पर फट से फुर्र हो गये दोनों।
जब राधा न आई तो ढुंढाई मची। खेत पर खेल रही मौसी की नन्हीं पोती ने तुतलाते हुए बताया कि लाधा दीदी एक ललके के थात गाड़ी पल बैतकर भाल गई...
अब तो घर में हंगामा हो गया। साढ़े सात बज रहे थे। दोषारोपण में समय खराब करने से अच्छा था कि आपदा का समुचित प्रबंधन किया जाये। बड़के भैया ने तुरंत दिमाग लगाया। चाचा की बेटी कौशल्या को बुला लाओ बोल देना कि हम लगन करवा रहे हैं महेश के साथ। चाचा की हालत पतली है सो वो मना न करेंगे। सांप भी मर जायेगा घर की इज्जत भी न जायेगी। महेश को हम समझा लेंगे कि राधा न सही कौशल्या से ही कर लो ब्याह। मोटर सायकल के साथ 11 तोला सोना दे देंगे।
दोनों भाभियां तनती रह गईं।
चाचा घर पर नहीं थे। बात सुनकर चाची ने कौशल्या को छुट्टन के साथ भेज दिया। इसकी मंगनी करवा दो शादी भी करवा देना- चाची बोली।
वैसे भी भरीपूरी लौंडिया भाग गई है इज्जत बचाने के लिये हमारी लड़की का ब्याह तो करवाना ही पड़ेगा- उन्होंने सोचा। आज मौका पडऩे पर पुरानी शत्रुता की गांठ ढीली पड़ गई थी। जिसका चाची पूरा लाभ लेना चाहती थी। कौशल्या को ले आये। पौने आठ हो रहा था जल्दी-जल्दी उसे सजाया। भाभियों ने बाल सुलझाये जो महीनों से उलझे थे जुएं-लीखें भी निकालीं। वो नहायी भी न थी सो उसे पाउडर और खुश्बू से नहला दिया। क्रीम की परत पर परत चढ़ा दी।
बड़के दरवाजे से भीतर आये- कुसल्या को सजाया कि नहीं वो आते ही होंगे।
इतने में चाचा वहां आ धमके वो सीधे ठेके से ही निकल आये थे। घर पर जैसे ही पता चला कि कौशल्या को ले गये हैं तो वो नशें में वहां आ पहुंचे।
बड़के, हमारी बेटी हमारी बेटी है हम ही उसे ब्याहेंगे। भले ही दूल्हा निपट कंजरा ही हो। तुमने हिम्मत कैसे की हमारे घर आने की?- चाचा गुस्से में था।
बड़के ने बात सम्हाली- चाचा अभी घर जाओ। कौशल्या जैसे तुम्हारी बेटी वैसे ही हमारी बेटी। पुरानी बातें भूल जाओ।
अबे गधेड़े जो पुरानी बात भूले वो कुकर का मूत, कौशल्या हमारी बेटी है, उसे हम ही ब्याहेंगे, उसे वापस भेज -चाचा मानने को तैयार न था।
बड़के का मन हुआ कि पहले की तरह एक बार फिर से उसकी टांग तोड़ दें पर आज मामला नर्म था।
चल बेटी-चाचा कमरे में अंदर घुसने लगा। सबने सम्हाला पर वो न माना। जब ये नौटंकी चल रही थी पार्वती वहां आई। वो छुटकी से सिलाई-कढ़ाई सीख रही थी। उसी मामले में कुछ पूछने आई थी। उसने देखा चाचा कौशल्या को खींच कर ले गया। उसने पूछा तो किसी को न बताने की कसम देकर छुटकी ने सारी बात बतायी।
पार्वती बोली- जीजी, घर वालों का न बताओ तो बताऊं।
बोल परवा- छुटकी बोली। परवा पार्वती का घरु नाम था।
जीजी, मां से कहो, उनको मना लो तो हम महेश संग..-पार्वती की आधी बात सुनते ही छुटकी का मन शांत हुआ पूरी की बात ही छोड़ दो।
अरे छोड़ो शराबी को, पार्वती के घर जाओ और बोल दो कि हम पार्वती का लगन करवा रहे हैं। हमारी तो धरम बहन है ये-छुटकी की बात सुन छुट्टन पार्वती के घर की ओर दौड़ गये।
चल, परवा..छुटकी उसे कमरे में ले गई।
आठ पांच हो रहे थे। सभी घबराये हुए थे। न जाने कब महेश आ धमके।
कुछ देर बाद छुट्टन आये, वो शांत थे, पार्वती की अम्मा गौरी ने कहा है कि जैसे हमारी बेटी वैसे तुम्हारी...। बस बात पक्की करने से पहले इनको (पार्वती के पिताजी) लड़के वालों से जरूर मिलवा देना। आखरी फैसला तो इनका ही होगा।
अब कुछ राहत थी। पार्वती के बाबूजी को मनाना आसान ही था। गरीब वो थे ही और यदि शादी का खर्च उनकी जेब से न जाये तो पार्वती की खुशी में वो अपनी खुशी ही देखते थे। वैसे भी पार्वती उनकी भी धरमबेटी थी। उसने अब तक का आधा जीवन उनके साथ ही बिताया था। बस बात थी तो महेश को मनाने की। रात साढ़े आठ बजे महेश पधारे। साथ में पिता, मां और कुछ बंधु-बांधव थे।
घर में सबने तय किया था कि पहले महेश और पार्वती एक-दूसरे को देख लें फिर वो मान-मनौव्वत करेंगे। पार्वती को छुटकी लेकर आईं तो महेश चौंक गया। ये तो वो न थी जिसकी तस्वीर भेजी गई थी। बड़के बोले- वो क्या है कि आप क्षमा करें। राधा का दाखिला शहर के बड़े कॉलेज में हो गया है आज दोपहर को ही खबर मिली। वो पढऩे को अड़ गई और शहर निकल गई। अपनी बात रखनी थी इसलिये हम चाहते हैं कि आप छुटकी की धरम बहन और हमारी धरमबेटी पार्वती को हमारी बेटी राधा की तरह ही मान दें।
बड़के सोच रहे थे कि अगर बात न बनी तो पर महेश के बाबूजी तो खुद उसकी अम्मा को भगाकर लाये थे। उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? महेश के बड़के भैया के तो घर के सामने झाड़ू बुहारती मेतरानी से ही नैना चार हो गये थे। वो उसे ही ब्याह लाये..वो कुछ बोलेंगे या नहीं...। कुछ क्षणों के मौन के बाद महेश के बाबूजी बोले-भई, ब्याह तो महेश को करना है वो जाने..
महेश तो बाबूजी की इस बात का इंतजार ही कर रहे थे। पर वो जानते थे कि बात टाली तो मुसीबत हो सकती है, उनका बस चलता तो वो आज ही पार्वती को ब्याहकर ले जाते, सीधे-सीधे बोलना भी ठीक नहीं है। उसने बात बड़के भैया पर डालते हुए कहा- भैया जो बोलें।
आपको बता दें कि छुटकी भौजी महेश के बड़के भैया की किसी समय में प्रेमिका रही थीं ये और बात है कि बड़के का चंचल मन मेतरानी पर स्थिर हुआ और वो उसे ब्याह लाये पर प्रेम तो प्रेम है नयन से नयन में ही सारी बातें कर लेता है। महेश भी इस बात को जानता था और उसे यकीन था कि भैया हां ही करेंगे। छुटकी की नाराजगी दूर करने और पुराने प्रेम को जगाने का यह भला मौका जान पड़ा महेश के बड़के भैया को वो बोले- आप हमारे परिचित हैं खानदानी हैं इसलिये आपकी धरम बेटी हमारे घर की बेटी। हमारी ओर से तो बात पक्की आगे आप जो जानें.. पार्वती की जान जो सांसत में थी वो खिल गई।
तो भई देर किस बात की..आवाज उठी। अरे, जाकर पार्वती के बाबूजी और अम्मा को भी बुला लाओ। वो आये और इसके साथ ही रस्म अदायगी होने लगी।

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

साढ़े तीन कुआरियां

कमरे में हलकी रोशनी थी, एक मोमबत्ती जल रही थी। जया, विजया, चैताली इस अलसाये माहौल में बैठी एक दूसरे का मुंह ताक रही थीं। चैताली की गोद में एक छोटा चौरस तकिया था जिसे वो कभी गोद में दबाती कभी छाती से लगाती।
जया जो इन दोनों में बड़ी थी अपने भारी सांवले चेहरे और कुछ थुलथुले बदन के कारण अलग ही नजर आ रही थी।
दीदी, आई की नहीं- चैताली की आवाज उठी।
आती होंगी-विजया ने आश्वासन दिया।
जया ने पीछे दरवाजे की ओर देखा।
दीदी... जया की भारी आवाज उस घुटन में घुट गई।
दीदी अंदर आई तो शांत माहौल में हलचल हुई। गर्मी की चढ़ी दोपहर ऊंघने का सबसे उपयुक्त समय होता है। तीनों अलसायी हुई थीं। तभी दीदी की आवाज आई- अम्मा की चिट्ठी आई है।
अम्मा की चिट्ठी- जया की आंखों के सामने जीवंत हो उठा एक दृश्यक्रम। अम्मा का भारी चेहरा, माथे पर बड़ा भारी बिंदा, फूले हुए होंठ। भारी हाथ उससे भी भारी आवाज-जया...ओ जया...भईया का बैग कहां है? वहीं होगा सोफे पर- जया की आवाज होती। अरे जरा आकर बता दे...उफ्फओ अम्मा...भाभी को बोल दो न..अरे वो रसोई में भात पका रही है...जरा देख दे न..आई मां- जया बालकनी से पाव पटकती भीतर आती। धम..धम, इस बीच उसके बड़े भारी पैरों में पड़ी मोटी पायजेब भी बज उठती।
भाभी के पीछे अम्मा कहती- तुझे काम के लिये बोलना पड़ता है वर्ना भाभी क्या समझेगी कि ननद तो मजा करे हम सजा भरें।
जया काली थी पर न जाने क्या गजब का आकर्षण था उसके अंदर। गली के लड़के उसे इस तरह घूरते कि पास पड़ोस की गोरी कन्याएं जलकर भस्म हो जाएं। जो लड़का उसे देखता उससे पहली ही बार में शादी करने को आतुर हो जाता पर जब कुछ समय बीतता, सारे मामले उठ खड़े होते। लड़की काली है, नौकरी नहीं करती, दान-दहेज क्या देंगे? लड़के वाले मुंह से थोड़े ही न मांगेंगे। लड़के को काया चाहिये, बाकी बातें वो न विचारेगा उसकी चिंता तो परिवार को ही करनी होगी न। लड़की एक अदद बदन है लड़के के लिये।
जया बनती-संवरती मुस्काती, किसी अंजान पर जाने-पहचाने स्पर्श का अनुभव कर लज्जातुर होती, यौवन मदमाता पर धीरे-धीरे समय बदला। लड़के के परिवार आते रहे जाते रहे। कोई कुछ बोले न बोले पर मां के चेहरे पर चिंता की लकीरें हर बार और से और स्पष्ट होती गईं। अब जया चोटी भी गूंथती तो भाभी मुस्की मारतीं- लो हो गईं अप्सरा तैयार, हाय री आज न जाने कौन मरेगा? भैया देखते और निकल लेते-इनका तो बस यही काम है। कुछ लड़के वाले हां करते तो मामले यह निकलते-कोई तलाकशुदा, कोई दुहेजु, कोई परित्यक्त, कोई विकलांग, कोई विधुर तो किसी की लुगाई भाग निकली, लोग मजाक करते ये तो मर्द ही नहीं था बेचारा। कोई-कोई तो कारण ही न बताते- न जाने क्या बात है कहीं कोई बीमारी तो नहीं है?
मनीराम नाम के आदमी का तो किस्सा ही अनोखा निकला। ताई जी ने बताया- अरे ये तो नामर्द था, पहली तीन बीवियां वंशवृद्धि के लिये कभी तो देवर कभी जीजा के हवाले हुईं तीसरी पर तो इसके बाउजी ही पिल पड़े। तीनों भाग निकलीं। अखबार में भी तो मामला आया था। बड़ी मुश्किल से इसके परिवार ने पिंड छुड़ाया। अम्मा ने उससे हाथ जोड़ लिये पर अब अम्मा बोली- बेटी, नखरा न करना जो मिले उससे ब्याह ले। जया ने भी कह डाला- कुएं में ढकेल दो पर एैरे-गैरे से हम न ब्याह करेंगे।
भैया कहते- ताई तो घर में आग ही लगाना चाहती है। आप और उनकी बात को तवज्जो देते हो, ऐसे ही रहा तो ये रहेगी कुंआरी। लापरवाही और कुछ गुस्से में जया कहती- रहेंगे तो हम न कुंआरे तुमको क्या? भाभी धीरे से कहतीं- कुंआरी का लाढ़ कौन रखेगा? अम्मा जानती थीं उनके बाद जया का निबाह कैसे होगा? ऐसे में जब दीदी के गृह उद्योग और रहने के ठिकाने का पता चलने पर अम्मा ने जया को समझा-बुझाकर यहां दूसरे शहर भेज दिया। अब वो कुछ निश्चिंत थीं कि अगर वो ऊपर-नीचे होती हैं तो भी जया को दीदी का तो सहारा है ही न। थोड़ी-बहुत जो सिलाई-कढ़ाई जया ने सीखी थी वो यहां काम आई। अम्मा ने कहा था कि अब चिट्ठी तभी लिखेंगे जब बारात द्वार पर होगी। यहां रहते-रहते सबसे इतना अपनत्व हो गया था कि शादी की बात दुख ही देती।
कहानी वर्तमान में आई। चिट्ठी सबके लिये आई है- दीदी बोली। सबके लिये चिट्ठी- विजया के मन में तडि़तपात सा हुआ। अब वो अपने विचार क्रम से प्रत्यक्ष हुई।
विजया कॉलेज के होस्टल में रहकर होमसाइंस की पढ़ाई कर रही थी। वहां अन्य मित्रों के साथ उसकी भी चिट्ठी यूं ही आती थी पर चिट्ठी मां नहीं भाभी लिखती थी। भाभी सरकारी स्कूल में मास्टरनी थीं। भाई जब रोमांटिक होते तो उनसे कहते- हमें भी कुछ सिखाओ न, आज क्या सिखाओंगी वगैरह-वगैरह जिस पर भाभी का प्रतिउत्तर ऐसा ही बेमजा होता था जैसे जैन कुल्फी भंडार की ठंडी कुल्फी जिसमें दूध से ज्यादा पानी का स्वाद होता था। खैर , अम्मा थी काला अक्षर काजल टीकी बराबर इसलिये जो बात होती वो भाभी को बोल देती और वो उसे लिख देतीं जिसे वो समझकर कर पढ़ लेती। भाभी की हिंदी कमजोर थी न वो अंग्रेजी की अध्यापिका जो थीं। इसलिये उसे समझकर पढऩा होता था। ये कौन कहे कि वो जुगाड़ से लगी थीं, उनको कुछ न आता था पर अपने मटके को कौन कुम्हार फूटा कहता है।
एक दिन अम्मा ने लिखवाया कि श्रीवत्स जी के अग्रपुत्र शतांशु की मां ने सत्संग में पूछा है कि तुम्हारी पढ़ाई कहां तक पूरी हुई है? अब कितनी पढ़ाई बाकी है? एक अच्छी सी फोटो खिंचवाकर भेज दो न।
विजया की सखियों ने जब ये पोस्टकार्ड पढ़ा तो हंस-हंस कर पेट पकड़कर बैठ गईं। विजया ने कह रखा था कि ऐसी बातें हों तो इन्लेंड लेटर भेजा करो।
खैर, विजया खुद ही घर जा पहुंची। शतांशु पूरे परिवार सहित उसके घर आया। आज तो भाभी ने खुद विजया को सजाया। हाथों में मेहंदी, पैरों में आलता, बालों में गजरा मानों आज उसकी शादी ही हो। अरे आज मेरी शादी थोड़े ही है- विजया खिलखिलायी। हमारी बेटी है, सजेगी-संवरेगी नहीं तो बात ही क्या? तू तो बिना सिंगार के भी पार्वती सी सुंदर है-भाभी का जवाब था। फिर वो खुद ही बोलतीं- काजल लगा ले नहीं मेरी ही नजर न लग जाये।
सभी को पूरा विश्वास था कि शतांशु से ही विजया का विवाह होगा। शतांशु विजया को देखकर ही हां बोल गया पर होना कुछ और ही था। शादी की बात हुई ही थी कि अगले दिन से शतांशुु उनके घर आने लगा। विजया ने एक दो दिन तो हलके में लिया इसके बाद वो होस्टल जा पहुंची शतांशु वहां भी जा पहुंचा। विजया इस विश्वास के साथ शतांशु से प्रेम करने लगी कि यही उसका भावी वर है। वो उसके साथ घूमने चली जाती। प्रेम की सीमाओं के अंत पर हर तरह की दूरियां कम होने की स्थिति हो गई। यहां उसके परिवार वालों ने कुछ नगद और समान सहित गाड़ी की बात संकेतों में ही उन लोगों तक पहुंचा दी।
भाभी ने कुछ नहीं लिखा पर उसकी दोस्त जो वहीं रहती थी ने उसे यह सब बताया चूंकी उसकी मां भी सत्संग में उनके पास ही बैठती थी। यह जानकर विजया ने शतांशु से कहा कि अगर मुझ से प्यार करते हो तो दहेज क्यों? शतांशु ने आश्वासन तो खूब दिये पर मामला अटकता गया आखिर में विजया ने हिम्मत दिखाई और शतांशु से सीधे बात की तो वो अप्रत्यक्ष रूप से धमकी के लहेजे में बात करने लगा अब विजया ने उसे गार्ड के सामने थप्पड़ रसीद कर डाला। देख लूंगा-उसने धमकी दी फिर वो चलता बना।
विजया ने इस मामले को तवज्जो नहीं दी पर दूसरे दिन भईया का फोन आया। उन्होंने कहा कि शतांशु से माफी मांगो। विजया ने भी कह डाला कि उस गधे से माफी की बात क्या वो तो उसे चप्पल तक मारने के लायक नहीं समझती। फिर मुंह न दिखाना- भईया नाराज हो गये। विजया ने भी कह डाला अब उस घर का मुंह देखूं तो कोढ़ लग जाये।
विजया कुछ चिंतित होस्टल में बैठी ही थी कि उसकी दोस्त संतोषी वहां आई और उससे कहा कि उसकी एक दीदी को एक सहायक की जरूरत है। दीदी का घरेलू उद्योग है, कुछ ही महिलाएं और लड़कियां उनके साथ जुड़ी हैं। उनके घर में मुफ्त रहने का इंतजाम है, खाना भी मुफ्त ही समझो तनख्वाह ठीक-ठीक और समय पर मिलेगी। संतोषी जानती थी कि अब विजया का विवाह मजाक बनने वाला है।
विजया दीदी से मिली और नौकरी पक्की होने पर भाभी को फोन लगाकर बता दिया। तब से वो यहीं है। वर्ना उसकी शर्म उसे डुबो ही देती। प्रेम की पराकाष्ठा और फिर एक छल से विजया का मन द्रवित हो गया था। शादी को लेकर अब उसके मन में कोई विशेष तरंग न थी। भाभी ने लिखा था कि इन्लेंड लेटर तभी लिखेंगे जब शादी की बात होगी। वर्ना पोस्टकार्ड ही मुफीद होगा। अगर पोस्टकार्ड पर शादी की बात लिखी तो चिट्ठी मानो सबके लिये हो जायेगी...सबके लिये, एक मजाक। विजया के मन में बात खटकी कि अगर शादी की बात फिर सामने आ गई तो...वो दीदी का साथ छोडऩा चाहती ही नहीं थी।
भई, सबसे खास तो चैताली की चिट्ठी लगती है- दीदी बोली। सबसे खास चिट्ठी- चैताली की आंखों में घर का दृश्य घूम गया। उसे चिट्ठी लिखने वाली थी उसकी बड़ी बहन भद्रिका जिसने खुद शादी नहीं की थी उसका एक एनजीओ था। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। बहन ने उसे पाला-पोसा था, एक बार उनकी शादी का प्रकरण भी उठा था पर बात बन नहीं पाई। भद्रिका का क्रांतिकारी व्यवहार बहुधा उनके रिश्ते में बाधक बन जाता था। चालीस पार की इस महिला से शादी करने की बात सोचने वाला सबसे पहले यह सोचता था कि उनसे निभेगी कैसे? एक बार एक चैताली को खान नेताजी के भतीजे ने छेड़ दिया तो भद्रिका उसके पक्ष को लेकर पुलिस स्टेशन गईं पर जब बात न बनी तो उन्होंने ब्रम्हास्त्र का संधान कर डाला। ब्रम्हकुमार भट्ट नेता थे और एनजीओ के चक्कर में भद्रिका से दोचार होते रहते थे। उन्होंने भद्रिका के फोन करने पर पुलिस को लताड़ा और अपने खास गुंडों को भेजकर भतीजे को धमकाया। भतीजा शहर छोड़कर भाग गया।
चैताली भद्रिका के त्याग को समझती थी इसलिये उसने मर्यादा को कभी लांघा नहीं। दोस्ती रखी तो सिर्फ लड़कियों से लड़कों से उसका व्यवहार दूर से ही था। हालांकि उसके ही भीतर कहीं एक व्यक्तित्व था जो उससे विपरीत था पर वो उसकी बातों पर ध्यान न देती थी।
भद्रिका कहती- चैताली जब तेरे लायक लड़का मिल जायेगा तो उसका पूरा बायोडाटा चिट्ठी में लिख भेजूंगी। वो तेरे लिये सबसे खास चिट्ठी होगी। जब भद्रिका को लगा कि वो काम में ज्यादा मसरूफ होने वाली है तो उसने चैताली को दीदी के पास भेज दिया। भद्रिका के एनजीओ से सालों पहले दीदी के गृहउद्योग का पाला पड़ा था तब दोनों में दोस्ती हो गई थी जिसके परिणामस्वरूप अब वो दीदी के साथ थी। चैताली का मन भी यहां से जाने या शादी करने को था ही नहीं।
अब तीनों वर्तमान में थीं। हमारी छोडिय़े दीदी अपनी कहिये। अपनी कहिये- दीदी के कानों में बात गूंज उठी। दीदी जिनका नाम था विभाषा। दीदी की शादी सालों पहले हो चुकी थी। पति का नाम था देवकुमार। पर इनकी कथा भी विचित्र सी थी। शादी के बाद जब वो माता पूजन के लिये जा रही थीं तभी पूरे परिवार के सामने एक महिला प्रकट हो गई। उसने फोटो के साथ बताया कि वो देवकुमार की अनब्याही पत्नी है। दोनों परिवार के लोगों ने उसे डांट-धमका कर भगा दिया। वो पुलिस लेकर आ गई। हंगामा हो रहा था कुछ रिश्तेदार छुपकर मुस्कुरा रहे थे तो कुछ हंस रहे थे। बस, दीदी इस माहौल से निकलकर बाहर आ गई। वो अपनी एक टीचर के घर जा पहुंची। टीचर का दुनिया में कोई नहीं था। दीदी वहीं रही- माता-पिता, रिश्तेदार आये बहुत समझाया पर दीदी वापस नहीं गई। टीचर के घर से ही गृहउद्योग की नींव पड़ी। दीदी सबकी बात सुनती पर जब कोई त्रस्त कहता हम तो जगत-जमाने के मारे हैं हमारी छोडिय़े अपनी कहिये तो दीदी मुस्का देती। अम्मा ने कहा था- हम दिल के मरीज हैं अगर चिट्ठी लिखकर लड़का बताएं तो शादी कर ही डालना..वर्ना हम तो..दीदी का डर तीनों से अलग न था। अब तीनों ने अपनी-अपनी चिट्ठी पढ़ी।
जया ने सबसे पहले चिट्ठी पढ़ी और मुस्कायी।
अरे क्या हुआ?
जरा हमें भी तो बताओ।
सारा मजा खुद ही मार लोगी क्या?
जया बोल पड़ी- अम्मा ने लिखा है, अपनी शादी तो तुम खुद ही जानों जो तुम्हे भाये या दीदी बताये उससे कर लो शादी, यहां तो हमारी नजर में अब कोई नहीं है। वाह, अब हम तो दीदी के साथ ही रहेंगे। पर दीदी ही ब्याह गईं तो? चैताली के सवाल पर तीनों असहज हो गईं।
अब विजया ने अपनी चिट्ठी खोली, पढ़ा फिर खिलखिलाकर हंसी।
इस हसीं का मायना क्या?
अरे, ये तो शादी की बात सुन बावली हो गई।
अरे जरा हमें भी तो कहो विजया दीदी।
हंसी को कुछ पल रोककर विजया बोली- अरे वो श्रीमान शतांशु को सजा हो गई, दहेज मांग रहे थे। भाभी ने लिखा है कि भईया तो कान के कच्चे थे जो कह दिया माफी मांग। तू सयानी है, सांवली सालोनी है सुंदर भी है तुझे तो कोई पोपटलाल ही न करेगा। अपने विवाह का तू स्वयं ही निर्णय ले और जब लड़का फाइनल कर ले तो यहां बता देना। फेरे की रस्म तो यही होगी न। इनके बाद चैताली ने उत्साह से चिट्ठी खोली, फिर मुस्काकर उत्साह से बोली- अरे कोई मुझे चिमटी खोड़ो.. क्या हो गया छुटकी?
जरूर शादी पक्की हो गई..वो भी धनपति से
धन..धना..धन..धनपति
अरे, ये बात नहीं है..भद्रिका दीदी शादी कर रही हैं।
वाह..
वाह...
हें...
अरे सुनो तो सही लिखा है, चैताली अब तू सयानी हो गई है शोडषी नहीं रही..तेरे प्रति मेरे बहुत कुछ कर्तव्य का निर्वाह हो चुका है..मैं अब अपने जीवन को कुछ सजाना चाहती हूं। अरे आगे बोल न।
शादी लगी भी तो लगी किससे?
किससे?
अरे वहीं भट्टजी से!
तीनों उत्सुक थीं।
आगे लिखा है- भट्ट जी के विचार और मेरे विचारों में काफी समानता है। हम काफी समय से साथ हैं। अब इस साथ को एक रिश्ते का नाम देना चाहते हैं अगर तू चाहे तो। अरे मेरा तो पूरा सपोर्ट है कर डालो शादी। तो कब चलें दावत खाने।
लो मैं तो लगे हाथ वाट्सअप कर देती हूं कि अभी कि अभी कर लो शादी।
ये हुई न बात..
अब तीनों ने खुशी-खुशी दीदी का मुंह देखा। चैताली ने फोन में कुछ टटोला। कुछ किया कि नहीं पता नहीं।
दीदी ने खत पढ़ा और उदास हो गईं।
क्या हुआ?
कहो न?
शादी की बात हो गई क्या?
तीनों के भय और उदासी को देख दीदी हंसी।
अच्छा तो हमारा मजा ले रही थीं।
ये क्या हो रहा है हूं...
ये तो गलत है दीदी
अब दीदी माहौल में हलचल पैदा करतेे हुए बोली- अरे, अम्मा के पास कुछ जमा पूंजी है उन्होंने लिखा है शादी के लिये रखी थी, तो शादी तुम जब करो तब करो ये पैसे आकर ले जाओ। अब तीनों निश्चिंत हो गईं।
खत एक ओर फेेंके। जया और विजया ने दीदी के कंधे पर सर रख लिया। चैताली दीदी की गोद में सिमट गई और दीदी ने आंखें बंद कर लीं। तीनों ऊंघने लगीं।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

बेसहारा.....

ईसा से 3000 साल पहले मिश्र की एक अनोखी कहानी। इस कहानी से पता चलता है कि मिश्र की सभ्यता और संस्कृति उस समय कैसी थी और लोगों का जीवन और उनके आचार-विचार कैसे थे।
जोराह और अरफा दोनों जुड़वां भाई मिश्र के एक उपनगर में रहते थे। मां थी मरियम पिता था जुराज जो मिश्र की सेना में सिपाही था युद्ध के दौरान मर चुका था। मरियम का प्रेम जुराज के छोटे भाई से था जिसका नाम था इकरा। इकरा एक नजूमी-ए-ख्वाब, स्वप्र ज्योतिष था। उसने मरियम को बता दिया था कि जुराज मारा जाएगा। जूराज का व्यवहार मरियम के लिए वाहियात था और वो उसे प्रताडि़त ही करता था। ऐसे में जब वो लड़ाई पर जाता था इकरा उसे प्यार देता और उसके जख्मों पर मल्हम लगाता। नगर के राजपर्व होने पर वो मरियम को लबादा ओढ़ाकर गधे पर बिठाकर यहां वहां घुमाता। मरियम का मासूम चेहरा गहरी आंखे। इस पर तीनों जहां और फेरोस की सारी दौलते भी कुर्बान हों। 11 आत्माएं (मिश्र के लोगों का मानना था कि इंसान के जिस्म में 11 आत्माएं होती हैं।) उसके एक बोसे से तृप्त हो जाएं और मन चाहा वर दें या फिनिक्स का तोहफा अदा कर दिया जाए तो भी मरियम को कोई समझदार इंसान नहीं छोडऩा चाहेगा।
मरियम का विवाह जूराज के साथ होना भी एक अजब संयोग था। मरियम को पैदा होते ही उसके माता-पिता ने बेटा होने की आस में उसे देवी नौहीद के मंदिर के पुरोहित को सौंप दिया। पुरोहित ने उसे पाला-पोसा। जूराज ने युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाया था। इस पर पुरोहित ने उसका विवाह मरियम से करवा दिया या कहें तो उसे पुरस्कार के रूप में दे दिया। जूराज उसे पवित्र नहीं मानता था खैर, जूराज के मरने के बाद मरियम के पास एक ही रास्ता था कि वो नगर के हरम में चली जाए। वैसे भी ज्यादातर बेसहारा और खूबसूरत औरतों का यही ठिकाना था। देश-विदेश के लोगों का यहां आने का यह एक मुख्य कारण था। (मिश्र को विश्व की सबसे खूबसूरत वेश्याओं का नगर माना जाता था। यहां आने वाला हर एक शख्स उनके हरम में एक न एक बार जरूर जाता था। माना जाता था कि वहां की वेश्याएं संतुष्टि देने में सबसे अच्छी मानी जाती थीं। कुछ लोग तो यहां की यात्रा ही इसी कारण से करते थे जिनमें विश्वभर के अमीर लोग शामिल थे।) पर मरियम को मिला इकरा का साथ। इकरा और मरियम के रिश्ते को पाकिजदगी की वो हद मिली थी जहां जिस्म सीफर हो जाता है।
इन दिनों मरियम एक स्वप्र को लेकर परेशान थी। उसने देखा था कि फिनिक्स नील नदी पर उड़ रही है। उसके पंजों में फेरॉस और अन्न और रसों के थैले थे। इकरा ने जब यह सुना तो चिंतित हो गया। मिस्र को अपना दूध पिलाने वाली नाइल (नील नदी) अपना रास्ता बदलने वाली है। पूरा शहर उसकी धारा की ओर ही जाएगा। शहर कब्रगाह सा हो जाएगा। फेरॉस एक षड्यंत्र का शिकार होगा और कयामत आएगी। यह था इस स्वप्र का फल। पर जोराह और अरफा इस बात से खुश थे कि नगर में उत्सव होने वाला था। फेरॉस को बेटा हुआ था। नगर में उत्सव का माहौल था। जोराह और अरफा को इस बात का इल्म जरा भी नहीं था कि ये जश्र कयामत का जश्र होगा। नगर में नंदी निकलेंगे धूम मचेगी। मामथ (बालों वाला झबरा हाथी जो अब विलुप्त हो चुका है।) की खाल ओढ़कर नाच भी होगा।
फेरॉस महल के ऊंचे हिस्से बच्चे को लोगों को दिखाएगा। कीमती पत्थर और मुद्राओं की बारिश होगी। पर मरियम ने उनको पहले की कह दिया था कि नगर से बाहर न जाएं खासकर वहां जहां संगतराशी हो रही थी पिरामिडों के लिए वर्ना पता चलेगा कि उनको भी गुलाम बनाकर संगकारी में लगा देंगे। उन दोनों ने कहा कि वो वहां नहीं जाएंगे पर जब पिरामिड बनेगा वो उसे देखने जरूर जाएंगे पर वो दिन कभी नहीं आने वाला था। निश्चित दिन से एक रात पहले अचानक शहर में कोहराम मच गया। सड़कों पर घोड़े दौडऩे लगे और लोगों को पता चला कि हब्शी सेनापति हेथाडॉरस ने फेरॉस की हत्या कर दी है। राजरानी और उनका शिशु अब उसके कब्जे में हैं। अब से हेथाडॉरस ने लोगों को कहा कि वो राजधानी बदले वाला है। समुद्र की मां नील नदी मार्ग बदल रही है। फेरॉस की पत्नी अब हेथाडॉरस की हयात में शरीक थी। वो अब उससे उम्मीद से थी। एक यंत्रवत सी उसकी अपनी कोई हस्ती ही नहीं थी।
भयभीत लोगों ने शहर छोडऩा शुरू कर दिया। मरियम ने भी शहर छोड़कर नील की नई धाराओं की ओर जाने का फैसला लिया। इकरा ने मरियम को कहा कि वो नहीं जाए क्योंकि तीन दिन और तीन रात की कयामत होगी। पर वो नहीं मानी और निकल गई। उसने वादा किया कि वो व्यापारी की पत्नी अलम्मा की कनीज बनकर बगदाद जा रही है और वो उसे वहां जरूर मिलेगी। अगर वो आता है तो। उसकी इल्तेजा थी कि वो भी साथ चले। वहां उसका काम भी अच्छा चलेगा। पर इकरा नहीं गया। कारवां निकल गया पर बीच रास्ते में पर्शियन हमलावरों ने इन पर धावा बोल दिया। जोराह और अरफा भगदड़ में फंस गए अफरा तो किसी तरह उसे मिल गया पर जोराह नहीं मिला। मरियम अरफा को लेकर छिप गई। हमलावरों ने लोगों को गुलाम मनाया और सामान लेकर भाग निकले। इसके बाद रेगिस्तान की रेत में तेज बवंडर उठा और तीन दिन तक मरियम लाशों के बीच जोराह को ढूंढती रही। जोराह नहीं मिला वो गुलाम बनाकर ले जाया जा चुका था। आखिर में वो अरफा को लेकर लौट आई। इकरा मरने की कगार पर था। उसे खांसी चल रही थी। मरियम वहां पहुंची तब तक उसके हाथ में भूख-प्यास से मर चुके अरफा का मृत देह था। इकरा ने उसे देखा और आखरी मुस्कान के साथ बोला- काश तुम्हारे लबों पर लुकमान का लेह होता। शहर में वीराना था और हरम की लौंडिया भी नई धाराओं की ओर जा रही थी। मरियम ने इकरा की मृत देह को देखा और फिर अकेली निकल पड़ी। वो कहां गई किसी को पता नहीं चला बस रह गई उसकी खुशियों की कब्र और आंसुओं का मातम।

सोमवार, 30 मार्च 2020

किसी और की इज्जत

सिपाहीराम अपनी पत्नी मंदा को लेकर को लेकर गलियों में फिर रहा था। शाम का धुंधलका पडऩे में कुछ ही समय बचा था। कहीं से कोई टांगा या बैलगाड़ी मिल जाये तो स्टेशन तक पहुंच जाये और फिर वहां से शहर निकल जायें पर ऐसा कहां होना था? वो बदहवास जा ही रहा था उसके पीछे उसके दूधमुंहे बच्चे को गोद में दबायें उसकी महरू यानी पत्नी मंदा। तभी उसे घर के सामने से जाते देखकर बड़े घर के दरवाजे पर खड़ा ठाकुर का नौकर दत्तू चिल्लाया- अरे आज गाड़ी न मिली हो, तीज है आज रात गुजारने को अंदर आ जा महरू को भी ले आ। मंदा अंदर जाना न चाहती थी पर सिपाहीराम अंदर जा घुसा। उसने भी सोचा गाड़ी न मिली तो कहां रात का निर्वाह होगा? अंदर ठाकुर बैठा था आंच पर मुर्गा था और शराब की दावत होने वाली थी। ठाकुर के घर की औरतें रतजगे को देस की सारी औरतों के साथ माता मंदिर पर थीं। ठाकुर का नौकर दत्तू यूं तो सिपाहीराम को रोकता नहीं पर मंदा को देखकर उसका मन डोल गया। ठाकुर कहता था- शराबियों के तीन बाब- एक भी न हो तो मजा खराब-सुन रे मनवा कर रख याद-शराब-कबाब और मस्त शबाब।
सुसराल जाती मंदा रीत के मुताबिक सोलह श्रृंगारों से सजी थी। खूबसूरत तो वो गजब की थी ही उस पर ये नखरा। ठाकुर खुश हो जायेगा।
दोनों अंदर पहुंचे। मंदा ठाकुर से पर्दा कर रही थी। कोन है रे तू। यहां से दसवीं गली में जो रूपवती काकी है न मैं उनका जमाई सिपाहीराम और ये...
पता है..पता है- उसने हुक्का गुडग़ुड़ाया। आज तो तीज थी फिर क्यों ले जा रहा है? मंदिर पर रतजगा था वहां ना भेजा। सासुरी ने कहा नहीं आज त्यौहार है नहीं जाना है। रात रुक जाता कल चला जाता।
जो बात तो सही ठाकुर सा. पन मेरी चाकरी की खातिर जाना जरूरी है।
के काम करता है तू?
हुकम, सहर के चिट्ठीखाने में डाकिया हूं।
तो तू तो वही रहा डाकिया डाक लाया..डाकिया डाक लाया- वो हंसा।
हां, हुकम..
और तेरी घरवाली..क्या नाम?
मंदाकिनी- दत्तू के मुंह से एकदम से निकला। इससे सिपाहीराम असहज हो गया। ठाकुर ने दत्तू को घूरा।
मंदा...मंदावती- ठाकुर बोला, हमारे बाड़े में जब भी भजन होता अम्मा मंदा को बुलातीं और ये राधा-किशन के रास में राधा बनकर नाचती थी और किशन बनती थी वो..
रसीली- दत्तू के मुंह से फिर निकला। सिपाहीराम फिर असहज हो गया। ठाकुर ने फिर से दत्तू को घूरा।
रसाल, अब तो वो हमारे चचेरे भाई की ब्याहता है और बाड़े के पीछे के मकान में रहती है। मंदा मिली के नहीं उससे- ठाकुर का सवाल था जिसके जवाब में मंदा सिर हिलाकर हलके से बोली- हूं।
अंधेरा हो रहा था। शराब को देखकर मंदा और सिपाहीराम कुछ असहज थे सो ठाकुर ने दत्तू को बोला- नीचे के मुसाफिरखाने में इनको ठहरा दे। दो गिलास दूध दे दे और कुछ मांगें तो दे देना। गादी, गोदड़ा, बिछावन वहीं हैं लालटेन वहां कर देना। नीम का धुआं अच्छे से देना।
दत्तू उन दोनों को लेकर सामने के कमरे पर पहुंचा और दोनों को अंदर ले गया। सिपाहीराम की नजर शराब और मुर्गे पर थी जिसको ठाकुर भांप गया था। कमरे में दत्तू ने जल्दी-जल्दी झाड़ू बुहारी। गोदड़ा झटकारा। मंदा गोदड़ा बिछाकर उसपर अपने दूधमूंहे बच्चे को लेकर बैठ गई अब तक बच्चा भी उठ कर रोने लग गया।
अलेलेले..हमार मुन्ना..हमार चुन्नू, ए...-मंदा अपने बच्चे को लाढ़कर दूध पिलाने लगी।
उसकी आवाज सुनकर ठाकुर के जमा पांच लोग हंसने लगे। जिनकी आवाज मंदा ने न सुनी। कुछ देर बाद सिपाहीराम दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। उसका अंदाजा था कि उसे कबाब और शराब जरूर मिलेगी। यहां बोतलें खुल ही रही थीं कि सिपाही को देखकर वो लोग चौंके।
सिपाही झेंपी हंसी हंसकर बोला- हें..हें, पार्टी हो रही है।
पियोगे लाला..एक आवाज आई।
हूं..
जियो हो लाला जियो-बड़े छुपे रुस्तम निकले तुम तो।
आओ यहां बैठ जाओ।
सिपाही उनके बीच जा बैठा और मुर्गे की टंगड़ी शराब के साथ गुड़ककर वहीं टुन्न हो गया।
ठाकुर यह सब बैठकर देख रहा था। अब वो उठा और सामने मुसाफिरखाने की ओर चला गया।
सब खुश थे कि ठाकुर के बाद उनको भी मिलेगी मंदा। मंदा की जिस्मानी गर्म खुश्बू को महसूस कर सभी रोमांंचित हो रहे थे। ठाकुर ने उड़काया दरवाजा खोला तो देखा, गोदड़ा बिछा था जिस पर मंदा बैठी थी। बच्चा उसकी गोद में दूध पीते-पीते सो चुका था। ठाकुर को देखकर वो चौंकी।
ठाकुर सा. पैरन लागी अब छोड़ दे मने।
उसके गजरे की महक कमरे में फैले नीम के धुएं की सौंधी गंध में भी साफ आ रही थी।
बस.. भूल गई जब मैंने तेरा हाथ धरकर तुझे चिपटा लिया था अपने सरीर से। तब तो तूने कुछ कहा नहीं था। थारे होठन का जायका अब तक हमारे मुंह में रसता है। वो रस हम अब तक न भूलेे। तुझे लड़की से औरत बना दिया तब भी तू चुप ही रही।
ठाकुर तब में गांव की इज्जत थी पन अब में सिपाही की इज्जत हूं- मंदा बोली।
ठाकुर का नशा एकदम काफूर हो गया। वो बाहर आया और सांकल लगा दी हाथ में ल_ा उठाया और सीढिय़ों पर बैठ गया।
जो मंदा के साथ मजा करने का अरमान लिये उस ओर आने वाले थे, उनको धमकाते हुए ठाकुर ने कह डाला- अब यहां कोई पैर न धरे वर्ना सिर खोल डालूंगा। उसकी आवाज मंदा ने भी सुनी। ठाकुर नशे में था फिर भी वो अकेले दस के बराबर था। लट्ठ भी उसके हाथ में था।
धीरे-धीरे रात कटी सुबह सिपाही को होश आया तो उसने देखा कि सभी वहीं थे। ठाकुर सीढिय़ों पर उनींदा सा था। सिपाही को देखकर वो उठा और सांकल खोली देखा तो मंदा बच्चे साथ वहां सो रही थी जो हलचल सुनकर उठी। सिपाही न जाने क्या समझा और बोल पड़ा- घणी खम्मा, ठाकुर सा. आप हमारे देवान हो। इसके बाद सिपाही मंदा को लेकर वहां से निकलने लगा। जाते-जाते मंदा ने ठाकुर का मुंह देखा जिस पर एक अजीब सा संतोष था। उसने ठाकुर के पैर छू लिये। दत्तू वहां एक टांगा ले आया था जिसमें सिपाही और मंदा को बिठा दिया। सिपाही टांगा चलाने वाले के पास बैठा था। टांगा निकल गया। कुछ समय के लिये ठाकुर की आंखों के सामने भूतकाल का एक चित्र घूम गया। मंदा या मंदावती या मंदाकिनी..उसके घर आती थी ठाकुर मौका पाकर उसे छेड़ा करता था वो कुछ न कहती थी। उसने उसे हर उस स्तर तक प्रताडि़त कर दिया था जो कि असामाजिक था। ठाकुर ऐसा उसके साथ ही नहीं कई और लड़कियों के साथ भी कर चुका था। यह ठाकुर का वर्चस्व ही था कि वो या कि कोई भी गांव की लड़की जिसे उसने छेड़ा था वो उसके खिलाफ कभी बोल न सकी। जब तक मंदा गांव की इज्जत थीं, ठाकुर ने उसे छेड़ा पर अब वो अपने पति की इज्जत है उसके घर की इज्जत है जिस पर ठाकुर का कोई अधिकार नहीं था। ठाकुर आज बेहद गिरा हुआ महसूस कर रहा था। कुछ दूर मुड़ते समय तक ठाकुर उनको देखता रहा। जब टांगा मुडऩे लगा तब मंदा ने ठाकुर के हाथ जोड़े। फिर वो अदृश्य हो गये।
तीज का जागरण समाप्त हो चुका था औरतें लौट रही थीं और उनके गीत का स्वर दूर से ही सुनाई दे रहा था। ठाकुर के घर रातभर से जमें उसके दोस्त अब निकल रहे थे। उसका एक दोस्त बोला- रात को क्यों तूने इज्जत के खाखरे कर दिये? पूरे मजे की ऐसी की तैसी कर दी। अब वो गांव की नहीं किसी और की इज्जत है- इन शब्दों के साथ ठाकुर घर में वापस चला गया।

कुएं का रहस्य

दोनों लापता दोस्तों का आज तक पता नहीं चला है। पर लोगों को आज भी उस सड़क पर जाने में डर लगता है। कुछ दुस्साहसियों ने वहां से गुजरने की कोशिश ...